Thursday, March 5, 2009

सोमनाथ का टाइम टेबल- नया ज्ञानोदय द्वारा पुरस्कृत ७वीं कहानी

इनदिनों आप पढ़ रहे हैं नवलेखन पुरस्कार २००८ से पुरस्कृत कहानी-संग्रह 'डर' की कहानियाँ। अब आपलोग इस कहानी-संग्रह की छः कहानियाँ (डर, चश्मे, 'मन्नन राय ग़ज़ब आदमी हैं', स्वेटर, रंगमंच और सफ़र) पढ़ चुके हैं। इस कहानी-संग्रह का विमोचन १४ मार्च २००९ को 'हिन्दी भवन सभागार, नई दिल्ली' में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के हाथों किया जायेगा। इस कथा-संग्रह के रचयिता और हिन्द-युग्म के सदस्य विमल चंद्र पाण्डेय इस कार्यक्रम में इसी कहानी-संग्रह से किसी कहानी का कथापाठ भी करेंगे। आप सभी आमंत्रित हैं। पूरी जानकारी जल्दी ही दी जायेगी। आज पढ़िए इस कथा-संग्रह की सातवीं कहानी 'सोमनाथ का टाइम टेबल'


सोमनाथ का टाइम टेबल


या कुन्देनदुतुषारहारधवला
या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा
याश्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशकरप्रभृतिभिर्देवैसदावन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।

चार बजे - जागना
चार से साढ़े चार - फ्रेश होना और नहाना
साढ़े चार से पांच - पूजा करना
पाँच से छ: - पढ़ना (याद करना)
छह से सात - टहलने जाना और व्यायाम करना
सात से नौ - पढ़ना
नौ से साढ़े नौ तक - नाश्ता करना
साढ़े नौ से दस तक - लता मंगेशकर के गाने सुनना
दस से एक - पढ़ना
एक से डेढ़ तक - भोजन करना
डेढ़ से दो तक - आराम करना
दो से पांच तक - पढ़ना
पांच से छ: तक - मनोरंजन (बाहर टहलने जाना)
छ: से नौ तक - पढ़ना
नौ से दस तक - भोजन करना
दस बजे - सो जाना


नोट - "विद्यार्थी के लिए कम से कम छह घंटे की नींद बहुत जरूरी है।"

विवेकानंद - "उठो, जागो और तब तक चलते रहो जब तक लक्ष्य को पा न लो।"

टाइम टेबल पूरा होने पर सोमनाथ को लगा जैसे अब तक इधर-उधर बिखरा बेतरतीब जीवन दोनों हाथों से समेट कर करीने से लगा दिया गया हो।
परीक्षाओं की निकटता से सबसे ज़्यादा डर तब लगने लगता है जब ’प्रीपरेशन लीव’ घोषित हो जाती है। और वह भी बोर्ड..............बाप रे। कैसी होती है बोर्ड की परीक्षा? डराने के लिए लोगबाग कैसी-कैसी बातें करते रहते हैं। उसे लगा जैसे यह टाइम टेबल बना कर उसने अब तक की गयी सारी लापरवाहियों को जीत लिया है। अब कड़ाई से नियमों का पालन होगा। चारों किनारों पर लेई लगाकर काग़ज़ दीवार पर चिपकाते समय उसने चारों कोनों और बीच में (अच्छी तरह चिपक जाने के बावजूद) भी तीन-चार घूंसे मारे। फिर थोड़ी दूर खड़ा होकर यूं मुग्धता से देखने लगा जैसे कोई महान चित्रकार अपना चित्र पूरा हो जाने पर देखता है। अगर इसका पालन पूरे दो महीने हो जाय तो परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास होने से कोई नहीं रोक सकता। कहीं हमेशा के लिए पालन हो गया तब तो इंसान बन जाएगा, उसने मन में सोचा और विचारों को और पुख्तगी दी जो उसकी भिंची हुयी मुट्ठी से साफ दिखायी दी।

इस महीने यह उसका तीसरा टाइम टेबल था।
अभी कमरे से बाहर निकला ही था कि बरामदे में पिताजी से सामना हो गया। टाइम टेबल का पालन कल से क्यों, आज से बल्कि अभी से, काल्ह करे सो आज कर, सोचकर पांच से छह वाले स्लॉट में बाहर, ज़रा यूँ ही तफ़रीह करने निकल रहा था।
"कहां साहबजादे?" पिताजी का लहजा उसे देखकर हमेशा एकरेखीय क्यों हो जाता है।
"जरा बाहर जा रहे हैं।" उसने दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए कहा मानो ऐसे बोलने से बात तार्किक मानी जाएगी।
"ऊ तो दिखी रहा है। आप भीतर रहबे कितना करते हैं?"
मां चाय लेकर आयी और पिताजी के बगल में बैठ गयी। वह समझ गया कि आज पांच से छः वाले स्लॉट में सिर्फ़ भाषणबाजी होगी। पिताजी का मूड आज फिर किसी ने दफ्तर में सनका दिया है।
"इस उमर में हमारे दिमाग में सिर्फ़ पढ़ाई रहती थी।" पिताजी मां की तरफ़ देखते, चाय की चुस्की भरते हुए बोले।
उनके भाषण की प्रस्तावना यहीं से शुरू होती थी। बातों में आत्मप्रशंसा की गंध न आए, इसके लिए वह ’हम लोग’ से भाषण की गाड़ी का इंजन गरम करते थे हालांकि इसका सीधा और सरल अर्थ ’मैं’ ही होता था।
"जब भी समय मिलता था, हम लोग पढ़ने बैठ जाते थे। और समय मिलता भी कितना था, बारह बिगहे की खेती कम भी नहीं होती। पढ़ाई भी, खेती भी। तब भी हाईस्कूल में पूरे गांव जवार में फस्र्ट विद ऑनर्स।’’ पिताजी ने पहला गियर लगा दिया था।
"तब भी क्या उखाड़ लिया आपने? बिजली विभाग में बाबू बने बैठे हैं। आपके साथ के कितने लाखों चीर रहे हैं।’’ उसका हमेशा की तरह मन आया कि भइया का डायलॉग दोहरा दे पर वह हमेशा की तरह दबा गया। हूँ, हमेशा हाईस्कूल की दुहाई देते हैं, इण्टर, बीए में कितना था, यह कभी नहीं बताते। ऐसा सोचते समय क्षणांश के लिए उसे लगता था कि जब वह हाईस्कूल पास कर इण्टर में जाएगा तो राज़ खुलेगा कि पिताजी इण्टर में मेरिट में आए थे।
"अरे सुमित्रा, भरी नदी में तैर-तैर कर पढ़ने गए हैं हम लोग। एक हाथ में किताब और एक से तैर रहे हैं।" पिताजी ने ऐसी भंगिमा बनायी मानो वह तैर रहे हैं और उन्हें सांस लेने में तकलीफ़ हो रही है। ये मां भी। पिताजी फेंकते रहते है और ये ऐसे मुस्करा कर सुनती रहती है मानो अलिफ़ लैला की कहानियां सुन रही है।
"और सिनेमा-विनेमा के बारे में तो हमने सुना ही नहीं था कभी। पहली फ़िल्म नौकरी मिलने पर बरेली में देखी थी 'चंबल की कसम' छिहत्तर या शायद सतहत्तर में।"
"उस समय कहां इतने हॉल-वॉल हुआ करते थे।" उसने दिमाग में और भी ढेर सारी दलीलें कौंधी पर वह चुप ही रहा।
"और इनकी जेब से देखो तो.................पिक्चर की टिकट निकलती है। दो महीने हैं बोर्ड की परीक्षा और ये अय्याशी। टकसाल में पिक्चर............?"
वह सन्न रह गया। तो पिताजी इसलिए नाराज़ हैं। एकबारगी तो उसकी जान निकल गयी। कहीं 'जवानी के लुटेरे' की टिकट तो जेब से नहीं निकल आयी। मगर वह तो हॉल से निकलते ही फाड़ दी थी। फिर टकसाल का नाम सुनकर राहत मिली। उसमें तो ’बॉर्डर’ चल रही है। देशभक्ति फ़िल्म है। हालांकि दिनेश ये सुनकर उसे भी बड़े अरमानों से खींच ले गया था कि एक गाने में बड़े ’हॉट’ सीन हैं।
"परसों दिनेश का जन्मदिन था तो वह कई लोगों का बॉर्डर दिखाने ले गया था" उसने धीरे से कहा। पता नहीं पिताजी ने उस गाने के बारे में सुना है या नहीं।
पिताजी भड़क गये। "साले हमारे मित्र तो हमें कभी जन्मदिन पर फ़िल्म दिखाने नहीं ले जाते जबकि कमा भी रहे हैं। परसों अस्थाना का जन्मदिन था। हरामखोर ने चाय के साथ दो पकौड़ियां भर खिलायी थीं।"
"जैसा करेंगे वेसा ही तो भरेंगे। अपने जन्म्दिन पर आप भी तो सबको चाय पर ही टरकाते हैं।" उसने ईंट का जवाब पत्थर से दिया मगर मन में।
"पढ़ लो बेटा, पढ़ लो। यही साल-दो साल सबसे कीमती हैं। इनको संभाल लिया तो आदमी बन जाओगे।"
वह ख़ुश हो गया। यह भाषण का अंतिम अर्थात् उपसंहार का हिस्सा था। उसे याद आया कि पिताजी पिछले कई वर्षों से यही उपसंहार प्रयोग कर रहे हैं जो ज़्यादा घिसने के कारण अपनी धार खो चुका है। वरना अभी दो साल पहले तक स्थिति यह थी कि भाषण के एक दौर समाप्त होने पर उसे लगता था कि वह सचमुच बहुत अधम और आवारा है। तुरंत पढ़ने बैठता और कम से कम चार घंटे लगातार पढ़ता। तुरंत एक टाइम टेबल भी बनाता जिसमें रोज आठ से दस घंटे पढ़ने का संकल्प होता।
पिता उसकी तरफ़ से ध्यान हटा कर मां से बातें करने लगे। वह उल्टे पांव कमरे में लौट आया। पूरा मूड चौपट हो चुका था। उसने धीरे से किवाड़ बंद किए, सिटकनी लगायी और गद्दे के नीचे से रंगीन चित्रों वाली किताब निकाली। कुछ पन्ने पलटते ही उसकी सांसे तेज़ हो गयी और ख़ून का प्रवाह दुगुने वेग से होने लगा। लगातार तनती जा रही शिराओं को उसने खुली छूट दे दी और उन्मुक्त कल्पनाओं को दबी इच्छाओं के चाबुक से हांक दिया। मगर इसका क्या कहें कि बीच-बीच में बड़े अतार्किक ढंग से सलोनी याद आने लगी। उसकी मोहक हंसी, उसकी सुरीली आवाज़। उसने किताब छिपा दी और सलोनी की हंसी याद करने लगा। सभी शिराएं धीरे-धीरे ढीली होने लगीं और वह अचानक ही हल्का अनुभव करने लगा।


