Monday, May 18, 2009

शिखर-पुरुष : ज्ञानप्रकाश विवेक की चर्चित कहानी

इस बार हम चर्चित कहानीकार ज्ञानप्रकाश विवेक की सबसे चर्चित कहानी 'शिखर-पुरुष' प्रकाशित कर रहे हैं। यह कहानी जब इंडिया-टुडे में प्रकाशित हुई थी तो पाठकों ने सर-आँखों पर बिठा लिया था। हमें खुशी है कि ज्ञानप्रकाश हमें इंटरनेट के हिन्दी-पाठकों तक इस कहानी को पहुँचाने का अवसर और अनुमति दे रहे हैं।


शिखर-पुरुष

अपना नाम तुमने झिझकते हुए बताया था- बी ...बी ... बी .. अटक से गए थे तुम। मैं कुछ भी नहीं समझ पाई थी। सोचने लगी थी, तुम अपना नाम फिर से बताओगे। तुम चुप थे। ऐसा लगता था, तुम अपना नाम भूल गए हो। याद कर रहे हो अपना नाम।

मैंने फिर कहा था- " आप अपना नाम बता रहे थे..." इस बार तुम पहले से ज्यादा नर्वस नजर आए थे। तुमने अपना नाम फिर से दोहराया था- बड़े सरपट तरीके से। जैसे रेस के घोड़े एक साथ दौड़ पड़े हों या कि जैसे नाम बताना बहुत गैर जरूरी और उबाऊ काम हो और जिसे अनमने भाव से बहुत जल्दी निबटा देना हो। मैं फिर भी नहीं समझी थी। इतना दौड़ता हांफता लहजा

मैंने एक बार फिर कहा "हम किसी जल्दी में नहीं है- न आप, न मैं। आप चेयर लीजिए, बैठिए और अपना नाम एक बार फिर ..."

तुमने किसी स्कूली बच्चे की तरह अपना नाम बताया था- बी एल विश्वास। झिझक और कंपन तुम्हारी आवाज में था। तुम्हें डर था कि मैं तम्हारे नाम का फुल फॉर्म न पूछ लूं। बाद में मुझे मालुम हुआ कि तुम्हारा नाम बनवारी लाल है। यह भी मुझे बाद में मालुम हुआ कि तुम अपने नाम से चिढ़ते थे। चिढ़ते तुम अपने पिता से भी थे जिसने तुम्हारा नाम बनवारी लाल रखा था। चिढ़ते तुम कई चीजों से थे- अपनी दरिद्रता से, लोगों की संपन्नता से, अपनी दयनीयता से दूसरों के स्मार्टनेस से, दूसरों के अच्छे कपड़े से, अंग्रेजी से, शायद पूरी कायनात से चिढ़ते थे तुम।
मुझसे भी तुम चिढ़ गए थे कि मैंने तुम्हारा नाम बार बार पूछा था। तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारी रैगिंग की है। यह तुम्हारी गलतफहमी थी। गलतफहमियां पाले रखना तुम्हारा शौक था।

यह तुम्हारा पहला दिन था- दफ्तर में पहला दिन। मुझे यहां डेढ़ साल हो चुका था। मैं पर्सनल विभाग में थी। मुझे कहा गया था कि तुम्हारा ज्वाइनिंग लेटर ले लूँ। तुम मेरे सामने बैठे थे- घबराए हुए, इधर उधर देखते। तुमने जेब से जंग खाई चाबी निकाल ली थी। कुर्सी की हत्थी पर घिसने लगे थे। यह बुरी बात थी। लेकिन ऐसा लगता था कि तुम व्यस्त रहने के लिए कोई काम ढूंढ रहे हो ताकि तुम अपनी घबराहट छिपा सको... तुम्हारे लिए मैंने चाय मँगाई थी। तुमने चाय का कप दोनों हाथों से उठाया। कप इतना भारी तो नहीं था कि दोनों हाथों से उठाया जाता। मैं तो कहने वाली थी- चाय का कप है कोई परशुराम का धनुष नहीं। कहा नहीं था मैने, क्योंकि तुम्हें यह फब्ती बुरी लग सकती थी.... तुम चाय पीने लगे थे। सुड़-सुड़ की बेतरतीब आवाजें तुम्हारे मुंह से निकलने लगी थीं। मैं मन ही मन हँसी थी। मैं ही क्यों, पूरा दफ्तर तुम पर हँसता था। कलीग्ज को क्या चाहिए था? तुम्हारे जैसा एक अदद कॉर्टून! तुम्हें पहले चाय पिलाई जाती, फिर तुम्हारा मजाक उड़ाया जाता। मैं समझ जाती, तुम बलि के बकरे बनाए जा रहे हो। तुम किसी मेमने जैसे नजर आते। पता नहीं किस मिट्टी के बने थे तुम ... किसी भी दिन चीते की तरह फुर्तीले तो क्या, कुत्ते की तरह चौकन्ने भी नहीं नजर आए।

