Monday, November 17, 2008

चुनाव और चम्पा

इधर कुछ दिनों से उसके पति पर चुनाव का भूत सवार था, उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते, नहाते-धोते, बस चुनाव। चुनाव भी क्या, झाड़ू पार्टी का भूत सवार था। झाड़ू पार्टी का बहुमत आएगा, झाडू पार्टी की सरकार बनेगी, क्योंकि झाड़ू पार्टी के प्रधान उनकी जाति के थे। चिड़िया पार्टी तो गई समझो, वह अक्सर गुनगुनाता फिरता था।
काना बाती कुर्र
चिड़िया उड़ गई फुर्र

उसे चिड़िया पार्टी पर काफी गुस्सा था। उनके हलके के विधायक चिड़िया पार्टी के थे और उन्हीं की शिकायत पर उसका तबादला यहां हुआ था। पति उसे पिछले तीन दिन से एक डम्मी मतपत्र दिखलाकर बार-बार समझा रहा था
कि झाड़ू पर मोहर कैसे लगानी है! कागज कैसे मोड़ना है! उसने तो जूते के खाली डिब्बे की मतपेटी बनाकर उसे दिखलाया था कि वोट कैसे डालनी है!
आज वे मतदान केन्द्र पर सबसे पहले पहुँच गए थे। फिर भी आधे घण्टे बाद ही उन्हें अन्दर बुलाया गया। चुनाव कर्मचारी उनकी उतावली पर हँस रहे थे। फिर उसका अँगूठा लगवाकर उसकी अंगुली पर निशान लगाया गया, उसका दिल कर रहा था कि अपनी ठुड्डी पर एक तिल बनवा ले, निशान लगाने वाले से।
पिछले चुनाव में उसकी भाभी ने अपने ऊपरी होठ पर एक तिल बनवाया था। हालाँकि उसका भाई बहुत गुस्साया था, इस बात पर। जब उसकी भाभी हँसती थी तो तिल मुलक-मुलक जाता था। उसकी भाभी तो मुँह भी कम धोती थी उन दिनों, तिल मिट जाने के डर से। पर वह लाज के मारे तिल न बनवा पाई। मर्द जाति का क्या भरोसा, क्या मान जाए क्या सोच ले!
अब उसके हाथ में असली का मतपत्रा था और वह सोच रही थी। यहाँ कालका जी आए उन्हें छह महीने ही तो हुए थे। वह राजस्थान के नीमका थाना की रहने वाली थी और पति महेन्द्रगढ़ जिले का। दोनों ही मरुस्थल के भाग थे। हरियाली के नाम पर खेजड़ी और बबूल बस। उसका पति वन विभाग में कुछ था। क्या था ? पता नहीं। कौन सर खपाई करे !
वह वन विभाग में था, इसकी जानकारी भी उसे यहीं आकर हुई जब वे फारेस्ट कालोनी के एक कमरे के क्वार्टर में रहने लगे। यहाँ आकर चम्पा, हाँ यही उसका नाम था न, बहुत खुश थी। यहीं उसे पता लगा कि चम्पा का फूल भी होता है और वो इतना सुन्दर और खुशबू वाला होता है। और तो और उसकी माँ, चमेली के नाम का फूल भी था, यहाँ। इतनी हरियाली, इतनी साफ-सुथरी आबो-हवा, इतना अच्छा मौसम, जिन्दगी में पहली बार मिला था, उसे। फिर सर्दियों में उसका पति उसे शिमला ले गया था। कितनी नरम-नरम रूई के फाहों जैसी बर्फ थी। देखकर पहले तो वह भौचक्क रह गई और फिर बहुत मजे ले लेकर बर्फ में खेलती रही थी। इतना खेली थी कि उसे निमोनिया हो गया था।
फिर यहाँ कोई काम-धाम भी तो नहीं था उसे। चौका-बर्तन और क्वार्टर के सामने की फुलवाड़ी में सारा दिन बीत जाता था। वहाँ सारा दिन ढोर-डंगर का काम, खेत खलिहान का काम और ऊपर से सास के न खत्म होने वाले ताने। फिर ढेर सारे ननद देवरों की भीड़ में, कभी पति से मुँह भरकर बात भी नहीं हो पाई थी, उसकी।
उसने मतपत्र मेज पर फैला दिया। हाय ! री दैया ! मरी झाडू तो सबसे ऊपर ही थी। उसने और निशान देखने शुरू किए। कश्ती, तीर कमान,। तीर कमान देखकर उसे रामलीला याद आई। उसे लगा चिड़िया उदास है, पतंग हाँ पतंग उसे हँसती नजर आई। साइकल, हवाई जहाज, हाथी सभी कितने अच्छे निशान थे और झाडू से तो सभी
अच्छे थे।
''अभी वह सोच ही रही थी कि निशान कहाँ लगाए? तभी वह बाबू जिसने उसे मतपत्र दिया था बोला-बीबी जल्दी करो और लोगों को भी वोट डालने हैं।''
उसने मोहर उठाई और मेज पर फैले मतपत्र पर झाडू को छोड़कर सब निशानों पर लगा दी और मोहर लगाते हुए वह कह रही थी कि चिड़िया जीते, साइकल जीते, कश्ती जीते पर झाड़ू न जीते।
झाड़ू को जितवाकर वह अपना संसार कैसे उजाड़ ले? हालांकि वह मन ही मन डर रही थी कि कहीं पति को पता न लग जाए।

--डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

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5 कहानीप्रेमियों का कहना है :

डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

मित्रो! यह कहानी आपको कैसी लगी, यह तो आप जाने, पर यह कहानी भी मेरी अन्य कहानियों की तरह सच्ची घटना पर आधारित है,हुआ यूं कि हम वोट डालकर लौटे थे। मैं थोड़ा थका सा था, लेट गया नीन्द आने वाली थी कि मुझे अपनी हमशीरा और काम करने वाली बाई की बातें सुन पड़ीं और यह कहानी बन गई। कहानी लिखकर मैं सो गया। उठकर कहानी पढ़ी तो सोच में पड़ गया कि हम लोग, हमारे पुरखों के बलिदान से प्राप्त आजादी व लोक तन्त्र को कितनी सहजता से ले लेते हैं। बल्कि पढ़े-लिखे लोग तो वोट देने में भी आलस करते हैं और अनपढ़ लोगों को चालाक राजनेता जात-धर्म के नाम पर बहकाकर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। इसके लिये हम दोषी तो हैं ही, अपना वर्तमान और भविष्य दोनों गिरवी रखकर चैन की बंसी बजा रहे हैं, रोम के नीरो की तरह।
मैं अपने इस भाषण हेतु क्षमा मांगते हुए, कुछ सुझाव दे रहा हूं-
१-वोट अवश्य करें
२- वोट देने के लिये मित्रों से आग्रह करें
३-वोट केवल और केवल दो नेशनल पार्टियों से किसी एक के प्रत्याशी को दें- क्यों ?
क्यों ?
माना आज नेशनल पार्टियां भी गलत उम्मीदवारों का चयन कर रहीं है, पर वे ऐसा चुनाव में जात-धर्म के नाम से मिलने वाले वोटों के कारण ऐसा करने को विवश हैं। जिस दिन, हो सकता है ५-१०-१५ साल लग जायें, मगर जिस दिन नेशनल पार्टियों को आभाष हो जायेगा कि वोट उनकी पार्टी को उसकी नीतियों के कारण मिल रहे हैं न कि जाति-धर्म पर-और उन्हें छोटी पार्टियों के समर्थन की जरूरत न रहेगी तभी आया राम-गया राम की राजनीति व सही ,साफ़-सुथरी छवि के लोगों को टिकट देने पर उन्हें मज़बूर होना पड़ेगा

neelam का कहना है कि -

i liked both ,the innocence of yours champa ,and your apeal to us
to vote ,may god bless u a healthy
and happy life .

rachana का कहना है कि -

बहुत खूब कहा है मासूम सी सोच है चम्पा की पर उस बेचारी को ये नही मालूम की और लोग यदि झाडू पे निशान लगायेंगे तो भी तो जीत ही जाएगा उसका पति .पर अपनी कोशिश तो करनी हो चाहिए सो वो कर रही थी
सुंदर कहानी
सादर
रचना

sumit का कहना है कि -

कहानी अच्छी लगी
चंपा की दुविधा को भी आपने अच्छी तरह बताया

आपका वोट के लिए सुझाव भी अच्छा लगा क्योकि हमारे देश मे बहुत से पढे लिखे लोग वोट डालने नही जाते।

सुमित भारद्वाज

संजीव सलिल का कहना है कि -

आम चुनावों में दर्जनों बार मतदान केन्द्रों का प्रभारी रहा हूँ. एसी घटनाएं हर बार बीसों होती हैं क्या-क्या होता है जो देख और जान लेता हैउसे चुनाव की इस प्रणाली का खोखलापन समझ में आने के साथ इस पर से विश्वास ख़त्म हो जाता है. इसलिए प्रायः समूचा कर्मचारी-अधकारी वर्ग जो चुनाव प्रक्रिया संपादित करता है न तो ख़ुद मत देता है न ही उसके अधिकांश परिवारजन. यह कडुवा सच है.
नाग सौंप बिच्छू खड़े, मतदाता मजबूर.
जिसे चुना वह डसेगा होकर मद में चूर.
आप का आग्रह आदर्शपरक और संविधानसम्मत है. सोचिये शत-प्रतिशत मतदान हो तो क्या राजनीति से अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, पढों-सुविधाओं का दुरूपयोग कभी कम या समाप्त होगा? जब तक दलीय आधार पर चुनाव होंगे, जनता को अपना निकम्मा प्रतिनिधि वापिस बिलाने का अधिकार न होगा, जन प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ते समय जो संपत्ति थी ५ साल बाद बढ़ने पर सफाई देने के बाध्यता न होगी टीबी तक सिर्फ़ मत दे देने से कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा.

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