Thursday, November 27, 2008

एम. डॉट. कॉम

मां ने आज तड़के कोई काम नहीं किया। न चूल्हे में आग जलाई, न आटा-छलीरा घोलकर गाय के लिए ‘खोरड़‘ ही बनाया। न बिल्ली की कटोरी में लस्सी उंडेली, न बाहर आंगन के पेड़ पर लगाए ‘पौ‘ में चिड़ियों को पानी ही भरा। अपनी बैटरी ली और बाहर निकलते-निकलते बीड़ी सुलगा ली। दराट लेना मां नहीं भूली थी। दरवाजा बंद किया और ताला लगा कर सीधी गोशाला के पास चली गई।

सुबह का समय मां के लिए ज्यादा व्यस्तताओं का हुआ करता था। जैसे ही उठती, आंगन में चिड़ियां चहचहाने लगती। बिल्ली दूध-लस्सी के लिए बावली हो जाती। गोशाला में पशु रंभाने लगते और मां रसोई से ही उनसे बतियाती रहती। परन्तु आज ऐसा कुछ नहीं था। खामोशी का सिलसिला दहलीज के भीतर से ही शुरू हो गया था। मां इन दिनों नए भजनों के कैसेट ‘कबीर अमृतवाणी‘ अपने टेपरिकार्डर में खूब सुना करती, लेकिन आज वह भी चुप था। बिल्ली ने भी मां को पहले जैसा तंग नहीं किया, चुपचाप एक कोने मे दुबकी रही। आंगन के पेड़ों पर एक भी चिड़िया नहीं थी। सभी पौ के इर्द-गिर्द चुपचाप बैठी थी।

मां ने गोशाला का दरवाजा खोला तो सिहर उठी। जैसे भीतर अंधेरे के सिवा कुछ भी न हो। मां ने बैटरी की रोशनी में इधर-उधर झांका। पशु उदास-खामोश खड़े थे। उनकी आंखें भीगी हुई थीं। मां ने रोशनी कोने में मरी पड़ी ताजा सुई भैंस पर डाली तो जैसे कलेजा मुंह को आ गया। आंखें छलछला गयीं। अपने चादरू से आंखें पोंछती बाहर आ गई और दरवाजा ओट दिया।

आंगन से पूरब की तरफ देखा। धूरें हल्की रोशनी से भरने लगी थीं। सर्दियों की सुबह वैसे भी देर से होती है। मां ने अंदाजा लगाया.....सात बज रहे होंगे। बैटरी की जरूरत नहीं समझी। उसे दरवाजे के ऊपर खाली जगह में रख दिया।

गांव में भैंस के अचानक मरने की खबर नहीं पहुंची थी, वरना इस वक्त तक गांव की औरतें अफसोस करने पहुंच जाती। मां ने किसी को भी नहीं बताया। वे चाहती तो गांव के किसी छोकरे को भी कह कर चमार को हांक लगवा लेती, लेकिन इस बार मां ने खुद जाना बेहतर समझा। जानती थी कि यदि किसी को भेज भी दिया तो सामने तो कुछ न बोलेगा, किन्तु मन में सौ गालियां देता रहेगा। अब पहले जैसा समय कहां रह गया ? गांव में शरम-लिहाज तो नाम की बची है। जो कुछ है भी वह दिखावे भर की। नई नस्ल के छोकरे-छल्ले तो मुंह पर ही बोल देते हैं। बड़े-बूढ़ों की लिहाज तक नहीं रखते। वैसे अब बुजुर्ग बचे ही कितने हैं ? मां अपने घर के भीतर ही झांकने लगती है.......कि खुद कितने बरसों से अकेली घरबार चला रही है, इतना बड़ा बारदाना। खेती बिन बाही अव्छी नहीं लगती। फिर सरीकों का गांव है, तरह-तरह की बातें बनाएंगे। भले ही ‘ब्वारी‘ या मजदूरी से ही चला रखी है, पर मजाल कि कोई उंगली उठा सके। पांच-सात पशु भी ओबरे में बन्धे ही हैं। कोई बोल नहीं सकता कि फलाणी विधुआ के अब घरबार खत्म होने लगा है।