2.
पिताजी से ज़्यादा डर उसे भइया से लगता था। बहुत ज़्यादा। पिता की स्टाइल जानी पहचानी थी, संवाद परिचित थे और वह ज़्यादा आक्रामक नहीं थे। जबकि भईया, वह तो जैसे गिद्ध की नज़र ओर बाज की पकड़ रखता है। और उसके दोस्त, बाप रे बाप।
"किस क्लास में है बे सोमनाथ ?" गणेशी भईया ने पूछा था।
"हाईस्कूल फ़ाइनल है।" भईया ने चाय पीते हुए बताया।
"इधर आओ बे।" गणेशी भईया ने बुलाया।
वह डरता-डरता गया।
"परसों संझा समय मलदहिया पे क्या कर रहे थे ?" गणेशी भईया के सवाल ने उसे दहला दिया। वह दिनेश और तौफीक के साथ जीजीआइसी गया था, सलोनी की झलक पाने।
"मलदहिया पर ?" भईया भी चौंक गया। " गये थे बे?"
वह बहुत डर गया। हदस में उसके मुंह से आवाज़ नहीं निकली। वह जानता था कि अचानक कुर्सी से उठकर भईया तड़ाक से उसके गाल पर एक कड़क चांटा रख देगा और पूरा ब्रह्मांड उसकी आंखें के सामने नाच जाएगा।
अचानक गणेशी भईया उसका हाथ अपने पास खींच कर इधर-उधर देखते हुए बोले, "भोसड़ी वाले, आगे से लौंडियाबाज़ी करते देखे तो गांड़ काट कर भूसा भर देंगे। लंका से लेकर भोजूबीर तक हमारी पहुंच हैं। कहीं दिखना मत।"
वह रूंआंसा हो गया। गणेशी भईया ने उसे इतने गंदे लफ्ज़ों में डांटा और भईया ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ हंसता हुआ बोला, "भग बे, जाकर पढ़ाई कर।"


3. सलोनी जब से मुहल्ले में आयी है, मुहल्ला सुंदर लगने लगा है। अब नालियों में मुंह मारती सूअरें देख कर उसे गंदा नहीं लगता। कहीं भी गोबर-टट्टी पड़ी रहती है तो क्या हुआ, एक इतनी ख़ूबसूरत चीज़ भी तो इसी मुहल्ले में है।
एक अजीब परिवर्तन हुआ था। जबसे सलोनी को देखना उसे अच्छा लगने लगा था, तबसे ’रेशमा की जवानी’ और ’शीला मेरी जान’ जैसी फ़िल्में उसे गंदी लगने लगी थीं। रंगीन चित्रों वाली किताब उसने तौफीक को लौटा दी थी और फ़िल्में जाना बंद कर दिया था। एक फ़िल्म देखते हुए एक लड़की बिल्कुल सलोनी की तरह लगी थी। वह मुग्ध होकर देख ही रहा था कि लड़की ने अपने सारे कपड़े उतार फेंके। उसने वह फ़िल्म वहीं छोड़ दी और बाहर निकल आया।
"आप नयी किराएदार आयी हैं क्या ?" उसे आश्चर्य हुआ कि इतना साधारण प्रश्न पूछने के लिए उसे दस दिन छत पर टहल कर इंतज़ार करने की क्या ज़रूरत थी।
"हां। आपके बगल वाला प्लाॅट हमारा है, पापा ने अभी खरीदा है। उस पर हमारा घर बनेगा। इसीलिए हम इस मुहल्ले में आए हैं ताकि पापा मकान में जल्दी से काम लगवा सकें।’’ सुंदर लड़की ने जवाब दिया।
’’ आप बहुत सुंदर हैं।’’ उसने मन में कहा ओर प्रत्यक्षतः पूछा, ’’ इसके पहले आप लोग कहां रहते थे ?’’
’’नदेसर।’’ सुंदर लड़की ने मुख्तसर सा जवाब दिया।
’’ आपकी छत से होकर जो हवा इधर आ रही है वह बहुत प्यारी सुगंध दे रही है।’’ उसने कहना चाहा पर आवाज़ निकली, ’’नदेसर में मेरा भी एक दोस्त रहता है।’’
’’अच्छा कौन ?’’ जलतरंग सी आवाज़ ने पूछा मानो वह नदेसर के सभी बाशिंदों का डेटाबेस रखती है।
’’अनुज नाम है उसका। क्वींस काॅलेज में पढ़ता है। मैं भी। टेंथ, मैथ्स। आप ?’’ इस बार का अपना सायास प्रयास उसे अच्छा लगा।
’’मैं जीजीआइसी, टेंथ्स, आर्ट्स।’’ वह बुझ सा गया। न जाने क्यों उसे लग रहा था कि लड़की ज़रूर मैथ से पढ़ रही होगी, गणित में बहुत कमज़ोर होगी, गुणनखंड से बहुत डरती होगी और कोई दोस्त खोज रही होगी जो पढ़ाई में उसकी मदद कर सके।
’’ मेरा नाम सोमनाथ है।’’ उसने उसका नाम जानने की गरज से किसी फ़िल्म की स्टाइल दोहरायी।
’’ और मैं सलोनी।’’ लड़की ने भी शायद फ़िल्म देख रखी हो।
अब तो उसका मन हुआ कि लड़की की आंखों में आंखें डाल कर कह दे कि तुम्हारा नाम बहुत ख़ूबसूरत है, मगर अचानक उसके सारे संवाद खो गये। लड़की आसमान में देख कर एक मोहक किलकारी मार कर खुश हुयी थी। उसने भी एक बार उपर देखा और फिर लड़की की गर्दन को देखने लगा जिस पर एक सुंदर तिल था।
’’ आपको पतंगें देखना पसंद है क्या ?’’
’’ बहुत, सिर्फ़ देखना ही नहीं उड़ाना भी। जब छोटी थी तो ख़ूब उड़ाती थी, अब मां मना करती हंै।’’
जब वह उसके चले जाने के बाद नीचे उतरा तो उसका वजूद बदल चुका था। उस पर एक ख़ुमारी तारी थी और वह अनायास ही कुछ देर अकेला रहना चाहता था।


4.
भईया कोई जादूगर था। वह हर समस्या को चुटकी जाते हल कर देता। उसकी एक चमत्कारिक दुनिया थी जिसमें वह अपने दोस्तों के साथ घूमा करता था। रात को ख़ूब देर-देर से घर आता और कभी-कभी तो नहीं भी आता। उसका फोन आता कि आज रात वह अपने फलां दोस्त के यहां रुकेगा। पिताजी उसे शायद ही कभी कुछ कहते हों। पहले उसके देर से आने पर ख़ूब झगड़े हुआ करते थे। एक दिन उसने सुना, भईया चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था, ’’अपने सिद्धांत मुझ पर मत पेलिए। बहुत ईमानदारी की पुंगी बजाते रहे ज़िंदगी भर। पूरे जीवन में आपकी क्या उपलब्धि रही, ये एक घर, एक सड़े से मुहल्ले में? मैं आपकी तरह बाबू नहीं बनना चाहता। जो चाहूंगा, वहीं करूंगा।’’
उसे लगा पिताजी चिल्लाएंगे और भईया के उपर खूब बिगड़ेंगे, पर वह चुपचाप अपने शयनकक्ष मे चले गये। मां भी आंसू पोंछती उनके पीछे-पीछे चली गयी।
एक दिन भईया को खोजने पुलिस आयी थी। भईया घर पर नहीं था। दरोगा ने पिताजी को ख़ूब हड़काया था। सोमनाथ डर कर स्टोर रूम में छिपा रहा था। दरोगा की आवाज़ सुनकर ही उसे दहशत हो रही थी।
’’ आने पर कहिएगा थाने आकर मिले मुझसे नहीं तो साले के हाथ-पांव तोड़ दूंगा।’’
भईया आया तो उसने भईया को अपने तरीके से यह बात बतायी। वह उस वक्त भी डर रहा था। भईया थोड़ी देर सोचता रहा फिर गणेशी भईया को फोन मिलाने लगा।
दूसरे दिन वह सलोनी को दिखा-दिखा कर पतंग उड़ा रहा था। दोनों उस एक पतंग पर सवार होकर बादलों को चीर रहे थे। दोनों बहुत ख़ुश थे। उसने पतंग दूर तक ढील कर सलोनी को उड़ाने के लिए दी। सलोनी ने थोड़ी देर तक अच्छे से उड़ाया पर पतंग में चख अधिक थी। जब पतंग कन्निया कर पटकाने लगी तो उसने जल्दी से डोर थाम ली। अद्भुत स्पर्श...........वह सम्मोहित सा हो गया और कुछ क्षणों के लिए किसी दूसरी दुनिया में खो गया।
’’अरे संभालो गिरी........।’’
जब तक सलोनी की आवाज़ सुनकर वह पतंग को ठुमकी देता, वह छतिया कर सामने के छत पर पटका गयी थी। उसने छुड़ाने की कोशिश की पर पतंग नहीं निकली। वह सलोनी को डोर थमा कर नीचे उतरने लगा कि उसकी रुह कांप उठी। वही दरोगा उसके घर की तरफ अपनी बुलेट से चला आ रहा था। इस बार वह अकेला था। वह सरसराता हुआ भईया के कमरे में पहुंचा और तुरंत उसे ख़बर दी, ’’ कल वाला दरोगा फिर आ रहा है।’’
भईया ने बदले में उसे हिकारत से देखा।
’’क्या कर रहे थे छत पर? पढ़ाई नहीं हो रही?’’ भईया ने कड़क आवाज़ में पूछा।
गेट बजने की आवाज़ सुनकर भईया उठ कर गेट खोलने गया।
’’नमस्कार रामनाथ भाई।’’ दरोगा ने भईया को सलाम किया तो उसके मन में भईया के लिए डर और सम्मान दोनों दुगुना हो गया।
’’नमस्कार दरोगा जी। आइए अंदर आइए।’’ भईया ने गेट खोल दिया और दरोगा गाड़ी बाहर खड़ी कर अंदर आ गया।
’’ तुम अंदर जाओ मां और दो कप चाय बना दो।’’ भईया ने पीछे-पीछे गेट तक निकल आयी बदहवास दिखती मां से कहा।
वह मौका पाकर धीरे से पतंग छुड़ाने चला गया।