उस हॉल में, जहां सब बैठते थे, पूरा दिन किसी नाटक जैसा गुजरता। टेलीफोन की घंटियाँ, टाइपराइटर की आवाजें, चाय के कप, मित्रता निभाते युवक-युवतियाँ, कलीग्ज की बहसें, हँसी-ठट्ठा, ताजा सनसनीखेज खबरों पर विमर्श, साहब लोगों की कॉलबेल, क्लाएंट्स की आमदरफ्त, कलीग्ज का एक दूसरे पर जेमक्लिप फेंकना, सॉफ्ट पॉर्न पत्रिकाएं दराज के अंदर रखकर पढ़ना, लेडीज टॉयलेट में स्त्रियों की गोष्ठी, डैंड्रफ से लेकर ल्यूकोरिया तक के देसी टोटके, लेडीज टॉयलेट में शीशे के सामने सँवरती-निखरती फेयर एंड लवली क्रीमों से ज्यादा फेयर बनने की कोशिश करती स्त्रियाँ ठनठनाती, इतराती लेकिन अपने बढ़ते वजन पर फिक्रजदा होती, हॉल में गुजरती तो महसूस होता खुशबुओं का आबशार गुजर गया है और युवक..... किसी देसी जिम में जाकर अपने शरीर को बनाते और दफ्तर में हाइ-फाइ नजर आने के सारे नुमाइशी प्रोग्राम दस से पाँच के बीच अदा कर डालते.. पूरा दिन बहुत कुछ घटित होता।

लेकिन तुम... मैं देखती, तुम अपनी सीट पर किसी वीरान टापू जैसे, होने-न-होने के बीच, हँसने और रोने के बीच किसी फाइल, किसी कवरनोट में कभी किसी कॉकरोच तो कभी किसी तिलचट्टे की तरह छिपे नजर आते। तुममें ऐसा कुछ भी नहीं था कि कोई लड़की तुम पर रीझती। न तुम आकर्षक थे, न स्मार्ट। सभी कलीग्ज नौजवान थे, तेजतर्रार, चुस्त खूबसूरत और नई काट की पोशाकें। बात करने का समझदार तरीका। वे हर एँगल से अच्छे, सम्मोहक लगते।
लेकिन मुझे तुम्हारी बेचारगी ने आकर्षित किया था बनवारी लाल... ऐसी बेचारगी जिसमें निर्धनता, मासूमियत, बेचैनी, दुख हैरानी और अवसाद का मिश्रण था... तुम खिड़की से आसमान को ऐसे देख रहे होते जैसे कोई बच्चा आसमान में कटी पतंग को देखता है... ऐसा लगता था, तुम खुद एक कटी पतंग हो। और मुझे हमेशा कटी पतंगो से हमदर्दी रही है बनवारी लाल!

हॉल में बैठे तेजतर्रार और खूबसूरत नौजवानों की अनदेखी करके, मैं तुम्हें देखती रहती। पता नहीं तुम किस दुनिया में गुम होते। हॉल के एक सिरे पर मैं होती, दूसरे सिरे पर तुम। मैं तुम्हें देखती। देखती रहती। यह मेरी बेवकूफी थी या क्या था, पता नहीं। मैं तुम्हें चाय के लिए बुलाती। तुम्हारे हात काँपने लगते। चाय छलकती, गिरती। तुम घबरा जाते। डस्टर ढूँढ़ते। मेज साफ करते। तुम विचित्र लगते।

दोपहर का खाना तुम अकेले खाते थे। बनवारी लाल... आजकल बेशक तुम तीन-तारा या पाँच-तारा होटल-रेस्तराँ में क्लाएंट्स के साथ लंच-डिनर लेते हो... बेशक एक दिन तुमने अपने केबिन में कहा था, "दिस रबिश क्लास थ्री..." कहा तुमने और भी बहुत कुछ था... दरअसल, हर बड़ा आदमी अपने अंदर एक 'ईश्वर' पैदा कर लेता है। गलत तो नहीं कर रही मैं। तुम्हें लगता है कि तुम दुनिया के नहीं तो कम से कम इस दफ्तर के 'ईश्वर' हो। आदमी जितना बड़ा 'कमीना' होता है, वह उतना बड़ा उपदेशक समझने लगता है अपने आपको। शायद यह कोई 'सिद्ध' अवस्था हो।

हां तो मैं तुम्हारे खाने की बात कर रही थी। कलीग्ज ने साफ-साफ कह दिया था- "बनवारी हमारे साथ मत खाया कर ..." तब तुम अकेले खाते। एक बार तुम्हारे पास सब्जी नहीं थी- याद है तुम्हें! तुम घर से रोटियों में लपेट कर चीनी और हरी मिर्च लाए थे। अजीब किस्म का कॉकटेल था। चीनी और हरी मिर्च। मैंने देखा। मुझे तरस आया तुम पर। तुम्हें थोड़ी -सी सब्ज निकाल कर दी। तुमने मुझे देखा और तुम्हारी आंखो के कोर भीग गए।

***
अचानक पता चलता, हॉल के आखिरी सिरे पर कुछ शोर सा हुआ है। मालूम होता कि तुम किसी से लड़ पड़े हो। मालूम होता, किसी बंदे ने गाना गाया था- बनवारी रे, जीने का सहारा तेरा नाम रे... बस इसी बात पर तुम बौखला उठे थे। मैं तुम्हारे पास आती। कोई फाइल लिए या कोई दूसरा बहाना बनाकर। तुम शांत हो जाते। मेरा आना तुम्हें अच्छा लगता। तुम्हें लगता कि दफ्तर में कोई है जो तुम्हारा है। जो तुम्हारे मन की बात समझता है। तुम्हारे दुःख को पहचानता है। तुम चाहते कि मैं तुम्हारे साथ बैठी रहूँ। तब तुम कमजोर थे। तुम्हें सहारों की दरकार थी। तुम्हें मेरा होना आश्वस्त करता। जिस दिन मैं दफ्तर नहीं आती थी, तुम घबराये रहते।