दो बेटे हैं। पढ़ाए-लिखाए, अब गांव छोड़ दिया। दूर-पार नौकरी करते हैं। वहीं शादियां कर लीं। वहीं बाल-बच्च्चे भी हो गए। बहुएं तो गांव-घर की तरफ देखती तक नहीं। आकर करेगी भी क्या, मिट्टी-गोबर की बास लगती है। बेटे साल में एक-आध बार खबर-सार ले लेते हैं। वैसे मां के लिए सारी सुविधाएं जुटा रखी है। टेलीफून है। रंगीन टेलीविजन है। गैस है। दूध बिलाने की मशीन। टेपरिकार्डर है।.............मां यह सोचती-सोचती गांव के बस अड्डे तक पहुंच गयी। शुक्र है कि कोई मिला नहीं, नहीं तो सभी पूछते रहते कि आज तड़के-तड़के फलाणी कहां चली है।

अड्डे पर बस घरघरा रही थी। मां ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। पर वहां का नजारा देख कर दंग रह गई। सब कुछ कितना जल्दी बदल गया। मां को याद है कि जहां आज बस अड्डा बना है वहां कभी पानी की एक बड़ी कुफर हुआ करती थी। मां ही क्यों गांव के दूसरे लोग भी अपने पशुओं को चराकर यहीं पानी पिलाते। स्कूल के बच्चे उसके चारों तरफ बैठ कर तख्तियां धोया करते। जगह-जगह गाचणी के टुकड़ पड़े होते। दवात-कलम रखे होते। कोई कापी-किताब भूली रहती। नीली स्याही की कलमें गाद में कई जगह ठूंसी रहती। जिसने स्कूल भी न देखा हो उसे भी पता चल जाता कि गांव का स्कूल यहीं कहीं पास होगा। सामने एक पत्थरों की दीवार थी, जो पश्चिम का पानी रोकता था। उस पर बणे के छोटे-छोटे पेड़ थे। उनके बीच दीवाल में खाली जगह थी, जिसमें पाप देवताओं की पत्थर की प्रतिमांए रखी होती। मां ने कितनी बार यहां आकर पूजा की होगी। पितरों की मूर्तियां बनाकर रखी होंगी। पर आज यहां सब कुछ नदारद है, जैसे वक्त ने उन्हें लील लिया हो।

अब एक बड़ा सा मैदान है, जिस पर बस और ट्रकों के टायरों की अनगिनत रेखांए हैं। यहां न अब पानी है, न बच्चों की चहल-पहल। न ही कोई पशु भूला-भटका इस तरफ आता है। रेत, बजरी, सरिया और सिमैंट के कितने ही ट्रक यहां उतरे है, जो इसे धूल का समंदर बनाए रखते है।


मां पहले बस से आगे निकल गई थी। अचानक ठिठक गई। परसा चमार के घर का रास्ता सड़क से भी तो जाता है। सोचा कि लोग क्या कहेंगे....कि फलाणी मुंह के पास बस आते हुए भी पैदल जा रही है।..या उसके बेटे उसको पेसे ही न देते होंगे..? फिर समय भी तो बच जाएगा। जब तक मरी भैंस ओबरे से बाहर नहीं निकाली, न मां खुद रोटी खाएगी न पशुओं को ही घास-चारा डालेगी। चमार के हाथ से उसकी गति जितनी जल्दी हो उतना ही पुन्न। यह ख्याल आते वह मुड़ गई। फिर रूकी। कुरते की जेब में हाथ डाला, तीन-चार रूपए की चेंज थी। आकर बस में बैठ गई।

कुछ मिनटों बाद बस चल पड़ी।

पलक झपकते ही वह जगह आ गई जहां मां को उतरना था। खेतों से नीचे उतरी तो घर दिख गया। सोचा कि यहीं से हांक दे दे।.....पर क्या पता कोई हांक सुने भी कि नहीं, ख्याल करते हुए नीचे चल दी। कई बरसों पहले मां का एक बैल मरा था। शायद फिर खुद ही आई होगी। मां को यह भी याद नहीं कि परसा चमार उनके घर कब छमाही लेने आया था। पति जिंदा थे तो वह महीने में एक-आध चक्कर लगा लिया करता। वहीं रह जाता। रात भर गप्पें चलती रहती। खूब बातें होती। वह मां और उनके पति के जूते भी गांठ कर ले आता। गांठने-बनाने को ले भी जाता। पर कितने बरस हो गए, मां ने कभी जूते नहीं गंठवाए। जरूरत भी न पड़ी। अब तो प्लास्टिक का जमाना है। बीस-तीस रूपए में जूते मिल जाते हैं। आसान काम। इस मशीनी जमाने ने तो आदमी को आदमी से ही दूर कर दिया, सोचती-विचारती मां परसे के घर के आंगन में थी। घर देखा ता हैरान रह गयी। पहले तो कच्चा मकान था--मिट्टी-भीत का बना हुआ। ऊपर बेढंगे से छवाए खपरे हुआ करते थे। खेतों-खलिहानों तक चमड़े की बास पसरी होती। आज तो यहां वैसा कुछ भी नहीं। लगा कि वह कहीं गलत मकान में तो नहीं आ गई ? अभी सोच ही रही थी कि एक छोटी सी लड़की बाहर निकली। मां को देख कर ठिठक गई। मां ने पूछ लिया,