5.
भईया के समने पड़ने से वह अंतिम क्षण तक बचता था। और उसके दोस्तों के सामने अगर एक बार भी क्लास लगी तो हफ़्ते भर तक सपने आते हैं। गणेशी भईया से तो वह भईया से भी ज़्यादा डरता था। बहुत मरखाह थे और दो बार थप्पड़ मार कर उसका गाल सुजा चुके थे। एक दिन उसने सुना, वह भईया से कह रहे थे, ’’ गुरू तुम्हारे इलाके में नया घण्टा टंगा है, तुम नहीं बजाओगे तो हमें दिलाओ।’’
’’ अबे हम तो डायन वाला सिद्धांत लगाकर कर्म करते हैं और फल की इच्छा भी नहीं करते। तुम्हारे लिए सोचना पड़ेगा। बहुत पसंद है क्या?’’ भईया ने रस लेते हुए पूछा था।
’’पसंद.........? अब मिल जाए तो ज़िंदगी तर जाए। एकदम करारा और फ़्रेश आइटम है। तुम गुरू आदमी हो, कुछ करो।’’
’’ और तुम बेटा हो गुरूघंटाल.....।’’ भईया के साथ-साथ गणेशी और अमरेश भईया भी हंसे थे।
उस दिन वह छत पर बैठा सलोनी से बातें कर रहा था। आठ बजे से पहले बैठ कर बातें करना सुरक्षित था। उसके बाद खाना बना कर कभी उसकी तरफ से मां छत पर आ जाती तो कभी सलोनी के पापा खाना खाकर टहलने चले आते।
बातें करते हुए उसने महसूस किया सलोनी थोड़ी उदास है।
’’क्या हुआ ?’’ उसने डरते-डरते सलोनी का हाथ पकड़ा ओर किसी कड़ी प्रतिक्रिया के लिए ख़ुद को तैयार कर लिया। आख़िर सलोनी ने ही तो कहा था कि वह उसका सबसे अच्छा दोस्त है और उसके साथ उसे समय बिताना बहुत अच्छा लगता है।
’’कुछ नहीं..........।’’ ओर सलोनी ने अपनी दूसरी हथेली उसके हाथ पर रख दी।
वह रोमांच से भर उठा। आसमान अचानक उसे बहुत नीचे उतर आया जान पड़ने लगा ओर धरती कुछ तेज़ी से घूमती महसूस हुयी। वह सोचने लगा कि अब क्या कहे, क्या करे।
’’ सोमू, आज मेरा जन्मदिन है और मम्मी की तबियत ख़राब होने के कारण घर में मिठाई नहीं आयी। घर दूर होने की वजह से कोई सहेली भी नहीं आयी। पिछले साल नदेसर में मेरी सभी सहेलियां...........।’’ बोलते-बोलते उसकी आवाज़ थर्राने लगी।
अचानक सोमनाथ को लगा कि ऊपर वाले ने उसे बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी है। इस दुखी लड़की को ख़ुश करना उसका कर्तव्य है। उसक सामने उसकी सलोनी रो दे और वह चुप बैठा रहे? अचानक वह एक आनोखे अभिभावकत्व भाव से भर उठा और दोनों हाथों से उसके आँसू पोंछ दिये। हालांकि इसमें भी उसे काफी हिम्मत करनी पड़ी।
’’तुम यहीं रहना, मैं अभी आया।’’ वह फुर्ती से उठ खड़ा हुआ।
’’कहां जा रहे हो ?’’
’’बस अभी आया।’’
’’नहीं, मुझे छोड़ कर कहीं मत जाओ।’’ सलोनी ने उसका हाथ पकड़ कर खींचा तो उसे लगा कि वह कितने महत्व की चीज़ है। अभी कहीं भईया देख ले तो उसे पता चले कि जिसे वह बेवकूफ़ बच्चा समझता है, उसकी किसी के लिए कितनी अहमियत है। काश यह दृश्य भईया ने देखा होता। तभी उसे भईया के करारे चांटे याद आ गये और अनायास ही उसका हाथ गाल पर चला गया। अच्छा हुआ जो वह घर में नहीं है।
वह जब बैठा तो सलोनी उसके सीने से लग गयी। उफ्फ, उसका स्पर्श..........उसके बालों की सुगंध। उसे लगा जैसे वह हवा में उड़ रहा हो। वह उसके बालों पर हाथ फेरने लगा। सलोनी ने उसके सीने से लगे-लगे ही कहा, ’’यू आर माइ बेस्ट फ्रेंड।’’
उसने धीरे से उसे अपने से अलग किया। बिठाया, बालों से हाथ फेरते उसके चेहरे तक आया और कहा, ’’मैं बस पांच मिनट में आया, नीचे मत जाना।’’
सलोनी की पुकार को अनसुना कर वह नीचे उतर आया। नीचे आकर अपने सारे पैसे बटोर कर दुकान तक जाने और वापस दौड़ कर छत तक पहुंचने में उसे उतना ही समय लगा जितना अमूमन सिर्फ़ छत से अपने कमरे में जाने में लगता था।
’’जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं।’’ उसने बर्फ़ी का टुकड़ा उसके मुंह में ज़बरदस्ती डाल दिया। सलोनी ना-नुकुर करती रही ओर उसने उसे ज़बरदस्ती चार बर्फि़यां खिला दीं। फिर सलोनी ने आने हाथों से उसे दो बर्फि़यां खिलायीं। उसके बाद उसके जादू की तरह अपनी जेब से पेप्सी की दो बोतलें निकालीं। दोनों ने एक दूसरे का जूठा पिया और इसमें एक आनोखी भावना ने दोनों को घेरे में ले लिया जिसे कोई नाम दिये जाने की ज़रूरत किसी को नहीं थी।
’’ये मेरा सबसे यादगार जन्मदिन रहा, थैंक्स।’’ सलोनी ने उसके गाल पर एक चुम्बन लिया। वह विभोर हो गया। बदले में ऐसी ही कार्रवाई वह भी करना चाह रहा था लेकिन एक ही दिन में इतनी उपलब्धियां उससे संभाली नहीं जा रही थीं। कहीं यह ख़ूबसूरत सपना टूट न जाए, यह सोचकर वह चुप बैठा रहा। दोनों देर तक एक दूसरे का हाथ थामे बैठे रहे। स्पर्श की अपनी एक भाषा थी। इस दृश्य को लिए ही वह नीचे आया ओर कई दिनों तक इसी दृश्य में खोया रहा।
टाइम टेबल की तरफ देखने पर घबराहट बढ़ जाती है। एलजेबरा और त्रिगोनोमेण्टरी के अलावा अभी मैथ में ही बहुत कुछ बचा है। हाइट एण्ड डिस्टेंस अगर आज ख़त्म हो जाए तो फिर सर्किल ओर इलिप्स कल कर लेगा। चार्ल्स और बॉयल के सवाल लगाने हैं। हिंदी और अंग्रेजी पर पूरा दो हफ्ता चाहिए। उसकी अंग्रेजी काफ़ी कमज़ोर थी। टेंस के बारे में सोचते ही टेंस हो जाता था। सलोनी की अंग्रेजी काफी अच्छी है। उसके पापा उसे पढ़ाते हैं। उसे याद आया कि उसे कभी पिताजी ने पढ़ाई पर भाषण देने के अलावा और कुछ नहीं किया। न उसे कभी ख़ुद पढ़ाया न ही भईया को कभी पढ़ाया होगा। उसे भईया भी नहीं पढ़ा सकता। उसे तो लगता है कुछ आता ही नहीं। कोई परीक्षा पास नहीं कर पाता ओर कहता है कि तैयारी कर रहा है। हां, कॉलेज में कोई ऐसी डिग्री नहीं जो उससे बची हो। पढ़ाई को लेकर भईया कभी गंभीर नहीं रहा। बस यूनिवर्सिटी के सामने अपने दोस्तों के साथ पुतले फूंकता है और पुलिस से डंडे खाता अखबारों में छाया रहता है। उन अपमानजनक तस्वीरों को भी ऐसे संभाल कर रखता है मानो पुलिस उसे मार नहीं रही बल्कि मुख्य अतिथि बना कर माला पहना रही है। उसने पीछे मुड़ कर देखा तो पाया कि भईया ने पढ़ाई तो दूर दिनचर्या सुधारने के लिए भी कभी कोई टाइम टेबल नहीं बनाया।
उसने ख़ूब टाइम टेबल बनाए हैं। इस टाइम टेबल का पालन सिर्फ़ हफ़्ते भर हो पाया। उसने टाइम टेबल दीवार से नोच दिया। काग़ज़ के कुछ टुकड़े दीवार पर लगे रह गये। वह नये जोश के साथ टाइम टेबल बनाने लगा। दरअसल कुछ चीज़ें इस तरह बदल गयी हैं कि यह टाइम टेबल बहुत कठिन और कमज़ोर हो गया है। अब सब शुरू से। ज़्यादातर हिस्से पूर्ववत् थे। शाम के हिस्से में कुछ बदलाव हुआ।
2 बजे से 5 बजे तक - पढ़ना
5 बजे से 7 बजे तक - छत पर टहलना
7 से 9 तक - पढ़ना
9 बजे 10 तक - भोजन करना
10 बजे - सो जाना

उसने इस टाइम टेबल को लाल ओर हरे रंगों के स्केच से बनाया। थोड़ी देर गौर से देखने के बाद टाइम टेबल को उसने उसी जगह चिपका दिया। इसका भी पालन कितने दिनों तक हो पाएगा, कहना मुश्किल है। कारण.........सिर्फ़ एक ही सलोनी। जब भी पढ़ने बैठता, मन को एकाग्र कर पाना मुश्किल हो जाता। पहले सलोनी का चेहरा किताब के पन्नों पर उतर आता...फिर वह उससे बातें करने लगती। कल्पना के घोड़े बेलगाम हो जाते और वह सलोनी को उस पर बिठा कर हवा की चाल से कहीं दूर निकल जाता। वहां कोई नहीं होता। सिर्फ़ वह, सलोनी और उनके मनपसंद रंग।
वह बहुत अच्छा गाती है, यह उसे बहुत बाद में पता चला।
’’क्या गांउं ?’’
’’कुछ भी..........जो भी तुम्हें पसंद हो।’’
’’कोई छत पर आ गया तो ?’’ वह भय दिखाती।
’’कोई नहीं आएगा। तुम धीरे-धीरे गाओ।’’ वह सुझाता।
’’ फिर से आइयो
बदरा बिदेसी
तेरे पंखों पे मोती जड़ूंगी
तुझे तेरे कारे कमरी वाले की सौ।’’
गाते समय उसकी आंखें लगभग बंद हो जातीं। सोमनाथ सोचता कि उसे सलोनी का गाया गाना ज़्यादा अच्छा लग रहा है या उसका आंखें बंद किया हुआ चेहरा।
एक दिन वह नीचे से भईया का वाकमैन कम रेकॉर्डर उठा लाया। सलोनी ने एक-एक करके कई गाने गाए और उसने इन्हें रेकॉर्ड कर लिया। परीक्षा में बच रहे कम दिनों को देखते हुए यह ज़रूरी था। पढ़ते समय हमेशा उसके गाने कानों में गूंजें, इससे अच्छा है कि इसे टाइम टेबल में एकमुश्त थोड़ी जगह दे दी जाए।


