Thursday, December 11, 2008

13 जुलाई 2010 : प्लास्टिक की पलकें

निखिल सचान द्वारा रचित धारावाहिक कहानी 'चिंदियों के पैबंद' शृंखला के दो भाग '10 मार्च ,1998 : इतिश्री' और '14 जुलाई 1998 : मिट्टी के असबाब' पढ़ चुके हैं। आज पढ़िए इसकी तीसरी कड़ी॰॰॰॰




१३ जुलाई २०१० : प्लास्टिक की पलकें


वो शायद आरव नहीं था और मैं चाहता भी नहीं हूं कि वो आरव हो लेकिन मुझे कहानी से मतलब है और एक नाम से भी , इसलिए मैं उसे आरव ही कहूंगा , क्या पता वो बाद में आरव ही निकले और एक अतिरिक्त नाम और एक रिक्त शब्द का मेरा खर्चा बच जाए .बस इतना ज़रूर पता है कि उसके घर में भी वैसी ही डाइरी की चिंदियों के पैबंद मिले थे जैसे मैंने आरव के पास से निकाले .
खैर ये हिस्सा शुरु होता है ठाणे पोलिस स्टेशन , मुंबई से .
आरव लकड़ी की एक बेंच पर बैठा हुआ था , उसे पहचानना ज़रा मुश्किल था . आंखों के नीचे काले घेरे , झाइयां , घुंघराली झुर्रियां और उथले गड्ढे अपनी अपनी स्पष्ट सत्ता बनाए नुमायां थे और उनका अस्तित्व बाकी चेहरे के अस्तित्व के मुक़ाबले कहीं से भी कमती नहीं था . उसकी आंख आधे हांथ के पोलिस के डंडे और उसके नीचे रक्खी लाल फ़ाइल पर झूल रही थी और उसे दोनों चीज़ें आपस में घुलती हुई दिखाई दे रही थीं . कोई भी दो आस पास रक्खी चीज़ों में सही सही फ़रक़ करना उसके लिए आसान काम नहीं था . एक टक घूरते रहने के अचानक बाद उसे एक झटके से ध्यान आता था कि उसके सिर का वज़न सम्भालना उसके लिए आसान नहीं है इसीलिए जैसे ही उंगली चिटकने की आवाज़ के जैसे एक चुटकी उसकी गर्दन के पीछे बजती थी, वो दोनों हंथेलियों के बीच अपनी गर्दन थाम कर उसे वापस सही ठिकाने पर रख देता था .
उसके एक हांथ में मोबाइल था और दूसरे हांथ में अखबार .मोबाइल बासी और अखबार ताज़ा . मोबाइल की स्क्रीन पर कोई नेट्वर्क का निशान नहीं , ना ही बैटरी का .अखबार के पहले पन्ने पर किसी ना पहचानी हुई जनानी लाश की खबर थी .
वो बार बार अपना मोबाइल अपने कान पर लगाता था , फ़िर हांथ से झटकता था , हेलो जैसा ही कुछ बोलता था और फ़िर उसे खिड़की की ऊंचाई तक ले जाकर सिग्नल पकड़ने की कवायद करता , लेकिन मोबाइल सिग्नल नहीं पकड़ रहा था क्योंकि उसे शायद ही होश था कि वो बस दस साल पुराने खिलौने जैसी कोई चीज़ ही हांथ में लिए हुए था .जिसमें ना तो कोई बैटरी ही थी और ना ही शायद कोई सिमकार्ड भी .
ये फोन एक मात्र ऐसी चीज़ थी जो हमेशा उसके पास रहती थी . रात में सोने के लिए वो उसे अपने कान से सटाकर लेटा रहता था .सारी रात सीलिंग ताकता रहता था और किसी के फोन आने का इंतज़ार करता रहता था .इसी खेल में रात ज़ाया हो जाया करती थी और कभी कभी नहीं भी .फोन के माउथपीस पर वो रात भर कुछ कुछ बुदबुदाता रहता था .बीच बीच में उसे तकिए पर पटककर सिग्नल देखता रहता था या फ़िर बिस्तर के बगल में लगी दीवार पर खुदी खिड़की की सीखचों के बाहर उसे लहराने लगता था कि अब शायद सिग्नल आ जएगा. आंखें बंद करने की कोशिश करता तो अचानक से तेज सिहरन और उलझन गुंथ कर उसके सीने में कई चक्कर दौड जाया करती थीं और वो अपनी दुबली पिंजरनुमा छाती घबराकर रगड़ने लगता था .कभी कभी थोड़ी देर बाद आराम पड़ जाता था लेकिन ज्यादातर बार नहीं भी .संक्षेप में बताऊं तो उसे एक्यूट इंसोम्निया था . अजीब अजीब इल्यूज़न्स होते थे और किसी इल्यूज़न के दौरान ही उसके आंखें बंद हो पाती थीं , भ्रम खतम और शटर की तरह आंख भी खुल जाती थी .वो खिलौने वाली गुड़िया तो देखी ही होगी ना तुमने जिसे झुकाओ तो गोल बटन सी आंख अपने भार से खुद बखुद बंद हो जाया करती थीं और खड़ा कर दो तो चुड़ैल प्लास्टिक की पलकों से कैसे आंखें फ़ाड़ फ़ाड़ कर घूरने लगती थी !
आरव भी ऐसा ही हो गया था . उसकी अखरोट के रंग वाली आंखें भी वैसे ही इल्यूज़न्स के इशारों पर रात भर गुलामी करती रहतीं थीं .
भ्रम लम्बा खिंच गया तो नींद की सब्स्टीट्यूट बनकर बेहोशी सी आ जाती थी और नींद की ज़रूरत भी पूरी कर ली जाती थी . और इसी से दिमाग की उलझी पड़ी नसों की छोटी मोटी मरम्मत भी हो जाया करती थी .बहरहाल जीने का कारोबार ज़िंदा था ....