नहीं बनवारी लाल, तुम्हारी कमजोरियाँ नहीं ढूँढ़ रही मैं। अतीत से साक्षात्कार करा रही हूँ। उस अतीत से, जो तुम्हारा था और जिसे अब तुम देखना भी नहीं चाहोगे। संस्मरण सुनाने की तुम्हें बुरी आदत है। अपने अतीत पर झूठ की नक्काशी भी खूब कर लेते हो तुम। तुम्हारा झूठ मेर सच्चाई के कद से बहुत बड़ा हो गया है बनवारी लाल। यादें! यादों के खँडहर में भटकना भी कौन चाहता है! यादें होती भी क्या हैं! पुराने जमाने की एलबम में औंधे मुँह पड़ा वक़्त।

वक़्त!... वक्त किसी की लिए जख्मी परिंदे जैसा होता है। जहाँ बैठता है, जख्मों के निशान छोड़ जाता है। और कुछ लोग वक्त को गोल्फ की तरह खेलते हैं- जैसे कि तुम! ठीक कह रही हूँ न बन्नी!

बन्नी! याद है मैने तुम्हारा यही नाम रखा था। बहुत अच्छा लगा था तुम्हें। बनवारी नाम से तुम चिढ़ जाते लेकिन बन्नी सुनना तुम्हें अच्छा लगता। लेकिन इस सकल विश्व में अकेल मैं थी, जो तुम्हें बन्नी कहती थी।

बनवार लाल... अब तुम इस नाम को भूल चुके होगे शायद। तब तुम कहते थे कि मैं सब कुछ भूल सकता हूँ, लेकिन यह खूबसूरत, छोटा-सा नाम नहीं। इस नाम में जिंदगी है।

तुम्हारे वो दिन डिप्रेशन-भरे थे। जैसे कि अब मेरे। मेरी छोड़ो। मैंने तो रास्ता ही ऐसा चुना। गरम रेत पर नंगे पांव खड़ी होकर कालीन का सपना देखना बेवकूफी नहीं तो क्या है!

***
पलटकर देखूँ तो अतीत के पन्ने फड़फड़ाते चले जाते हैं। तुम्हारे रोने की आवाज आई थी मुझे। तुम्हारे हँसने और रोने की आवाज को भला कैसे नहीं पहचानती! तुम जेंट्स टॉयलेट में वाशबेसिन के पास खड़े रो रहे थे। दरवाजा खुला था। मैं उधर से गुजरी। तब तुमने एक हिचकी ली थी। मैंने चौककर देखा। तुम थे। मैं सिहर उठी। तुम मुझे देखकर सकपका गए। वाशबेसिन में मुँह धोने का नाटक। इस बीच किसी ने हमें देखा था। हम हॉल में आए तो बहुत सारी आंखों ने हमें घूरते हुए देखा।

लेकिन शाम को मैने तुम्हें खूब लताड़ा था, 'मर्द होकर रोते हो.... गलत बातों को सहन करना सीखो। दबंग और लापरवाह बनो... चालाक लोगों की दुनिया है..बेवकूफी के रास्ते खाइयों मे गिरते हैं...'

शायद तुमने मेरी कुछ बातें गाँठ बाँध ली थीं। शायद यहीं से तुमने खुद को बदलना शुरू किया था, जिसका इल्म मुझे बहुत बाद में हुआ।

बन्नी, यह भी मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ कि ऊपर से लद्धड़, डरपोक और शंकालु दीखनेवाले तुम, भीतर से बहुत घुन्ने हो। शायद डरपोक और कायर आदमी अपने भीतर घुन्ना और चालाक होता है, या कि धीरे-धीरे हो जाता है। उसका हथियार ताकत नहीं, मक्कारी होता है...

... तुम्हें याद है बन्नी, क्लेम डिपार्टमेंट में जाने से मना किया था मैंने। शायद तुम्हें अब भी याद हो.. मैंने कहा था, "पर्सनल, एकाउंट्स, अंडरराइटिंग- कोई भी किसी भी डिपार्टमेंट में चले जाओ लेकिन क्लेम ..."

लेकन तुमने अपनी उँगलियों पर गणित लिख रखा था। मुझे बाद में पता चला था कि तुम्हारे अंदर कोई कैलकुलेटर फिट है, जिसका रिमोट तुम्हारे चुप्पेपन के पास है। मैंने तुम्हें समझाने की कोशिश की थी कि 'टुकड़ों' का लालच, मनुष्य की थिकिंग बदल देता है। लेकिन तुमने मेरी बात सिर्फ सुनी थी। किया वही, जो तुम्हारे मन में था। तुम्हें क्लेम सीट मिल गई थी। तुम खुश थे। मुझे अच्छा नहीं लगा था। अफसरों को तुम्हारे जैसे किसी 'चंपू' की जरूरत थी और तुम्हें संपन्न बनने की जरूरत! महत्वाकांक्षाएं कहां छिपती हैं बन्नी? तुमने कहा भी था, "पैसा आदमी को ताकतवर बनाता है। मैं ताकतवर बनना चाहता हूँ।"