6.
एक दिन भईया ने उसे अपने कमरे में बुलाया। गणेशी भईया भी बैठे थे।
’’यह जानता होगा।’’ भईया ने गणेशी भईया से मुस्कराते हुए कहा।
’’ पीछे जो भास्कर जी आए हैं उनकी लड़की का क्या नाम है ?’’ गणेशी भईया ने पूछा।
’’ जी.......सलोनी।’’ उसने हकलाते हुए बताया।
’’ हम्म्म्ममम, यथा नाम तथा गुण।’’ गणेशी भईया भईया की तरफ़ देखकर मुस्कराये।
उन्होंने ने सलोनी के क्लास और विषयों के बारे में काफी जानकारियां लीं और जब अपने मतलब की सारी बातें पूछ चुके तो उसे डपटते हुए बोले, ’’साले बहुत जानकारी रखे हो उसके बारे में। पढ़ाई में दिमाग नहीं है। तैयारी करो बेटा नहीं लटक जाओगे। बोर्ड है बोर्ड। चलो निपटों हिंया से।’’
वह बगल वाले कमरे में आने की बजाय दीवार से लग कर उनकी बातें सुनने लगा। गणेशी भईया जिस तरह से सलोनी का नाम ले रहे थे उसका मन कर रहा था कि उनका मुंह तोड़ दे पर उनका मुंह इतना ख़तरनाक है कि वह दो क्षण से ज़्यादा उधर देख ही नहीं पाता।
फिर वहां रूक कर सुनने से ही उसे गणेशी भईया के मंसूबों के बारे में पता चला। वह किसी सुनसान रास्ते पर सलोनी को रोक कर उससे बात करने की योजना बना रहे थे। तो इन्हें पता है कि सलोनी कोचिंग से किस रास्ते से लौटती है। वह तन कर खड़ा हो गया। उसकी मुट्ठियां भिंच गयीं। वह गणेशी भईया को सबक सिखाएगा। उनकी यह हिम्मत ?
अगले दिन वह पनवाड़ी वाले मोड़ पर खड़ा था कि गणेशी भईया की मोटरसाइकिल आती दिखी। वह सावधान हो गया। गणेशी भईया आकर मोटरसाइकिल खड़ी कर पनवाड़ी से बातें करने लगे और एक सिगरेट सुलगा कर पीने लगे। यह रास्ता आमतौर पर शाम को शांत ही रहता था। वह सोचने लगा कि क्या और कैसे करेगा। सामने से सलोनी अपनी साइकिल पर आती दिखी तो उसकी धड़कनें तेज़ हो गयीं।
जैसे ही साइकिल पनवाड़ी के पास आने को थी, गणेशी भईया ने साइकिल इतनी तेज़ी से मोड़ी कि सलोनी को साइकिल रोक देनी पड़ी। उसके पांव ज़मीन पर टिक गये। यही क्षण था जब वह तेज़ क़दमों से चलता सड़क पार करके सलोनी के पास पहुँच गया।
’’ प्रणाम भईया।’’ उसने गणेशी भईया को तुरंत सलामी ठोकी। सलोनी उसे देखकर जीवंत हो उठी। उसने तुरंत साइकिल संभाली और यह जा वह जा।
’’तुम चूतियाराम हिंया का कर रहे हो।’’ भईया ने पनवाड़ी के सामने ही उसके कान उमेठ दिये। ’’हमें पहिले से तुम्हारे उपर सक रहा। आज पकड़ लिए न रंगे हाथ। चलो घर कूटते हैं। इसिलिए आज इधर निकले थे।’’
’’सोमू, इधर इधर......।’’ उसने देखा दिनेश सड़क के उस पार रजिस्टर लेकर लहरा रहा है।
’’हम नोट्स लेने आए थे दिनेश से। झूठे कान उमेठ दिये आप।’’ उसने भुनभुनाते हुए कहा ओर सड़क पार कर गया। हालांकि यह संवाद उसने ज़ोर से बोला था पर इतना ही ज़ोर बचा था उसके पास कि भुनभुनाहट की आवाज़ सुनायी दी। यह उसका वर्ष का सर्वश्रेष्ठ संवाद वर्ष भर रहेगा।
उसे लगा घर पर गणेशी भईया भईया से शिकायत करेंगे ओर भईया उसकी ख़बर लेगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
रात को सलोनी उसके सीने से लग गयी। ’’तुम नहीं पहुंचते तो पता नहीं वह आदमी क्या बद्तमीज़ी करता। कई दिनों से मेरा पीछा करता है।’’ सोमनाथ ने उसके बाल सहलाए। उसी वक्त उसके मन में विचार आया कि बोर्ड की परीक्षाएं पास करने में क्या है। यह तो बच्चों का काम है। उसे महसूस हुआ कि नीचे उतर के वह एलजेबरा उठाए या कोआर्डिनेट, टेंस उठाए या सूर, सब चुटकियों में हो सकता है। सलोनी को सीने से चिपकाए ही का आकार बढ़ने लगा। सबसे पहले वह मुहल्ले की सबसे ऊँची छत से उंचा हुआ, फिर स़ड़क पर स्थित ताड़ के पेड़ से, फिर टीवी टावर से और अंत में उसने आसमान में किसी सितारे की बगल में सड़ा होकर देखा। उसकी छत पर दो परछाइयां आपस में चिपकी खड़ी थीं।
सलोनी उसकी ज़िंदगी की हर परत में शामिल हो चुकी थी। कई कठिनाइयों को देखते हुए उसने कुछ दिनों बाद एक नये टाइम टेबल की रचना की जो पिछले टाइम टेबल से कुछ बिंदुओं पर अलग था।

सुबह चार बजे - जागना
चार से साढ़े चार - सलोनी के गाए गीत वाकमैन लगाकर सुनना
रात आठ से साढ़े आठ - सलोनी के गाने वाकमैन में सुनना

जो कल्पनाएं पढ़ाई में बाधा थीं वही पढ़ने और अच्छा करने को भी प्रेरित करती थीं पर मूड से। सब कुछ मूड पर निर्भर होता चला जा रहा था। कुछ कल्पनाएं आगे की ओर धकेलतीं और कुछ पीछे की और खींचतीं। वह हमेशा कल्पनाओं में खोया रहता। कल्पनाएं थीं भीं तो अनंत। उसके घर के बगल में सलोनी का घर बने, इस स्थिति में सोचने के लिए ढेर सारी संभावनाएं थी, अनेकों स्वप्न थे और हर स्वप्न में भरपूर जीवन था।
मगर जैसे ही सलोनी के प्लॉट में ईंटें गिरीं, उसकी पूरी लाइन में एक अजीब सा तनाव छा गया। शुक्ला जी, सिंह अंकल और तिवारी जी तीनों मिलकर उसके घर आकर बैठने लगे। हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले पिताजी और भईया एक साथ मिलकर अजीब मुख मुद्राएं बनाए खुसर फुसर करने लगे। वह उजबक सा अपनी पढ़ाई से बहाना निकाल उनकी बातें सुनने की कोशिश करता पर जब कुछ समझ में नहीं आता तो पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक कड़ा टाइम टेबल बनाने लगता। एक दिन सलोनी ने ही बताया।
’’ कुछ लोग नहीं चाहते कि हम यहां घर बनाएं।’’
’’ क्यों मगर ?’’ उसे सुनकर आश्चर्य हुआ।
’’ हम लोग एससी एसटी हैं न इसलिए...........।’’
’’ एससी या एसटी ?’’
’’ पता नहीं, दोनों अलग अलग होता है क्या ?’’
’’ और क्या। अलग होता है। तुम्हें नहीं मालूम ?’’
’’ नहीं, कभी जानने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। पर इसी में से कुछ।’’
’’मगर क्या.........?’’
भईया देर रात तक अपने दोस्तों के साथ घर में बैठकें करने लगा था। उसे वहां फटकने की भी मनाही थी। जितना उसने छिप छिपाकर सुना उससे उसे यही लगा कि सब सलोनी के पापा का नाम लेकर उनकी ज़मीन के बारे में ही बात कर रहे हैं।
फिर जल्दी ही एक दिन एक चमत्कार हुआ जिसे सारे मुहल्ले ने आंखें फाड़-फाड़ कर ओर हाथ जोड़-जोड़ कर देखा।
वह उस दिन टाइम टेबल से भी आगे निकल कर रात दो बजे तक पढ़ता रहा था इसलिए नींद देर से खुली। बगल वाले प्लॉट से खूब आवाज़ें आ रही थीं। वह तड़ से बिस्तर से कूदा और गेट खोल कर बाहर निकल आया।
सलोनी का प्लॉट मुहल्ले और आस-पास के लोगों से खचाखच भरा हुआ था। एकाध लोग कैमरे लेकर फोटो खींच रहे थे। भईया को लोग घेरे खड़े थे और वह चीख-चीख कर लोगों को कुछ बार-बार बता रहा था।
’’ मुझे भोर में सपना आया। सपने में भोलेनाथ बाबा विश्वनाथ हाथ में त्रिशूल लिए मुझसे कह रहे थे, मुझे बाहर निकालो, मुझे बाहर निकालो। मैं डर गया ओर मेरी नींद खुल गयी। मैं पेशाब करने बाहर आया तो देखा कि प्लॉट के बीचों बीच प्रकाश सा दिख रहा है। मैं आया तो देखा धरती को चीर कर यह शिवलिंग बाहर निकलना चाह रहा है। मैंने डर के मारे शोर मचाना शुरू किया तो शुक्ला जी निकल आए। मैं तो चूतिया आदमी हूं, मुझे कुछ बुद्धि नहीं। शुक्ला जी ने जैसे यह देखा, अपने घर से दूध उठा लाए। वह जैसे ही शिवलिंग पर दूध डालने लगे, यह धीरे-धीरे बाहर आने लगा। मैं भी दूध ले आया और डाला तो यह थोड़ा और बाहर आया। तब तक तिवारी जी, श्रीवास्तव जी और ठाकुर साहब भी आ चुके थे। फिर तो कई लोग अपने घरों से दूध लाकर डालने लगे।
’’ आपका पूरा नाम क्या है रामू जी ?’’ एक अखबार वाले ने लिखते हुए पूछा।
’’ जी रामनाथ पाण्डेय। यह भी नोट कर लिजीएगा कि श्रीवास्तव जी के साथ परशुराम दूबे भी बाहर निकले थे।’’ भैया ने दूबे जी को इशारा करते देख उनके नाम का भी उल्लेख किया। दूबे जी अहसानमंद नज़रों से पहले भईया की ओर फिर शिवलिंग की ओर देखने लगे। अचानक भीड़ में से कोई चिल्लाया, ’’ बोल बाबा विश्वनाथ की........।’’
पूरी भीड़ चिल्लायी, ’’ जऽऽऽऽऽऽऽऽय।’’
भीड़ ने फिर साथ में एक हुंकार भरी, ’’ हऽऽऽर हऽऽऽर महादेऽऽऽऽऽव।’’
सलोनी के पापा एक तरफ खड़े थे। सब लोग उनकी तरफ घूमे।
’’ आप बहुत भाग्यशाली हैं भास्कर जी। साक्षात् महादेव आए हैं आपकी ज़मीन में। अब यहां भोलेनाथ का भव्य मंदिर बनेगा। बोलिए बाबा विश्वनाथ की................।’’
’’ जऽऽऽऽऽऽय.......।’’ पूरी भीड़ के साथ सलोनी के पापा ने जो धीरे से कहा वह न जाने कहां खो गया।