‘‘ मुन्नी! परसे रा घर यई है ?‘‘

उसने कोई जवाब नहीं दिया। शरमा कर उल्टे पांव भीतर चली गई।

कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आया और दहलीज पर से बाहर गर्दन निकाली और झांकने लगा। पट्टृ की बुक्कल के बीच से उसका कूब निकल आया था। चेहरे पर घनी झुर्रियां....जैसे किसी बिन बाच के खेत में हल की फाटें दी हो। मां को देखा तो पहचान गया,

‘‘ अरे भाभी तू...?‘‘

कितनी आत्मीयता थी इस सम्बोधन में। मां का धीरज बढ़ा।

खड़े-खड़े ही राजी-खुशी हुई। परसा कहने लगा,

‘‘ आ जा..अंदर को चल, आज तो बड़ी ठंड है। म्हारे तो धूप बारह बजे से पैले नी आती।‘‘

यह कहते-कहते परसा अभी पीछे मुड़ा ही था कि मां ने रोक दिया,

‘‘ बैठणा नी है परसा। मेरी ताजी सुई हुई भैंस मर गई। पहला ही सू था।‘‘

गला भर आया था मां का। आंखों से पानी टपकने लगा।

परसा क्षणभर खड़ा रहा। फिर भीतर चला गया। मां को तस्सली हुई कि वह भीतर जाएगा, छुरी निकाल किलटे में डालकर बाहर आएगा और चल पड़ेगा। लेकिन जब वह दोबारा बाहर आया तो उसके एक हाथ में पटड़ा ओर दूसरे में आग की अंगीठी थी। मां को पटड़ा पकड़ाया और अंगीठी सामने रख दी। खुद भी उसी के पास बैठ गया। जेब से बीड़ी निकाली। एक मां को दी, दूसरी अंगीठी की आग में ठूंस कर सुलगा ली। मां ने भी ऐसा ही किया। दोनों पीने लग गए। कुछ देर गहरे कश लेते रहे। मां ने ही चुप्पी तोड़ी,

‘‘ तेरा बी कदी गांव की तरफ चक्कर ही नी लगा ?‘‘

‘‘ अब कहां चला जाता है भाभी। चढ़ाई में चलते दम फूलणे लगता है। फिर टांगे बी जबाब देणे लगी।‘‘

‘‘ पर साल-फसल पर बी तो नी आया तू। म्हारे पास ही कितणे सालों की छमाही हो गयी होगी।‘‘

परसे ने एक गहरी सांस ली। खंासता भी गया। चेहरे पर दर्द उतर आया।

‘‘ जाणे दे भाभी! पुराणी गलां। तैने रखी होगी इतणी ल्याहज, पर दूसरे तो सब नाक चिढ़ाते हैं। तुम्हारे जैसे थोड़े ही है सब। बामणों-कनैतों का गांव है। .........बड़ी साल पइले गया था। उस टेम बे जब भाई मरा था। लगे हाथ छमाही भी मांगणे चला गया। बामणों ने तो मना ही कर दिया। कहणे लगे कि परसा, अब जूते कौन बनाता-गंठाता है। बणे-बणाए मिल जाते हैं दूकानों में। तू तो जाणती है भाभी, काम के साथ ही आदमी की गरज होती है। फिर मुए को नी पूछता कोई!‘‘

यह कहते हुए उसने अंगीठी की आग को उंगलियों से ठीक किया। मां की बेचैनी बढ़ती चली गई। वह इस जल्दी में थी कि परसा बात मुकाए और चल दे। पर वह बोलता गया,