लेखक परिचय- ज्ञानप्रकाश विवेक

जन्मः 30 जनवरी 1949 (बहादुरगढ़)
ओरिएंटल इंशोरेंस कम्पनी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन

नौ कहानी-संग्रह प्रकाशित जिसमें से 'पिताजी चुप रहते हैं', 'शिकारगाह', 'मुसाफ़िरख़ाना' और 'सेवानगर कहाँ है' विशेष रूप से चर्चित।
चार उपन्यास- गली नम्बर तेरह, अस्तित्व, दिल्ली दरवाज़ा तथा आखेट (भारतीय ज्ञानपीठ से शीघ्र प्रकाश्य)
चार ग़ज़ल संग्रह- धूप के हस्ताक्षर, आँखों में आसमान, इस मुश्किल वक़्त में तथा गुफ़्तगु अवाम से है।
कविता-संग्रह- दरार से झाँकती रोशनी
आलोचना-पुस्तकः- हिन्दी ग़ज़ल की विकास यात्रा
पता- 1875, सेक्टर-6, बहादुरगढ़-124507
हरियाणा
लेकिन बन्नी, मेरी हसरत यह थी कि तुम अच्छे मनुष्य बनो। लेकिन परेशान करने वाली बात ये थी कि तुम उस तरह के ताकतवर इंसान बनना चाहते थे, जो प्रतिदिन क्रूर होता जा रहा है... यह अजीब बात थी कि एक कायर, दब्बू और बेचारा सा लड़का ताकतवर बनना चाहता था- बा-रास्ता पैसा! वह कोई और नहीं, बन्नी था, जिसे मैं प्यार करने लगी थी।

बन्नी, मैं चाहती थी कि तुम अनुभूतियों के खेल खेलो। पानी की लहरों पर तैरती उजली धूप को अपने भीतर उतारो, किसी दरख्त को देखते-देखते दरख्त जैसे हो जाओ। तुम परिंदों की तरह ऊंची उड़ान भरो। आकाश जैसा असीम तुम्हारी आंखों में हो। बन्नी, मैं चाहती थी तुम बंद कमरा न बनो। ऐसा रास्ता बनो जो दूर तक जाता हो, जिस पर भावनाओं की पदचाप हो। मैं चाहती थी, तुम किसी समंदर की तरह हो जाओ, मैं किसी नदी जैसी तुम्हारी जानिब बढ़ती चली आऊँ....

लेकिन क्लेम सीट का अपना रोमांच था। ये तमाम बातें तुम्हे फालतू और मूर्खतापूर्ण लगी थीं। तुमने अपनी आँखों में रुमाल नहीं बल्कि कपड़े की पट्टियां बाँध ली थीं। मुझे अच्छा नहीं लगा था। समझा जाना चाहिए था मुझे कि तुम्हारा रास्ता मेरे संसार के रास्ते से होकर नहीं जाता...

याद है बन्नी, जिस दिन तुमने क्लेम सीट ली थी, शायद उसी शाम को हम अतुल ग्रोव रोड पर चुपचाप चलते रहे थे। हम अकसर शाम को इसी खामोश सड़क पर चलते-चलते मंडी हाउस की तरफ मुड़ जाया करते थे। यह सड़क शांत रहती, कुछ बंगले, कोठियाँ... बाउंडरी वॉल के साथ झालर तरह लटकती गोल्डनशॉलर की लताएं, अमलतास, गुलमोहर और अशोक के पेड़। एक सुकून भरी खामोशी। जैसे कोई कवि बहुत देर से चुप बैठा हो। चलते-चलते तुमने मेरा हाथ थाम लिया था। मैंने झटक दिया था तुम्हारा हाथ। तुम चौंक गए थे। डर गए थे। डरना तुम्हारी फितरत में था। तुम्हें हैरानी हुई थी... यही तुम होते थे जो इस वीरान, अकेली और नीम अंधेरी सड़क पर, चलते-चलते मुझे चूम लिया करते थे। तब तुम मुझे प्रेम की भावना से भरे युवक नजर आते थे। पर आज तुम्हारा हाथ तक पकड़ना अच्छा नहीं लगा था। मैं चुप थी। तुम चुप थे। ताज्जुब था आज हमारे पास कोई भी शब्द नहीं था।

***
उसके बाद वही तो हुआ था जैसे कि मैने सोचा था। तुम बेहद व्यस्त हो गए थे। बहुत सारी नई बातें। चालाकियाँ, लटके-झटके, तुम्हारा मुँह बनाकर, आँखे बिचकाकर बातें करना, च्युंइगम चबाते रहना.... क्लाएँट्स ....सर्वेयर.... सर्वे रिपोर्ट, साल्वेज.. यह एक नई दुनिया थी और तुम्हारे दोस्ताने वर्कशॉप वालों से थे, सर्वेयरों से थे। तुम सचमुच प्रभावशाली समझे जाने लगे थे। प्रभावित करने का एक अच्छा तरीका यह भी होता है कि व्यवस्था के सामने कोई कर्मचारी केंचुआ, कॉकरोच या रीढ़विहीन कीड़ा बनता चला जाए। मैं तुम्हें देखती। बेचैन होती। तुम क्या से क्या बनते जा रहे थे? लोगों को तुमसे ईर्ष्या होती। मुझे दुख होता। मैं इसे पतन समझती। तुम्हारे लिए ये सफलता थी।