यहां ,स्केच बनाने वाला आरव के पास लाया गया . होलकर , शिंदे और गोडसे आरव की बेंच के बगल में खड़े थे . होलकर बोला ,
"सर मैं अब भी कहता हूं कि ये साला किसी कातिल का स्केच नहीं बनवा पाएगा , इसे कुछ पता भी नहीं है हलकट को . खाली पीली टाइम खोटी करने आया है .पता नहीं खुद को भी पहचानता है कि नहीं साला "
"देखो कैसे घूरता है एक नज़र में , जैसे अखबार जला देगा आंख से ! "
शिंदे को भी ख़ास भरोसा नहीं था उस पर लेकिन दिल्चस्पी ज़रूर थी ये जानने में कि वो जैसा सोच रहा है वैसा ही कुछ है कि नहीं ?.
गोडसे को लग रहा था कि शिंदे और होलकर क्यों उसकी घंटों की मेहनत खराब करने पर तुले हुए हैं ...ख़ास तौर पर तब , जबकि ये साफ़ था कि लड़की का ख़ून नहीं हुआ है और वो क्रानिक इंसोम्निया की शिकार थी ,इसी के चलते वो बड़ी बड़ी बिना नींद की खुली हुई गोल काली आंखें लिए बिस्तर पर पड़ी मिली थी . पूरे शहर में उसे पहचानने वाला कोई था नहीं और पहचानाता भी होता तो मुंबई में ज़बर्दस्ती अपनी देने आता ही कौन है !
"काए रे ! जानता है तू उसे ? "
उसने फ़िर घूरा ...
"हां "
"कातिल को ? "
इस बार खाली घूरा...ज़वाब नहीं दिया ...
"बोल ना ..जानता है कातिल को ? "
"हां "
"ठीक है ..गोडसे तो ले के जा इसे अंदर और स्केच तैयार करा ."
आरव और गोडसे अंदर चले गए .
"कैसा बदन था ? "
"इकहरा "
"नाक ?"
"नुकीली "
गोडसे धीरे धीरे डीटेल्स लेने लगा और कैन्वस पर एच.बी. ने एक शकल को उकेरना शुरू कर दिया.बीच बीच में वो आरव पर खीझता भी था और चिल्लाता भी क्योंकि आरव लगातर ऊंघ रहा था और फ़िर वो प्लास्टिक की पलकों वाली कमीनी गुड़िया के जैसे गोडसे को घूरने लग जाता था ....
आरव के ६ बाई ८ के कमरे में अजीब अजीब से असबाब फ़ैले पड़े थे .
पूरे घर में एक भी शीशा नहीं था ,रोशनी के नाम पर बस ज़ीरो वाट का बल्ब . बेड-पोस्ट पर रेस्ट्रां के कुछ बहुत पुराने बिल पड़े थे . ध्यान से सिग्नेचर देखने पर पता पड़ जाता था कि वो सब लगभग ११-१२ साल पुराने हैं . ज्यादातर में आर्डर रिपीट हुआ था , १ वेज-सैंडविच और दो कप मोका. रेस्ट्रां का नाम ’द सिज़लर्स’ , कोलाबा .
बेड पोस्ट के ठीक ऊपर एक कैलेंडर टंगा हुआ था जिसमें कुछ कुछ तारीखों को आरव ने लाल मार्कर से गोल घेरा हुआ था और कुछ लगातार तारीखों पर काला क्रास .नवम्बर ४ से २८ . लाल घेरे पर एरो लगाकर कुछ कुछ चार लाइनों की पोएट्री अथवा गज़ल .
बेड के नीचे एक बर्थडे केक का डिब्बा भी रक्खा हुआ था जिसकी साइड वाल्स पर बटर क्रीम की फ़ंगस लगी हुई थी . और वैसी ही सहेजी हुई काफ़ी सारी चीज़ें और वैसी ही लिखावट की डायरी जिसकी वजह से मुझे लगा कि वो आरव था .
दो तीन पेंटिग्स पड़ी हुई थीं , जिस पर उसने सिरफ़ घुंघराले बाल और एक सुन्दर सी मुस्कान उकेरी हुई थी . एक प्यारी सी लड़की की उससे भी ज्यादा प्यारी मुस्कान कि कसम से किसी को भी पल भर के लिए उसकी दुनिया से खींच ले जाती मनमोहनी और उसके सारे ग़म अपने जादू से ग़लत कर देती . ये वैसी लड़की की हंसी नहीं थी जो सोफ़िस्टिकेशन के उसूलों के तहत हथेली या नैपकिन के पीछे दबाकर हंसी गई हो .ये एक ऐसी लड़की की हंसी थी जो ऊपर वाले की महर नज़र आती थी , उसके सबसे बेशकीमती मोतियों की ख़नक,चमक,धमक और हनक के साथ जीवंत !