7.
भीड़ की कोई ज़ात नहीं होती। भीड़ का कोई धर्म नहीं होता। भीड़ का स्थायी भाव होता है शोर और भोजन होता है उन्माद। ऐसा कहते हुए अनुपम सर बहुत गंभीर नज़र आए थे। वह उनके सामने पूरी समस्या सुनाकर चुपचाप बैठा था। अनुपम सर उसके स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते थे और गली के मोड़ पर रहते थे।
’’ अब क्या होगा सर ? सलोनी के पापा ने पूरी जमा पूंजी लगाकर यह ज़मीन ख़रीदी है।’’ उसने चिंतित स्वर में पूछा।
’’ तुम्हें क्या लगता है सोमू ? क्या होना चाहिए ?’’ अनुपम सर ने इत्मीनान से पूछा था।
’’ मुझे...........मैं क्या कह सकता हूं सर ? अब भगवान के आगे कोई क्या.........?’’ वह विचारों के भंवर में फंसा हुआ था।
’’ तुम किस भगवान को मानते हो सोमू ?’’ सर ने फिर पूछा।
’’ मैं..........? मैं शंकर भगवान को, बजरंग बली को और दुर्गा मां को..............।’’ उसने सोचकर बताया।
’’ हम्म्म्म्म.............तो जाओ शंकर भगवान की पूजा करो और उनसे आग्रह करो कि यह प्लॉट छोड़कर कहीं और प्रकट हों। देखो तुम्हारी कितनी सुनते हैं।’’ सर ने मुस्कराते हुए कहा। वह और उलझ गया और वहां से गुमसुम चला गया।
उसे लगा था सर कोई सॉलिड आइडिया बताएंगे जिससे वह सलोनी के बुझ चुके चेहरे पर मुस्कान ला सकेगा। सर पूरे मुहल्ले में उसे सबसे समझदार लगते थे। पर सर जल्दी किसी के मामले में पड़ते नहीं। उनकी बातें सुनो तो लगता है कि वह चाह दें तो दुनिया की सारी ख़राब चीज़ें व्यवस्थित हो जाएं पर वह सिर्फ़ आइडिया देते हैं। ख़ुद किसी चीज़ में नहीं पड़ते। उनके पास टाइम भी कहां है। हमेशा पढ़ते या कुछ लिखते रहते हैं। अब उसके पास एक ही रास्ता बचा था। मनीष और उसकी जादुई नुस्खे। वह हालांकि मनीष का बहुत अच्छा दोस्त तो नहीं पर उससे कोई झगड़ा भी नहीं है। वह ज़रूर उसकी मदद करेगा। दिनेश से उसकी अच्छी दोस्ती है। उसे साथ लेकर जाना ठीक रहेगा।
मनीष पांच मिनट ड्राइंगरूम में बैठने के बाद दोनों को अपने कमरे में ले आया जहां कोर्स की किताबों के पीछे लाल, हरे, नीले रंगों के कवर वाली अनेक किताबें थीं। उसका कमरा भी रहस्यमय था। घुसते ही लगता था कि यहां फुसफुसाहट से बात करनी चाहिए। कमरे में एक तिलिस्म था जो घुसते ही अपनी ज़द में ले लेता था।
’’ परसों पापा ने मुझे बहुत पीटा।’’ मनीष लगभग फुसफुसाते हुए बोला।
’’क्यों बे क्यों ?’’ दोनों ने लगभग साथ-साथ पूछा।
’’ क्यों क्या। दिमाग नहीं है किसी को इस घर में। जवान बेटे पर हाथ उठाते हैं।’’ बोलकर मनीष थोड़ी देर के लिए रुका और फिर फुसफुसाहट में बोलने लगा, ’’ मैंने एक चूहा मार कर उसके ख़ून से रुमाल को अभिमंत्रित किया था और सामने के कुशवाहा अंकल के घर में डालने वाला ही था कि..............।’’
’’उससे क्या होता ?’’ दिनेश अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाया और बात बीच में काट दी। मनीष अचानक ख़ामोश हो गया और फिर सिद्धपुरुष की तरह गंभीर आवाज़ में बोला, ’’साले बात बीच में न काटा करो। उस रुमाल में उस आदमी का नाम आ जाता जिसने कुशवाहा अंकल की साइकिल चुरायी है। पापा ने पहले ही देख लिया। जवान बेटे को कैसे ट्रीट करते हैं आजकल के बापों को मालूम नहीं है। हां बताओ सोमू, मुझसे क्या चाहते हो तुम ?’’ वह मुद्दे पर जल्दी आ गया तो सोमनाथ को ख़ुशी हुयी।
’’ मैं ख़ाली इतना चाहता हूं कि सलोनी की ज़मीन उसको मिल जाये। उसके घर में दो दिन से खाना नहीं बन रहा यार।’’ उसने दुखी स्वर में कहा।
’’हम्म्म, ये मुद्दा भगवान से संबंधित है इसलिए मैं कोई गारंटी नहीं ले सकता कि काला जादू एकदम काम करेगा...........।’’
’’तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे तुम्हारा काला जादू हमेशा काम करता है जबकि गारंटी का रेशियो...............।’’ दिनेश की बात सुनकर मनीष झटके से खड़ा हो गया और उसकी आवाज़ अचानक ही बहुत धीमी हो गयी। उतार चढ़ाव भरी आवाज़।
’’मेरा जादू अक्सर काम नहीं कर पाता तो सिर्फ़ इसलिए कि साला इस घर का माहौल इसके लिए बहुत ख़राब है। सब मेरे पीछे पड़े रहते हैं। इसके लिए शांत माहौल चाहिए। देखना किसी दिन ये सब चुतियापा छोड़कर श्मशान चला जाऊँगा साधना करने तब समझ में आएगा जवान लड़के के साथ कैसे..............।’’
’’ छोड़ो मनीष भाई, बताओ न क्या करूं ?’’ सोमनाथ ने उसकी बात काट का अपनी वाज़िब चिंता रखी तो वह कुछ किताबें पलटने लगा। किताबों का पलटना कुछ देर तक चला और कमरे में एक तिलिस्मी सन्नाटा देर तक छाया रहा।
’’ देखो दोस्त, तुम एक काम करो। एक गिरगिट मारो ओर उस लड़की, क्या नाम बताया, हां सलोनी की लम्बाई के बराबर का धागा लेकर उसे गिरगिट के ख़ून से रंग लो। फिर इस मंत्र का खुले आसमान के नीचे बैठकर एक सौ आठ बार जाप करो। जाप करके इस धागे को इस यंत्र बने काग़ज़ में लपेट कर उसके छत पर फेंक दो। अल्लाह ने चाहा तो इस घर की सभी बाधाएं गायब हो जाएंगी। एक बात का ध्यान रखना कि यह सब करते तुम्हें कोई न देखे इसलिए आधी रात को ही..............।’’ अचानक आदत से मजबूर दिनेश ने बात काट दी। हालांकि यह सवाल सोमनाथ के मन में भी कौंधा था।
’’ अल्लाह क्यों बे भगवान क्यों नहीं.................?’’
’’ साले बेवकूफ़, छोटी-छोटी चीज़ों से ऊपर उठो। विद्या ऐसे नहीं आती। किसी भी कला के लिए अल्लाह, भगवान और हर भगवान को साधना पड़ता है, समझे ?’’ मनीष ने तल्ख आवाज़ में पूछा।
दोनों ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाया।
’’ तुम लोग समझोगे भी नहीं। तुम लोग मेरे घरवालों से कम जाहिल थोड़े हो जो यह तक नहीं जानते कि जब बाप का जूता.........ख़ैर। ऐसा किताब में लिखा हुआ है, यही समझ लो। एक बात जान लो किसी भी विद्या को सीखने के लिए..............।’’
मनीष की रहस्यमयी बातों को दोनों मुंह बायें सुन रहे थे कि तिलिस्मी कमरे का दरवाज़ा किर्रऽऽऽ की तिलिस्मी आवाज़ के साथ खुला और मनीष की बात अधूरी रह गयी।
’’ ख़ूब बैठकी हो रही है बेटा। खाली बकवास दिन भर। पढ़ाई हो गयी तेरह बाइस। महीने भर बची है बोर्ड की परीक्षा। पिछली पिटाई भूल गये लगता है। आने दो पापा को बताती हूं कि दिन भर बकवास हो रहा है। ओर तुम लोग बेटा ? कोर्स तैयार हो गया क्या जो तफ़रीह मारने निकले हो ? तुम लोगों के घर भी शिकायत भिजवानी पड़ेगी। कायदे से मार चाहिए तुम लोगों को भी.............।’’
जब मनीष की मम्मी अपना संक्षिप्त भाषण देकर निकलीं तो कमरे का सारा लिलिस्म टूट चुका था। मनीष को देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी श्मशान की ओर निकल जाएगा। सोमनाथ ने काग़ज़ पर बना यह यंत्र उठाया ओर यह सोचता हुआ निकल गया कि आख़िरी बार उसने गिरगिट कहां देखा था।
सुबह से शाम तक की अथक मेहनत के बाद सोमनाथ एक गिरगिट मारने में सफल हो गया। दिनेश ने गिरगिट मारने के कार्यक्रम में उसका मनोबल बढ़ाने में अपना अमूल्य योगदान दिया। शाम तक गिरगिटों का अध्ययन करके सोमनाथ इतना एक्सपर्ट अनुभव कर रहा था कि सिर्फ़ एक गिरगिट मारना उसे काफी महंगा सौदा लगा। वह गिरगिटों की आदतों ओर उनके रहन-सहन पर सुंदर लेख लिख सकता था या कोई लेक्चर दे सकता था। अब ये सब आसान काम थे।
उसके ख़ून में पांच फीट लम्बा धागा सानना मुश्किल काम था। दोनों ने इसे जी कड़ा करके अंजाम दिया। धागे को ख़ून में डुबाने, रात के दो बजे छिप कर बिना आहट छत पर जाने और 108 बार मंत्र का जाप करने में काफी शक्ति थी। इतनी देर में उसके अंदर इतना आत्मविश्वास भर गया कि उसे पूरी तरह विश्वास हो गया कि अब उसकी सारी समस्याएं आज रात भर की मेहमान हैं। जब काग़ज़ में लपेट कर वह धागा उसने सलोनी के छत पर फेंका तो एक ख़ुशगवार निश्चिंतता ने उसे लपेट लिया और वह बेपरवाही से सोचता हुआ नीचे उतरा कि जब वह सुबह सो कर उठेगा तो सब कुछ बदल चुका होगा।
जब वह सुबह सो कर उठा तो सब कुछ बदल चुका था। आज मुहल्ले के लोग शिवलिंग पर दूध नहीं चढ़ा रहे थे। आज शिवलिंग के चारों तरफ दीवार उठायी जा रही थी। कुछ लोग दरियों ओर चटाइयों पर बैठे आरती कर रहे थे जिसका भावार्थ यह था कि हे प्रभु तुम्हीं ग़रीबों को धन, लंगड़ों को पांव और बांझों को पुत्र देते हो इसलिए हमें भी वे-वे चीज़ें दो जिनकी हमें ज़रूरत है। भईया दीवार चुन रहे मज़दूरों को गाली देकर तेज़ हाथ चलाने को कह रहा था। उसी समय कुछ अखबार वाले और कैमरा लिये लोग आये तो भईया अचानक झपट कर खु़द भी मज़दूरों के साथ काम करने लगा। एक कैमरा वाला भईया का दोस्त था जो एक बहुत अच्छे चैनल में कैमरामैन था। पहले वह शादियों की वीडियो रिकॉर्डिंग करता था और भईया ने उसे किसी से कह सुन कर उस चैनल में रखवा दिया था। वह अक्सर भईया को अपने चैनल पर प्रमुखता से दिखाता था और उसके कहने पर अखबार वाले भी भईया की ख़ूब अच्छी तस्वीरें छाप देते थे। बदले में भईया उन्हें कभी-कभी चाय पान करा दिया करता था। सब भईया और उसके दोस्तों की तस्वीरें लेने लगे।
सलोनी के मम्मी पापा एक तरफ़ खड़े थे। उसके पापा आंखों में आंसू भरे आरती कर रही भीड़ के के पास खड़े दरोगा के पास फिर गये जिन्हें उन्होंने ही रिपोर्ट लिखवा कर बुलाया था। इस बार दरोगा भड़क गया।
’’ अजीब आदमी हैं आप। अरे कितना बार समझाएं आपको कि भगवान के मामलों में क़ानून कुछ नहीं कर सकता। आप भी क्यों नहीं बैठते और कीर्तन करते ? ग़ज़ब के नास्तिक आदमी हैं आप।’’
’नास्तिक’ शब्द सुनकर आरती करने वाले पलटे और नास्तिक को क़रीब खड़ा देख कर दुगुने ज़ोर से आरती गाने लगे। भईया भी बीच-बीच में इनकी मदद करता। अचानक उत्साहसे पलटता और चिल्लाता, ’’ हर हऽऽऽऽर.........?’’
उसके बाकी दोस्त जिनमें कुछ सलोनी को घूर रहे थे ओर कुछ उसकी मम्मी को, उसके स्वर में स्वर मिलाते हुए चिल्लाते, ’’ महादेऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽव।’’
वह उलझन भरी हताशा के साथ कुछ देर वहीं खड़ा रहा। प्लॉट में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जा रही थी। सलोनी के चेहरे पर छायी वीरानी उसे उदास करने लगी। उसे भगवान और भईया दोनों पर गुस्सा आने लगा। फिर उसे लोगों पर भी बहुत गुस्सा आया। मनीष के काले जादू ने भी काम नहीं किया। अब यहां एक छोटा सा मंदिर बनेगा और मुहल्ले के लोग यहां पूजा करने आया करेंगे। भईया या उसका कोई दोस्त यहां पुजारी बन कर बैठ जाएगा। सलोनी के पापा अपना परिवार लेकर यहां से कहीं दूर चले जाएंगे। वह कुछ दिन सलोनी को याद करेगा और फिर अपनी पढ़ाई और टाइम टेबल पर ध्यान देने लगेगा। बहुत सालों बाद किसी यात्रा के दौरान सलोनी उसे ट्रेन में मिलेगी। वह कहेगा कि वह उससे अब भी प्रेम करता है। वह कहेगी वह उससे तब भी प्रेम नहीं करता था। वह घबरा गया।