बनवारी लाल! याद है तुम्हें, एक बार दबोच लिए गए थे तुम! बहुत ही मामूली-सी बात पर। मामूली आदमी का मामूलीपन। तुमने सॉल्वेज में पड़े रेडिएटर को चुपचाप बेच दिया था। तुमने कमाए थे 400 रु और गँवाई थी अपनी मनुष्यता।

तुम्हें तब पता नहीं था कि सिस्टम के हाथ में खुरपी जैसी कोई चीज होती है, जो आदमी की चमड़ी को इत्मीनान से खुरचती है... उन्होंने यही किया था तुम्हारे साथ। केबिन में बिठाकर हँसते रहे थे वे। उन्होंने तुम्हें जख्मी किया था और तुमसे पूछ रहे थे कि नमक कौन से ब्रांड का 'सूट' करेगा तुम्हारे जख्मों पर। तुम डर गए थे। उन्होंने फैसला मुल्तवी कर दिया था ताकि तुम दुविधा में रहो। तनाव में रहो। उनके रहमो-करम पर रहो।

याद है न बन्नी, तुम मेरे पास आए थे। तमुने मुझे संसार का एक कोना समझ लिया था, जहाँ तुम्हें राहत मिलती थी। अजीब विडंबना है न बन्नी! मैं तुम्हारा संसार नहीं थी, संसार का एक कोना थी- छोटा-सा कोना।

तब हॉल खाली हो चुका था। वक्त शायद साढ़े पांच या फिर छः का था। कुछ कलीग्ज कैरम खेल रहे थे, कुछ ताश में व्यस्त थे। तुम मेरे सामने बैठे थे किसी डरे-डरे बच्चे जैसे उदास-उदास। चुप-चुप, निराश, शिथिल, अवासाद से घिरे... पता नहीं क्या सोचकर, तुमने मेरे हाथ पर अपना माथा टिका दिया था। मैंने अपने हाथ मेज पर रखा हुआ था।
उस वक्त मैं घबरा गई थी। लेकिन तुम बहुत प्यारे भी लगे थे मुझको। मैंने थोड़ा डरते, सकुचाते हुए तुम्हारे सिर पर हाथ रखा था। तुम भावुक हो उठे थे। सिर उठाकर कहा था तुमने, "बहुत अकेला पड़ गया हूं जानकी!"

मैंने तुम्हारे होठों को अपनी उंगली से छूकर कहा था कि बुरा वक्त सबके सामने आता है।

तुमने रुँधे गले से कहा था, "मुझे अपने आपसे चिढ़ होने लगी है।" मेरा मन हुआ था, तुमसे पूछूँ कि चिढ़ किसलिए होने लगी है- गलत काम किया इसलिए या कि गलत काम पकड़ में आ गया इसलिए? लेकिन मैंने कहा कुछ भी नहीं था। क्योंकि यह वक्त तुम्हें कुरेदने का नहीं था। यह वक्त तुम्हे तसल्ली देने का था।

शायद तुम्हें याद हो- अगले दिन हम जामा मस्जिद के पिछवाड़े से एक पुरान रेडिएटर खरीद कर लाए थे। सॉल्वेज में रख दिया था। हिसाब-किताब पूरा चैप्टर क्लोज। मामला रफा-दफा। तुम बच गए थे। तुम खुश थे। तुम्हारी खुशी मेरा सुख था बन्नी। तुम खुश थे। मैं सुखी थी।

मुद्दतों बाद, शाम को हम फिर उसी अतुल ग्रोव रोड पर निकले थे। वह जाड़े की सर्द शाम थी। अंधेरा जल्दी ही इमारतों और दरख्तों पर गिर गया था। सड़क पर दूधिया रोशनी का सैलाब था। लेकिन सड़क सुनसान थी। तुमने मुझे अपने साथ सटा रखा था। उस दिन तुमने बहुत बार मुझे देखा था। तुम्हारी आंखें नम हो जातीं। तुम मुझे प्यार करने लगते। मैं मुस्कुरा देती... ऐसा लग रहा था जैसे हम मुहब्बत की सालगिरह मना रहे हैं।

पता नहीं क्यों, उस दिन मुझे ऐसा लगने लगा कि तुम लौट आए हो मेरे पास। अपने बनवारी लाल को तुम पीछे छोड़कर मेरे बन्नी हो गए हो- मुकम्मल मेरे बन्नी!

हम त्रिवेणी में बैठे रहे थे देर तक। बाहर बैठना हमें अच्छा लगता। यहां फूल-पत्तों-लताओं की छत थी। कुछ पत्ते हमारे पास अठखेलियां कर रहे थे। मैं पत्ता तोड़ती, उस पर लिखती- बन्नी। फिर वही पत्ता तुम्हें देती। तुम देखकर हँस पड़ते। तुमने संजीदा होकर पूछा था, "घर नहीं जाओगी जानकी?"
मैने हंसते हुए कहा था, "घर तो मेरे सामने बैठा है।"
तुम पता नहीं किस बात पर बहुत गंभीर हो गए थे। शायद किस गणित में उलझ गए थे तुम। तुमने इतना कहा था, "पगली हो!"
मैने गहरी सांस ली थी। कहा था, "मेरी तरह जीवन-शैली जीनेवाले या तो पिछड़ जाते हैं या फिर पागल समझ लिए जाते हैं"

बन्नी, मैं पागल तो नहीं हुई, पिछड़ जरूर गई हूँ। लेकिन खुद को नहीं खोया मैंने। अपनी निजता को बचाए रखा है, और तुम? तुमने अपनी मनुष्यता को किसी डस्टबिन में डाला और आगे बढ़ गए...