काश उस लड़की की पूरी तस्वीर आरव ने बनाई होती तो देखने वालों के बहुत से मुग़ालते दूर हो गए होते जिसे वो आज तक भूलवश खूबसूरती समझा करते थे वो तो इस तस्वीर के अतिरिक्त और कहीं बेनक़ाब हुई ही नहीं ! ऐसे घुंघराले बाल जो सिर्फ़ किसी की पतली पतली उंगलियों से सुलझाने के लिए ही बने हों . कंघा लगा दो तो शायद बेचारी भोली परी चीख पड़ती ...
बेड पर कुछ कागज़ के टुकड़े पड़े थे जिन पर बच्चे की लिखावट में गज़लों की लाएनें लिखी हुई थीं,एक के ऊपर एक ,जैसे कि अंधेरें में लिखने की कोशिश की गई हो और उसी से लाइनें एक के ऊपर एक अंधेरे में भटक कर लिपट गई हों या फ़िर अंधेरे का फ़ायदा उठा कर लिपट गई हों .पन्नों को दबाने के लिए पेपरवेट की तरह उन पर एक काले वेलवेट के कवर की डायरी रक्खी हुई थी और उसमें सुर्ख लाल ग़ुलाब के जीवाश्म भी दबे पड़े मिले थे , जो पन्नों में घुट कर लाल बुरादा हो चले थे लेकिन तबियत से सूंघो तो यक़ीन होता था कि तबस्सुम की उमर रूह की उमर से कितनी ज्यादा लम्बी होती है .खुशबू अभी भी ताज़ा थी ....
ख़ैर ..यहां पोलिस स्टेशन में गज़लों और तबस्सुम की दुनिया से अलग-थलग एक दूसरी दुनिया थी जहां पर अभी भी गोडसे ,आरव के साथ सर खपा रहा था .
"और कोई ख़ास निशानी बताना चाहते हो ?"
"नहीं..."
"कुछ बाकी रह गया हो तो बता दो ..."
"नहीं.."
गोडसे को लगा कि उसके साथ काफ़ी मज़ाक हो चुका था...पर्याप्त मात्रा में , वो अब और झेलने की दशा में बिल्कुल नहीं था . दशा में यदि था भी तो कम से कम मूड में तो बिल्कुल नहीं था .कार्यवाही और ज़िम्मेदारी दोनों खतम मान कर उसने घंटों से कैनवस के कूल्हे घिसती हुई एच.बी. की नोक मेज पर पटककर गर्दन से तोड़ डाली और शिंदे को आवाज़ दी .शिंदे अंदर आया तो कुर्सी पर आरव अभी भी बीच बीच में ऊंघ रहा था .
मेज पर अख़बार पड़ा हुआ था ,जिस पर घुंघराले बालों वाली जनानी लाश की तस्वीर थी ...
साथ में पड़ा था गोडसे का बनाया हुआ स्केच ...
ये नुकीली नाक, अखरोट सी आंखें और इकहरे बदन वाले एक तीस साल के नौजवान की तस्वीर थी .उसकी शकल में कुछ झुर्रियों ,काले घेरे , घुंघराली झाइयां और बाकी बचे कुछ गड्ढे जोड दिए जाते तो ये साफ़ था कि यही चेहरा कैनवस से निकल कर सामने बेंच पर ऊंघ रहा था ...
लड़के और लड़की की तस्वीर के बीच में एक मोबाइल पड़ा था जो नेटवर्क पकड़ने की अभी तक कोशिश कर रहा था ....
अखबार और कैनवस में कुछ प्लास्टिक की पलकों वाली आंखें भी पड़ी थीं दोनों की ...एक की बंद और दूसरे की खुली ...
मोबाइल जादू की छड़ी जैसा ....
इशारे पर आंखें खोलता बंद करता हुआ...
अभी भी नेटवर्क की तलाश में बेवकूफ़ ...
मुझे डर है कि वो आरव ही था ....

क्रमशः॰॰॰॰

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कहानीप्रेमी का कहना है :

संजीव सलिल का कहना है कि -

कहानी में अनावश्यक रूप से अंगरेजी शब्दों का प्रयोग खटकता है. इल्यूजन, डिटेल्स, शटर, सब्सटीट्यूट, रिपीट जैसे शब्द जिनके लिए हिन्दी में समुचित शब्द हैं, अखरते हैं जबकि प्लास्टिक, स्टेशन, मोबाइल आदि स्वाभाविक लगते हैं. कहानी बोझिल हो गयी है.

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