8.
रात चांदनी थी और चांद की रोशनी में छत पर दो आकृतियां बिना हिले-डुले बैठी थीं।
’’ तुम अपने टाइम टेबल के हिसाब से आज कल पढ़ाई कर रहे हो या नहीं ?’’
’’ उहूं........आजकल पढ़ाई में एकदम मन नहीं लगता। तुम्हारी तैयारी कैसी है ?’’
’’ ठीक है।’’
थोडी देर तक वही ख़ामोशी छायी रही जो हर बार एक संवाद के बाद छा जा रही थी, बहुत देर से।
’’सुनो।’’
’’हूं।’’
’’ वह गाना सुनाओ न..........।’’
’’नहीं सोमू, कोई आ गया तो......?’’
’’ कोई नहीं आएगा। तुम गाओ ना। कितनी अच्छी हवा चल रही है।’’
’’ फिर से आइयो
बदरा बिदेशी
तेरे पंखों पे मोती जड़ूंगी
तुझे तेरे कारे कमरी वाले...................।’’
गाते-गाते सलोनी का गला भर आया ओर सुनते-सुनते सोमनाथ की आंखें। उसने सलोनी की हथेलियों को माथे से लगा लिया।
’’ हम लोग तीन-चार दिनों में यह मुहल्ला छोड़ देंगे। पापा केस करने जा रहे थे तो चाचा ने रोक लिया। कहा पैसे की बर्बादी है।’’
’’ मत जाओ।’’ वह भरे गले से इतना ही कह पाया। थोड़ी देर तक फिर चुप्पी छायी रही।
’’ पापा कह रहे थे कि हम एससी-एसटी न होते तो हमारे ज़मीन में भगवान नहीं निकलते। हमारी ज़मीन इसलिए हड़पी गयी क्योंकि हम लोग एससी-एसटी हैं।’’ सलोनी ने कहा और उसकी ओर यूं देखने लगी मानों कोई सवाल पूछा हो।
’’नहीं सलोनी, यह पूरी तरह सच नहीं है।’’ अचानक उसे लगा जैसे उसके ऊपर अनुपम सर सवार हो गयें हों। ’’ तुम्हारे जगह कोई ब्राह्मण या ठाकुर भी होता तो उसकी ज़मीन भी हड़पी जाती। ये लोग धीरे-धीरे इतने मज़बूत और बड़े होते जा रहे हैं कि अब ये कुछ भी हड़प सकते हैं। हां, इस पंडितों और ठाकुरों के मुहल्ले में एक एससी की ज़मीन हड़प लेना आसान ज़रूर रहा।’’ उसकी आवाज़ तेज़ हो गयी तो सलोनी ने उसका हाथ दबाया।
’’ मैं तुम्हें यह मुहल्ला छोड़ कर नहीं जाने दूंगा।’’ कहता हुआ उठ कर वह नीचे चला गया। हालांकि भईया की जादूगरी और ताक़त को वह अच्छी तरह जानता था। वह जानता था कि भइया कुछ भी कर सकता है। उसने जब से होश संभाला है, भईया के चमत्कारों को देखसुन कर ही बड़ा हुआ है। अब इस मामले को ही ले तो पाता है कि अकेले भईया ने क्याक्या साध रखा है। कितनी जल्दी चीज़ों को सल्टा देता है। सलोनी के पापा ने एक दिन कुछ नेता टाइप के लोगों को बुलाया। वे लोग अपने हाथों में तख्तियां लिये हुये थे जिन पर लिखा था, हक नहीं छोड़ेंगे, जान दे देंगे। वंचितों के अधिकार हड़पना बंद करो। सरकार निकम्मी है और भी बहुत से नारे। वह ख़ुश हुआ कि अब शायद कुछ अच्छा होगा। वे लोग अभी उस प्लॉट में मंदिर के आस-पास तख्तियां लेकर बैठे ही थे कि पता नहीं कहां से ढेर सारे गेरुए कपड़े पहने और हाथ में छोटे-बड़े त्रिशूल लिए ढेरों बाबा लोग आ गये और वहां जय श्री राम, जय श्री राम के नारे लगने लगे। तख्तियों वाले लोगों में से कुछ को उस भीड़ में पता नहीं किसने थोड़ा मार-वार भी दिया। वे लोग तख्तियां वहीं फेंक-फांक कर भाग गये। एक दिन एक सरकारी गाड़ी लाल बत्ती लगाये आयी और उसमें से एक अधिकारी के साथ सलोनी के पापा भी उतरे। अधिकारी मंदिर को कुछ देर तक देखता रहा और फिर सलोनी के पापा के कंधे पर हाथ रख कुछ कहा। भईया को भी बुलाया गया और उसने भईया को भी कुछ समझाया मगर कमाल कि उसके जाने के बाद सब कुछ वैसे का वैसा ही रहा। सब अपने अपने काम पर लग गये जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो। एक दिन तो हद, सलोनी के पापा के साथ चार पांच हट्टे-कट्टे लोग आये और आकर मुहल्ले में शोर मचाने लगे। भईया शोर सुनकर बाहर निकला तो वे लोग भईया से भिड़ गये और उसे एकाध झापड़ रख दिया।
ये क्या मज़ाक है ? भईया ने गुर्राते हुए पूछा।
मज़ाक तो तू कर रहा है साहब के साथ। कल से ये सब यहां से हट जाना चाहिए। एक ने चाकू लहरा दिया।
भईया ने अचानक पैंतरा बदला और अपनी कमर के पीछे हाथ डाल कर एक छोटी सी पिस्तौल निकाल ली। सोमनाथ का दिल दहल गया। भईया के पास पिस्तौल .....? उसने पिस्तौल लहरायी और उन आदमियों से न बोलकर सलोनी के पापा से बोला, ’’आपके परिवार के साथ जो भी ऊंच-नीच होगी अंकल जी, उसके जिम्मेदार सिर्फ़ आप और आप होंगे, यह बात तो अब मानेंगे आप, है कि नहीं...........?
सलोनी के पापा हतप्रभ खड़े रह गये और वे आदमी उनको देखते रह गये और भईया पिस्तौल चमकाता आराम से गणेशी भईया के घर की तरफ निकल गया। भईया कब क्या कर देगा और क्या क्या कर चुका है इसके बारे में उसके जैसे कमअक्ल और बेवकफूफ लोग सपने में भी अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते, इसे वह बहुत पहले मान चुका है और इसीलिये भईया से इतना कांपता है।