कंपीटीटिव टेस्ट के लिए भी तुमने चालाकी बरती। मुझ रोक दिया। मैं पेपर देती तो वह कुंठा तुम्हें घेर लेती। तुम नर्वस हो जाते। नतीजा- फेल हो जाते.... तुम सेलेक्ट हो गए, अफसर बन गए। और फिर उसके बाद की यात्रा किसी पैराशूट जैसी रही। तुमने पलटकर नहीं देखा था। टारगेट था तुम्हारा- सर्वश्रेष्ठ होना। और मैं कहीं बहुत पीछे खड़ी, ठगी-सी तुम्हें देखती रही। तम अपने पैरों की गर्द उड़ाते आगे निकल गए, बहुत आगे...।

***
चर्चित कथाकार ञानप्रकाश विवेक की कहानियों में सामाजिक विडम्बनाओं के विभिन्न मंजर उपस्थित रहते हैं। उनकी कहानियाँ बाज़ारवादी तन्त्र से संचालित होते नये समाज का अक़्श और नक़्श हैं। कहानियों के पात्र बेचैन और चिन्तातुर हैं तो इसलिए कि समाज इतना निस्संग और क्रूर क्यों होता जा रहा है। यही तनाव इन कहानियों में है।... संभवतः इन कहानियों के लेखन के पीछे कहानीकार का यही मक़सद रहा है।

ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी-संग्रह 'शिकारगाह' के पृष्ठ कवर पर छपी एक टिप्पणी।
क्या यह तुम्हारी क्रूरता नहीं थी कि तुमने अपनी शादी का निमंत्रण-पत्र मुझे दिया था? नहीं, मेरे पैरों की जमीन नहीं खिसकाई थी तुमने। तुमने मुझे साइयनायड भी नहीं दिया था कि मैं मर जाती .. । तुमने ठगा जरूर था मुझे। शादी से पहले क तमाम औपचारिकताएं छुपाएं रखी थी तुमने..। तुम मुझसे मिलते रहे थे। बेशक तुम्हार मिलना भावनाओं से भरे युवक का मिलना नहीं होता था। फिर भी तुम मिलते। तपाक से बातें करते।

तुम प्रशासनिक अधिकारी बन चुके थे। मै वही की वही। एक सामान्य-सी असिस्टेंट! क्लास थ्री। तुममें आत्मविश्वास भरा था। सिगरेट भी तुम कीमती पीने लगे थे। अपने छोटे-से केबिन में जब तुमने अपनी शादी का कार्ड दिया तो मैं हतप्रभ रह गई, जैसे अचानक किसी ने मुझे अंगारों के बीच फेंक दिया हो! जैसे अचानक किसी ने मेरे अंदर की आत्मा निकाल ली हो! जैसे अचानक किसी ने मेरी सोचने की ताकत छीन ली हो।

तुमने कहा था, "प्रगति मैदान.. फुलकारी में डिनर है।" तुमने कहा था, "मैं बहुत खुश हूँ..." तुमने कहा था, "लड़की बहुत सुंदर है।"

बन्नी उस वक्त मैं बहुत कमजोर अकेली और असुरक्षित हो गई थी। तुम्हारे केबिन से कार्ड लेकर उठी थी। पता नहीं क्या हो गया था मुझे। कुल एक मिनट का रस्ता था तुम्हारे केबिन से मेरी सीट तक। लगता था, मैं एक सदी से चल रही हूँ। रिश्तों में सचमुच एक सदी जितनी दूरी आ गई थी। लगता था मैं एक सदी बूढ़ी हो गई हूँ। मैं बैठ नहीं सकी थी। बहुत अस्थिर थी मैं। आधा दिन छुट्टी ली थी मैंने और न जाने क्या सोच कर अतुल ग्रोव रोड पर चली आई थी। मैं अकेली थी। व्यथित थी। बेक़ैफ थी। बेचैन थी। कितनी फालतू, कितनी व्यर्थ थी मैं। मैं सोचती। अवसाद से घिर जाती। काश, तुम मेरे साथ होते। तुम नहीं थे। मेरी आँखें भीगती। मैं आंखे पोंछती। आंसू फिर तैरने लगते।

बनवारी लाल, लोग बताते हैं कि बारातवाले दिन तुम घोड़ी से गिर पड़े थे। तुम्हार मुकुट दूर जा गिरा था .. क्या यह सच है? कुछ लोगों को खूब अच्छा लगा होगा तुम्हारा गिरना। मुझे नहीं लगा था। मैंने तुमसे प्रेम किया है न। मैं तुम्हें गिरता हुआ कैसे देख सकती हूँ?... लोग कहते हैं तुमने पी रखी थी। न भी पी रखी हो। पैसे का भी तो नशा होता है। कई बार बेवजह का भी नशा होता है। शायद उसी ने गिराया हो तुम्हें.....