‘‘ पैले पुराणा वक्त था। दूकानें नी थी। सड़क नी थी। तब परसा बड़ा आदमी था। शादी-ब्याह म्हारे कंधों पर। पटियारी-पतली म्हारे जिम्मे। बूट तो परसे के ही होणे चाहिए। अब तो न कहार न चमार। टैम-टेम की बातें हैं भाभी।‘‘

चेहरे पर आक्रोश और खीज भर गई थी। मां चुपचाप देखती रही। पूछना चाहती थी कि इन बामणों-कनैतों के पशु कौन फैंकता है, पर पूछ ही न पाई। वह परसे से एक बार फिर चलने का अनुराध करने को हुई कि परसा फिर कहने लगा,

‘‘ माफ करियों भाभी, तू तो म्हारी आपणी घर की है। कोई बामण-कनैत आया होता तो आंगण में खड़े बी नी होणे देता।......अब म्हारे घर मे न कोई बूट-जोड़ा गांठता है, न पशु फैंकता है। बच्चे नी मानते। बड़ा तो शिमला में अफसर बण गया है। छोटा बस टेशन पर दूकान करता है।...तेरे को कैसे नी पता भाभी। ....मैं तो अब कहीं न आता न जाता।‘‘

मां सुन कर हैरान-परेशान हो गई। याद आया कि परसे का ठीया उधर कहीं होता था। वह आंगन के किनारे देखने लगी तो परसे ने बताया,

‘‘वो देख उधर, मेरा ठीया होता था। लड़कों को बथेरा समझाया कि मुए इसको तो रैहणे दो। पर कहां माने। अपणे काम से इतणी नफरत जैसे ये बामण म्हारे से करते है। तोड़ दिया उसको। सारा समान बी पता नहीं कहां फैंक दिया। वहां अब लैटरींग बणा दी।‘‘

कहते-कहते अंगीठी दोनों हाथों से ऊपर उठाकर हिला दी। अंगारे चमकने लगे। फिर उठ कर भीतर चल दिया। मां ने जब उस की आंखों में देखा था तो वे गीली थी। शायद अपनी विरासत के यूं खो जाने से मन भर आया होगा। भीतर जाते उसने पट्टु के छोर से आंखें पोंछी।

दरवाजे पर पांव रखते ही कुछ याद आया, वहीं से बोला,

‘‘ तू मेरे लड़के से कहियो, वो कुछ कर देगा।‘‘

मां की हालत देखने वाली थी। उसके न बैठे बनता था न वहां से आते। कोई मां का चेहरा देखता तो पसीज जाता। नजर फिर ठीए की तरफ गई। याद करने लगी कि जब वह यहां आती तो भीतर बैठ जाती। गांव के और भी कितने लोग परसे के आसपास बैठे रहते। उनमें बामण, कैनैत, कोली, चमार सब होते। न किसी को छू-न छोत। उस समय तो परसा, चमार नहीं बल्कि एक बड़ा कारीगर होता, मास्टर, उस्ताद होता।

वह छोटी सी लड़की फिर बाहर आई और भागती हुई शौचालय में चली गई। तपाक से दरवाजो बन्द किया। शौच की बास का भभका, हवा के झोंके के साथ मां के नाक में घुस गया। चादरू से मुंह-नाक ढक लिया। उठी और चल दी। सोचते हुए कि क्या करें, कहां जाएं। मन में एक आस बची थी कि परसे का लड़का कुछ करेगा।

सूरज काफी चढ़ आया था। घर अकेला था। पशु भूखे-प्यासे होंगे। मां लम्बे-लम्बे कदम देने लगी। बस अड्डे पर पहुंची, तब तक दुकानें खुल गयी थीं। मां देखने लगीं.....चाय की दूकान, आटा-चावल की दूकान, कपड़े की दूकान, सिगरेट बीड़ी की दूकान और नाई की दूकान। एक और दूकान पर नजर गई, जिसमें एक-दो छोटी मशीनें रखी थी। वहां बैठे लड़के को अम्मा नहीं जानती थी। बाकि सभी तो उसी गांव-बेड़ के थे।