9.
उसे अपनी अस्त-व्यस्त होती जा रही दिनचर्या से बहुत कोफ़्त हो रही थी। रात में दो तीन बजे सोने और सुबह आठ नौ बजे जगने से ताज़ा बनाये टाइम टेबल की बहुत अवमानना हो रही थी। यह अवमानना उसके मन में एक तरह का डर भरती जा रही थी ओर उसे हमेशा लगने लगा था कि वह बोर्ड की परीक्षा में फ़ेल हो जाएगा। उसके आस-पास ऐसे बहुत से लोग थे जो हमेशा कहते-रहते थे कि हाई स्कूल की बोर्ड परीक्षा ही किसी भी विद्यार्थी का असली इम्तिहान होती है। कि यह एक ऐसा आग का दरिया है जहां विद्यार्थी की असली औकात पता चलती है। कि यही असली युद्ध है। कि यही सबसे कठिन परीक्षा है इत्यादि-इत्यादि।
उसके टाइम टेबल में कई चिंताएं घुस आयी थीं चुपके-चुपके। वे टाइम टेबल में दिखायी तो नहीं देती थीं पर उसका ज़्यादातर समय ले लेतीं। चार-पांच दिन गुज़र चुके थे। शिवलिंग के चारों तरफ़ दो-तीन फीट उंची दीवार खड़ी कर दी गयी थी। अखबार में आया था - ’’कुछ छात्रों का भक्ति में अभूतपूर्व योगदान।’’ ’’ विद्यार्थियों ने किया चमत्कारिक मंदिर में श्रमदान।’’ ’’पढ़ने वाले जागरूक छात्रों का सौहार्द्र और भक्ति में अनोखा योगदान’’ आदि-आदि। कुछ दिनों बाद यह दीवार और ऊँची होने वाली थी और इस पर पलस्तर करके इसे मज़बूत, पक्का और टिकाउ बनाया जाने वाला था। उसके पास समय जितना कम बचता जा रहा था, उसकी पूजा प्रार्थना भी उसी अनुपात में अढ़ती जा रही थी। इधर उसने त्रिकाल संध्या भी शुरू कर दी थी जिसे देख कर अक्सर पिताजी कहते, ’’ पूजा-पाठ से नहीं पास होओगे साहबजादे। पढ़इये काम आएगी।’’
वह पास होने के लिए पूजा नहीं कर रहा था। सलोनी से उसका मिलना कम हो गया था। उसके सामने जाते ही उसे लगता कि वह एक छोटा बच्चा है जिसे सिर्फ़ पढ़ना-लिखना है। इसके बाहर के किसी भी मसले के लिए वह बालक है जिसकी राय की कोई कीमत नहीं। वह यह बात अच्छी तरह समझ चुका है पर सलोनी नहीं समझती। वह पता नहीं क्यों उसे बहुत सक्षम समझती है। कितनी भोली है वह।
आजकल उसके दिमाग में सलोनी के चेहरे से ज़्यादा शिवलिंग के आस पास की दीवार घूमती रहती है। वह जब भी सलोनी को याद करता है, उसका चेहरा ख़यालों में लाता है, उसके उदास चेहरे पर वह दीवार उगने लगती है। उसका चेहरा उस दीवार के पीछे ढँक जाता है और उसके पीछे से सुबकने की आवाज़ आने लगती है। वह रोना चाहता है पर रुलाई नहीं आती। वह इस समस्या के बारे में सोचने लगता है तो अचानक अपनी पढ़ाई को लेकर चिंतित हो जाता है। जब टाइम टेबल के हिसाब से पढ़ने बैठता है तो मन सलोनी में उलझ जाता है। कभी-कभी दोनों को छोड़कर आंखें बंद कर लेट जाना चाहता है पर लेटता है तो रीढ़ की हड्डी में दर्द महसूस होता है।
उसके सपनों की फेहरिस्त में एक दिन उसे वह सपना आया जिसने उसे उठते ही उल्लास से भर दिया। उन दिनों वह ढेर सारे सपने अक्सर देखा करता था। कुछ सुबह तक याद रह जाते थे, कुछ वह भूल जाया करता था। पर यह सपना याद था, एकदम स्पष्ट.......एकदम साफ़। उस रात वह तीन घंटे पूजा करके सोया। होश और बेहोशी के बीच उसने जो सपना देखा कि उसकी आंख डर के मारे खुल गयी। बिल्कुल स्पष्ट सपना। उसे लगा अभी बिल्कुल सुबह है पर जब वह तेज़ी से बैठक में पहुंचा तो वहां पिताजी, भैया ओर शुक्ला जी धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे।
’’ मैंने अभी-अभी एक सपना देखा। सुबह का सपना।’’ वह उत्साह में था। उत्साह की मात्रा इसी से समझी जा सकती है कि वह भईया के सामने कुछ बोल रहा था जो भईया के किसी सवाल का जवाब नहीं था।
’’ बको।’’ भईया ने निर्विकार भाव से कहा।
बदले में उसने पूरा सपना ख़ासी तफ़सील में कह सुनाया जिसमें भगवान शंकर ने उसके सपने में आकर तांडव करते हुए इस ज़मीन से निकाल कर गली के मंदिर में स्थापित होने की इच्छा प्रकट की थी। सब शांति से उसका सपना सुनते रहे और वह इसे अपने सपने का प्रभाव मानकर सुनाता रहा। जब पूरा सपना ख़त्म हुआ तो शुक्ला जी के चेहरे का रंग ज़रा सा बदला था पर भईया का चेहरा जस का तस था।
’’ हां बहुत अच्छा सपना था। अब जाकर पढ़ाई करो।’’ भईया ने ठंडे स्वर में पूछा।
’’ तो अब वहां से मंदिर हट जाएगा ?’’ उसने उसी उत्साह में पूछ लिया।
तड़ाक! एक ज़ोर का चांटा उसके गाल पर पड़ा और वह गिर पड़ा। भईया का स्वर थप्पड़ मारने के बाद भी निर्विकार और ठंडा था।
’’अपने काम से काम रखो बेटा नहीं तो तबियत से थूर देंगे। भगो यहां से।’’
वह उठकर कमरे में आया तो जबड़े के दाहिने हिस्से में दर्द हो रहा था और नटराज शंकर सामने लगी तस्वीर में नृत्य कर रहे थे। उसने मां से बताया, ’’मैंने भी सपना देखा है मां कि भगवान कह रहे हैं कि मुझे इस प्लॉट में मत कैद करो। तुम पिताजी को समझाओगी न मां ?’’
मां ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, ’’ बेटा, वो लोग तुमसे ज़्यादा समझदार हैं न ? तुमसे ज़्यादा पढ़े लिखे। अभी पढ़ाई पर ध्यान दो। जब भईया जितना पढ़ लोगे तो समझदार हो जाओगे कि सबके सपने का महत्व अलग-अलग होता है। अच्छा बताओ खीर खाओगे या सिवईं ?’’
उसने इस सपने के बारे में किसी को नहीं बताया।
सलोनी अब अक्सर कहने लगी है कि उसके पापा अब जल्दी ही यह मुहल्ला छोड़ कर चले जाएंगे। सोमनाथ की पढ़ाई इधर एकदम डिस्टर्ब है। दिनेश रात दिन पढ़ाई कर रहा है। वह तिबारा कोर्स पूरा कर रहा है और उसका अभी एक बार भी ख़त्म नहीं हुआ। मनीष दिन में पढ़ता है और रात में कपड़े उतार कर एक मंत्र का जाप करता है। उस मंत्र का एक करोड़ बार जाप कर लेने पर उसके पास ग़ायब होने की शक्ति आ जाएगी। यह सब सोचता-सोचता अचानक किसी अनुउल्लेखनीय घटना के तहत वह कुछ मिनटों के अंदर वह बड़ा हो गया। सब बकवास है। मनीष का जादू, उसकी पूजा। सच्चे मन से प्रार्थना हो तो पूरी होती है , उसने सुना है पर सब बकवास बातें हैं। कुछ पूरा नहीं होता। कोई रास्ता नहीं। सीधा रास्ता तो यही है कि वह मंदिर को बम लगा कर उड़ा दे। पर बम कहां मिलेगा।