जब तुम्हें बनवारी लाल कहती हूं तो ऐसा लगता है, जैसे किसी बहुत पुराने, बहुत बूढ़े या लगभग अधेड़ आदमी के बारे में सोच रही हूँ। वक़्त भी तो कितना बह चुका है। वक़्त मेरी-तुम्हारी कितनी-कितनी उम्र चुराकर ले गया। पता नहीं चला। बेशक तुम बूढ़े नहीं हुए, मैं भी नहीं हुई लेकिन तुम्हारे शरीर का भूगोल बेडौल हो गया है... बहुत अरसे बाद देखा है तुम्हें। इस बीच तुम यहाँ से ट्रांसफर हो कर गए। फिर कई सारे दफ्तर, कई सारी जगहें, नए शहर, नयी चालकियां, नई दोस्तियां नए समीकरण..... नए प्रमोशंस......

इतने सालों बाद आज फिर तुम इस दफ्तर में डिवीजनल मैनेजर के रूप में और मैं। वही सीनियर असिस्टेंट। मैं तम्हें देखती हूँ। अतीत का कोई जर्द पत्ता सरसराता हुआ मेरे सामने आ गिरता है। तुमने एक बार हॉल में नजर दौड़ाई है। शायद मुझे भी देखा हो तुमने.... शायद उस सीट को भी देखा हो जहां तुम पहलेपहल बैठे थे।.... मैने तुम्हें देखा था। तुम्हारे चेहरे पर दर्प था, अंहकार था।

बनवारीलाल, यह वही दफ्तर हैं, जहाँ तुमने अपना नाम बताया था मुझे अटकते-अटकते। झिझकते हुए बी ...बी ...बी एल विश्वास! यह वही दफ्तर है जहां एक सिरे पर तुम बैठे होते, दूसरे सिरे पर मैं। मिस्टर बनवारी लाल, बिल्कुल यह वही दफ्तर है जहां तुमने पुराने रेडिएटर की चोरी की थी। जहाँ तुमने मेरी हथेली पर अपना माथा टिकाकर कहा था, "तुम न मिली तो मैं खो जाउंगा जानकी!.... तम्हारा होना मेरी जिंदगी का विश्वास है।"

खैरमकदम बनवारी लाल .. स्वागतम् ... सुस्वागतम्... हार्दिक अभिनंदन! आप फिर इस दफ्तर में आए हैं। मुद्दतों के बाद डिवीजनल मैनेजर बनकर। रुतबा, शोहरत, ओहदा, गुरूर. महत्वाकांक्षाएं, लाइफ स्टाइल बहुत कुछ साथ लाए हैं आप! आदमी के पहुंचने से पहले उसके कारनामे पहुँच जाते हैं। पता है ना आपको... हर मनुष्य अपनी पर्सनालिटी और उसका एटमॉस्फेयर भी साथ लेकर आता है। ठीक कह रही हूँ न!... यहां कुछ भी नहीं बदला, न दीवारें, न फर्नीचर, न माहौल, बदले हैं सिर्फ आप। कितन लैमिनेटेड चेहरा लग रहा है आपका भद्रजन! श्रेष्ठ पुरुष!

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आपने अपने चैंबर में बुलाया है हम सबको, जिनमें मैं भी शामिल हूँ। कितने सार संस्मरण सुनाए हैं तुमने! तम्हारी याद्दाश्त यानी मेमोरी खूब है बनवारी लाल!

मैं पूछना चाहती हूँ तुमसे- क्या याद है तुम्हें अतुल ग्रोव रोड का एकांत, सुनसान सड़क, हमारा साथ-साथ हाथ पकड़कर चलना। एक विचित्र संसार का निर्माण करना? त्रिवेणी... नत्थू स्वीट्स और स्कूल लेन जहां से हम घूमते हुए फ्लाइओवर पर चढ़ जाते थे। मैं पूछना चाहती हूँ, क्या याद है वो दिन, जिस दिन मैंने दिवाकर को थप्पड़ मार दिया था? वो तुम पर लगातार जेमक्लिप फेंक रहा था। तुमने सहन कर लिया था? पर मुझे सहन नहीं हुआ था।

तुम्हारा अपमान मुझसे कभी सहन नहीं हुआ मिस्टर बनवारी लाल!

तुम्हारे चैंबर से सभी लोग बाहर चले गए थे। उनके साथ मैं भी उठ खड़ी हुई थी। तुमने मुझे बैठने का संकेत किया था। मैं बैठ गई थी। सोचने लगी थी कि शायद तुम अतीत की कोई बात करो। लेकिन तुमने परेशान करने वाला सवाल पूछा था, "मिस या मिसेज?"

यह प्रश्न मुझे अच्छा नहीं लगा था। इस प्रश्न में जो संकेत निहित थे उन्हें मैं पहचान रही थी। मैं चुप बैठी रही। तुम बेहद चालाक और शातिर दिमाग रखते थे। तुमने मेरी चुप के अर्थ जान लिए थे। तुम मन ही मन खुश हुए थे। शायद तुम यही चाहते थे। जानकी नाम का खिलौना अब भी तुम्हारा लिए रखा हुआ था- महफूज, सुरक्षित।