उधर देख ही रही थी कि कानों में आवाज पडी़,

‘‘ ताई कहां थी तड़के-तड़के ?‘‘

मुड़ कर देखा तो बुधराम नाई था। झाड़ू लगाते उसने फिर कहा,

‘‘ताई ! आ जा न बैठ, चाय का घूँट लगा ले।‘‘

मां बैठना नहीं चाहती थी, पर सोचा कि बुधराम ही परसे के लड़के से बोल कर भैंस फिकवा दे। वह अन्दर जा कर बैठ गई और जल्दी-जल्दी सारी बात बता दी। मां के चेहरे से काफी परेशानी झलक रही थी। बुधराम ने सारी बात सुनी तो हल्का सा मुस्करा दिया, जैसे वह कोई समस्या ही न हो। उसने अपने बांए हाथ इशारा किया और मां को बताया कि बगल में ही उसकी दूकान है। झाड़ू बैंच के नीचे फैंका और बाहर निकल पड़ा। मां उसके पीछ-पीछे चल दी। दोनों दूकान पर पहुंचे। परसे के लड़के का नाम महेन्द्र था। मां को कुछ तसल्ली हुई। बताने का प्रयास भी किया था कि वह उसी के घर से आ रही है, पर महेन्द्र ने ध्यान ही न दिया। बुधराम ने ही मां को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। उसी ने बताया कि ताई की भैंस मर गई है। महेन्द्र ने मां का नाम पूछा और फिर कम्प्यूटर में कुछ ढूंढने लग गया। मां कुर्सी से उचक कर देखने लगी। स्क्रीन पर अक्षर भाग रहे थे। उसने अपनी घूमने वाली कुर्सी जब पीछे घुमाई तो मां बैठ गई। वह बताने लगा,

‘‘ माता जी आपका नाम हमारे पास नहीं है। न ही पशुओं की लिस्ट। पंडतों-ठाकुरों ने तो पहले ही अपना रजिसट्रैशन करवा दिया है। आप भी करवा लो।‘‘

मां की समझ में कुछ नहीं आया। आश्चर्य से बुधराम को देखने लगी। उसी ने मां को समझाया,

‘‘ ताई! देख उधर, गांव के जितने भी आदमी है, उनके नाम पशुओं के साथ लिखे हैं। वो देख मेरा बी नाम है...(उंगलीसे बताने लगा)। जब कोई पशु मरता है या पैदा होता है, इसमें दर्ज हो जाता है। फीस लगती है उसकी। अगर तेरा नाम होता, मिनट में ई-मेल करके महेन्द्र शहर से दो-चार आदमियों को बुला देता और शाम तक तेरी भैंस ओबरे से बाहर।‘‘

मां की चिन्ता बढ़ गई। हैरान -परेशान होकर पूछने लगी,

‘‘ पर बुधराम वो भैंस को कैसे फैंकेंगे ?‘‘

‘ ताई! वो लोग शहर से अपनी गाड़ी में आएगें। तेरी भैंस को ओबरे से बाहर निकालेंगे। ले जाएंगे। उसे काटेंगे, परर फैंकेंगे नहीं। जैसा म्हारे चमार करते हैं। मांस, हड्डियां, खाल सब अपने साथ लेते जाएंगे। न खेतों में गंदगी रही, न गिद्धों और कुत्तों का हुड़दंग।‘‘

मां का सिर चकरा गया। कुछ पल्ले नहीं पड़ा। उठी और बाहर निकलते-निकलते एक नजर बुधराम पर डाली, दूसरी महेन्द्र और उसकी मशीन पर। अब क्या करें, कुछ समझ नहीं आया।

सड़क पर आकर मां ने उस दूकान की तरफ फिर देखा। बड़े-बड़े अखरों में दूकान का नाम लिखा था.........एम॰ डॉट कॉम।

--एस॰ आर॰ हरनोट

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8 कहानीप्रेमियों का कहना है :

manu का कहना है कि -

सधे हुए ठेठ शब्द लिए हुए पुराने लोगों के दर्द का एक अच्छा चित्रण ............बधाई स्वीकारें ...!

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devendra का कहना है कि -

गंवई-गाँव की शब्दावलियों में बदलते समाज और इस परिवर्तन के फलस्वरूप पूरी पीढ़ी के हृदय में रिसते जख्मों का
सफल दस्तावेज है यह कहानी। कहानीकार का परिचय भी मिलता तो अच्छा होता।
--देवेन्द्र पाण्डेय।

संजीव सलिल का कहना है कि -

कहानी बोझिलता के बावजूद समय के बदलाव, सामाजिक समरसता के विलोप, अप्रासंगिक होते पारम्परिक वातावरण पर केंद्रित है. विषयानुकूल शब्द चयन तथा भाषा कथाकार का जमीन से जुडाव इंगित करती हैं.

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