10.
वह बदल चुका है क्योंकि पूरी दुनिया बदल चुकी है। हर सुबह गाढ़ी उब के दस्ताने पहने आती है ओर उसे दिन भर नोचती रहती है। हर रात सीली उदासी का नकाब ओढ़े आती है और दूर तक फैल जाती है। कटने का नाम नहीं लेती। हर एक पल अपनी ही परछाईं से लड़ता अपने वजूद पर कोहरे की तरह देर तक छाया रहता है। परीक्षा की तैयारियों के बीच पढ़ते-पढ़ते अचानक उसे लगता है कि परीक्षा उसे नहीं देनी, कोई और देगा। या फिर जो कुछ भी हुआ है उससे उसका कोई लेना-देना नहीं है, वह किसी और के साथ घटा है। उसके साथ क्या गुज़र चुका है, इससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। और सब कुछ इतनी जल्दी हुआ है कि लगता है उसे ब्योरेवार कुछ याद ही नहीं आ रहा......ख़ूब कोशिश करने पर भी। सब कुछ कई टूटे-फूटे दृश्यों में सामने से गुज़रता है।
वह शाम को बाहर जा रहा था कि पिताजी ने टोक दिया, ’’ कहां जा रहे हो पढ़ाई करने के टाइम ?’’ वह बिना जवाब दिए बाहर निकलने लगा। पिताजी आवाज़ लगाते रह गये। दरवाज़े तक पहुंचा ही था कि भईया ने देख लिया कि वह पिताजी की आवाज़ को अनसुना करके निकल रहा है। भईया ने उसे डपटती आवाज़ में रुकने के लिए कहा। उसने एक दया भरी निगाह भईया पर डाली और निकलने लगा। भईया उसकी उपेक्षा से आहत हुआ ओर सोफ़े से अचानक उछल कर एक ज़ोर का चांटा उसके गाल पर रसीद कर दिया। वह नीचे गिर पड़ा। ’’सुनाई नही देता ? हं:: सुनाई नहीं देता ?’’ भईया ने उसके उठते ही एक करारा चांटा और रसीद कर दिया। वह दूसरी बार उठा और चुपचाप दरवाज़े की ओर बढ़ा। इस हरकत ने भईया को आगबबूला कर दिया। उसने पूरी ताक़त से चांटा ताना था मगर गिरने से पहले सोमनाथ ने भइया का हाथ पकड़ लिया। दोनों की निगाहें मिलीं और उसने भईया का हाथ हिकारत से झटक दिया। फिर वह उसकी ओर बिना देखे बाहर निकल गया। भईया हारे हुए जुआरी की तरह धम्म से सोफ़े पर गिर गया।
’’ देख रहे हैं क्या हो गया है लड़के को ?’’ मां ने दुखी स्वर में कहा। बहुत दुख या ज़्यादा ख़ुशी में वह उसे और भईया को नाम से न पुकार कर लड़का कहती है।
’’ कुछ नहीं हुआ। कुछ दिनों में नॉर्मल हो जाएगा।’’ पिताजी ने टीवी देखते हुए आराम से कहा।
’’कुछ बोलता नहीं आजकल। खोया-खोया रहता है हमेशा। पता नहीं बाहर इतनी देर तक बौंड़ियाता रहता है। जबसे वह लड़की गयी है और पूरे मुहल्ले के समने इसकी पिटाई हुयी है, इसकी पागलों जैसी हालत हो गयी है। मुझे बहुत डर लगता है जी। इसकी परीक्षा भी सिर्फ़ एक हफ़्ता बची हुआ है।’’ मां के स्वर में उदासी और डर मिला हुए थे।
’’ चूतिया है। झूट्ठो का लंड़परेतन फैलाया है। तुम जादा हाय हाय मचाओगी तो अउर नाटक करेगा, छोड़ दो उसकी ओर ध्यान देना कुछ दिन। चार दिन में नशा उतर जाएगा।’’ पिताजी झल्ला कर बोले फिर मस्त होकर टीवी देखने लगे।
जब वह अनुपम सर के यहां से वापस आया तो देर रात थी। सब लोग खाकर सो चुके थे। भूख न होने के बावजूद वह थोड़ा सा खाना लेकर छत पर आ गया। खाना बहुत ज़रूरी है, भूख न होने के बावजूद, क्योंकि अब टाइम टेबल से पढ़ाई करनी बहुत ज़रूरी है। सलोनी ने कहा था कि उसे मेहनत से पढ़ाई करनी है और फर्स्ट आना है। अनुपम सर भी देर तक यही समझाते रहे थे कि वह मेहनत से पढ़ाई करे और अच्छे नंबरों से पास हो। सलोनी भी यही चाहती थी। पढ़ाई जल्दी से जल्दी पूरी करके उसे अपने पैरों पर खड़ा होना होगा तभी तो वह उन चीज़ों को अपनी ज़िंदगी से निकाल सकेगा जिसकी उसे कोई ज़रूरत नहीं है। अनुपम सर बहुत समझदार हैं। सब उनके जैसे क्यों नही होते।
चांदनी रात थी ओर सलोनी की छत दूर तक वीरान थी। हालांकि कहीं दूर से गुनगुनाने की आवाज़ उसके कानों में पड़ रही थी।
’’ फिर से आइयो
बदरा बिदेसी..................।
उसे साफ दिखायी दिया कि उसके सामने सिर्फ़ पलक झपकते चांदनी रात अंधेरी रात में बदल गयी।
तेरे पंखों पे मोती जड़ूंगी
तुझे तेरे कारे कमरी वाले की सौं।’’
एक अंधेरी रात और एक भर्रायी आवाज़। उसकी मिन्नत थी कि वह कहीं न जाए। उसे छोड़कर कहीं नहीं। जब उसने कई बार अपनी मिन्नत दोहरायी तो उसने थर्राती आवाज़ में जो बयान किया उससे वह भी थर्रा गया।
’’ उस आदमी ने पूरी ताक़त से मुझे सुनसान सड़क पर लिटा दिया था और मेरे ऊपर चढ़ा हुआ था। मेरी साइकिल मेरे बगल में गिरी पड़ी थी और उसका पहिया मेरी आंखों के सामने घूम रहा था। घूमते पहिए के पीछे तुम्हारे भईया का चेहरा था। वह चेहरा जो मंदिर में पूरी ताक़त से चीख कर भजन गाते वक्त लाल हो जाता है। वह उस वक्त भी लाल था।’’
उसके लिए इस बात का कोई ख़ास मतलब नही था कि कैसे सलोनी ने पास पड़ा पत्थर गणेशी भईया के माथे पर मारा। कैसे भईया जब तक शोर मचाता जब तक उसे पकड़ने दौडा तब तक वह वहां से भाग चुकी थी। कैसे उसकी किताबें और साइकिल उसे कभी नहीं मिल पाएंगीं। वह दूर कहीं खो चुका था जहां से ट्रेन अपनी पूरी गति से पटरियों को रौंदती अपनी मंज़िल पर बढ़ी चली जा रही थी।
’’ हम लोग यह मुहल्ला छोड़ कर कल सुबह जा रहे हैं सोमू।’’ उसकी आवाज़ अब भी थर्रा रही थी।
वह कुछ नहीं बोला था और तब भी दूर पटरियों में देखने लगा था जहां अब भी उसकी नज़र टिकी थी।
जैसे तैसे थोड़ा खाना खाकर वह नीचे आया। मेज पर कोई पुराना टाइम टेबल रखा था। शायद पिछली बार का। एक दीवार पर भी चिपका था। उसे याद नहीं आया कि अंतिम कौन सा है। दीवार वाले पर उसकी नज़र कुछ लाइनों पर पड़ी।

सुबह सात से आठ - पूजा करना
शाम छह से सात - पूजा और आरती करना
रात ग्यारह से बारह - पूजा करना

वह उठा और दीवार से टाइम टेबल नोच दिया। उसे चिंदी-चिंदी करके एक कोने में फेंक दिया। फिर दूसरा टाइम टेबल उठा कर उसे भी बिना देखे फाड़ कर उड़ा दिया। उस अंधेरी रात की तरह इस चांदनी रात को भी उका मन हुआ कि अभी जाए और शिवलिंग को उठाकर उस प्लॉट के बाहर फेंक दे। लात मार कर मंदिर की दीवारें तोड़ दे। भले ही सारे मुहल्ले में शोर मच जाय। भले ही उस रात की तरह फिर से भईया उसे पूरे मुहल्ले के सामने इतना मारे कि उसके मुंह से ख़ून निकल आय। भले ही भईया थोड़ी ही देर में फिर से मंदिर में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कर दे। भले ही सब कुछ थोड़ी ही देर में पहले जैसा बन जाय। भले ही सब कुछ करने से कोई फ़ायदा न हो लेकिन वह एक बार फिर से सब तोड़े ज़रूर। पर उसने कुछ नहीं किया। रसायन विज्ञान की किताब उठायी और तुल्यांकी भार के सवाल लगाने लगा। सलोनी ने उस रात कहा था, ’’ मैं बड़ी होकर बहुत बड़ी अफ़सर बनूंगी ओर सब कुछ ठीक कर दूंगी। तुम भी मेहनत से पढ़ाई करना ताकि बड़े अफ़सर बन सको।’’
तुल्यांकी भार के सवाल लगाते-लगाते उसे नींद आ गयी। नींद में उसने एक बहुत ख़ूबसूरत सपना देखा।
वह अपनी छत पर खड़ा था। सलोनी अपनी छत पर खड़ी उसे देख रही थी। अचानक मुहल्ले में पानी भरने लगा। सलोनी कूद कर उसकी छत पर आ गयी। उसके पास, बहुत पास। पूरे मुहल्ले में पानी भर गया था। उसका घर, शुक्ला जी का घर, श्रीवास्तव जी का घर, ठाकुर साहब का घर, शिवजी का मंदिर सब कुछ धीरे-धीरे उस बढ़ते पानी में समा गया। जब पानी छत तक और उनके पैरों तक आ गया तो अचानक सोमनाथ के पैरों के पास एक खाली नाव आकर रुकी। वह सलोनी को लेकर नाव पर बैठ गया। उसने अपनी कुछ किताबें और टाइम टेबल भी लेना चाहा पर सलोनी ने वह छीन कर पानी में फेंक दिया। दोनों की नाव वहां से चल पड़ी। उसने देखा कि भईया, उसके दोस्त, वह शिवलिंग, उसकी किताबें और पूरा मुहल्ला पानी से बाहर आने के लिए हाथ-पांव मार रहा है। वह किसी को बचाने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता है। नाव उन दोनों को लेकर मंथर गति से आगे बढ़ती जा रही है। ऐसा लगता है पूरी दुनिया में सिर्फ़ वह दोनों ही बचे हैं। ऐसा लगता है यह पानी चालीस दिन और चालीस रातों तक लगातार बरसता रहा है। पहाड़ तक इस पानी में डूब गए हैं। दूर तक पानी ही पानी नज़र आ रहा है। सलोनी धीरे-धीरे उसका प्रिय गीत गुनगुना रही है। वह उसके बाल सहला रहा है। हवा में एक अजीब सी रूहानी ताज़गी है। दोनों एक दूसरे में खोये-खोये बहुत दूर निकल जाना चाहते हैं।

जब वह सोकर उठेगा तो उसे क़तई विश्वास नहीं होगा कि यह एक स्वप्न था।

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2 कहानीप्रेमियों का कहना है :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

एक सशक्त कहानी जो वर्तमान वातावरण को शब्दांकित करती है. राजनैतिक छल-कपट, दिग्भ्रमित युवा, पथभ्रष्ट पुलिस और जातीय वैमनस्य सभे कुछ है.. नहीं है तो कोई शुभ संकेत. आशा की कोई किरण. खैर किसी सलोनी को यह सब झेलना ही होता है वह किसी भी जाती में हो ...अस्तु साधुवाद

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

भईया,

मुझे तो कहानी बहुत पसंद आई। स्टाइल भी पूरी बनारसी। आपकी खास बात यह है कि आप मूल कथ्य कहने रास्ता रोचक वाला पकड़ते हैं और पाठक को पता भी नहीं चलता और अपना संदेश छोड़ जाते हैं। बहुत बढ़िया भाई।

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