तुम मुस्कराए थे। तुम्हारा मुस्कुराना मुझे अच्छा नहीं लगा था। कुटिलता थी उसमें। तुमने अपनी नजर मेरे वक्ष पर टिका दी थी। इस बीच तुमने एक बार फोन अटेंड किया था। फोन रखा। नजर फिर वहीं। मुझे संकोच हुआ था, तुम्हें नहीं। तुम मुझे देखते रहे। तुम्हारे अंदर कोई जंगली पशु था, जो जाग गया था। तुम इस तरह तो नहीं देखा करते थे मुझे। अक्सर नजरें झुका लेते। मुझे अच्छा लगता। लेकिन आज... तुम ऐसे देख रहे थे जैसे कि मैं सिर्फ एक 'देह' हूँ।

मैं कहना चाहती थी, "शिखर-पुरुष, ऐसे मत देखो" कहा नहीं था मैने कुछ भी।

लेकिन तुम अपनी गलाजात छिपा नहीं पाए थे। कहा था तुमने, "पहले की तरह स्मार्ट हो ..." और कहकर चुप हो गए थे तुम। मुस्कुराए थे। मैं तुम्हारे वाक्य पर अटकी थी। तुमने मुस्कुराते हुए कहा था- "स्मार्ट हो और सेक्सी भी।"

मैं कांप गई थी। लगा कि मेरे शरीर में कोई विस्फोट हुआ है। फट पड़ी हूँ मैं। तुम ... तुम ऐसी बात कह रहे थे। तुम्हारे शब्दकोश में ऐसे शब्द नहीं हुआ करते थे। क्या मेरा और कोई रूप नहीं था शिखर-पुरुष? तुमने एक बार सिर्फ एक बार, मेरे भीतर की स्त्री से साक्षात्कार किया होता... शिखर -पुरुष! कैसी विडंबना है, तुमने अपनी जेहनियत का एक्स-रे निकालकर मुझे दे दिया था। मुझे ऐसे लगा था कि बड़ी-सी मेज के उस पर बहुत छोटा आदमी बैठा है।

मैंने अपना ट्रांसफर करवा लिया है शिखर पुरुष! मैं तुम्हारे विकास से नहीं, पतन से घबरा गई हूँ। इस दफ्तर का साम्राज्य मुबारक हो बनवारी लाल।

और मैं . मैं अब भी त्रिवेणी में अकेली बैठी, किसी लटकती बेल के हरे पत्ते को तोड़ूँगी। कुछ याद करूँगी। फिर अपने नाखून से एक नाम लिखूंगी- बन्नी।

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11 कहानीप्रेमियों का कहना है :

neelam का कहना है कि -

achchi kahaani ,ek purush ne stri ki bhaavnaaon ko khud jiya hai aur likha hai .
us waqt to nahi padhi thi ,par abhi padhi hai ,aur kahaani marmsparshi lagi .

buddhinath का कहना है कि -

VIVEK JI KI YEH KAHANI SACHMUCH BAHUT ACHCHHI HAI.UNHE BADHAI.ISME 'PARASHURAM KE DHANUSH' KI JAGAH 'SHIV KA DHANUSH' HONA CHAIYE.ISEE TARAH KAKROCH HI HINDI ME TILCHATTA HAI.BUDDHINATH MISHRA

rachana का कहना है कि -

कहानी लिखने का तरीका बहुत ही अच्छा है .भाषा शब्द सब कुछ .इतने बड़े कहानी कार की कहानी पर कुछ भी लिखना सूरज को दिया दिखाना है
अति सुंदर कहानी
सादर
रचना

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह का कहना है कि -

Very fine character building and narration by sri Gyan Prakash Vivek.
I liked this story which represents the present inhuman scenario.
Regards to Hindi Tugm for their contribution for Hindi.
Dr.Bhoopendra

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह का कहना है कि -

Very fine character building and narration by sri Gyan Prakash Vivek.
I liked this story which represents the present inhuman scenario.
Regards to Hindi Tugm for their contribution for Hindi.
Dr.Bhoopendra

sangeeta sethi का कहना है कि -

ज्ञानप्रकाश जी को यूँ तो बहुत जगह पढ़ा है पर आज नेट पर देख कर ख़ुशी हुई | कहानी विचारों और भावनाओं के धारा प्रवाह वाली कहानी है| एक इंश्योरेंस कंपनी में क्लेम में ही काम करने के कारण कहानी और करीब लगी|

संगीता सेठी

शोभा का कहना है कि -

बहुत ही संवेदनशील और भावुक कर देने वाली कथा। सामाजिक यथार्थ का बहुत सुन्दर आइना। एक-एक वाक्य सच्चाई को बहुत करीब से कह गया। कथाकार तथा युग्म को बधाई।

Kumar Gautam का कहना है कि -

poetic and extremely emotional...romantic and picturesque.

k.r. billore का कहना है कि -

kahani bhut achi lagi, shikhar-purush ke estr se patan purush ka safar hamare pragtishil samaj ka sach hai kahani marmik ,savedenshil lagi ,,,,,,,,,,,aapke lekhan per badhai ,,,,,,kamana mumbai..

शोभना चौरे का कहना है कि -

shikhr purush khani apne nam ko sarthak karti ak sashakt khani aadmi ke badlte bhavo ko bhut imandari ke sath ukera hai .
bdhai

sumitra 21 का कहना है कि -

बेहतरीन अंदाजे बयाँ ,शिल्प बेजोड़ ,बिम्बों के माध्यम से कथा आगे बढती है ,,दिल को छू लेने वाली सशक्त रचना ,,,कई दिनों तक मन में छायी रही

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