Monday, March 23, 2009

तमाशा

नमस्कार,
कोई सम्बोधन इसलिये नहीं दे रही हूँ क्योंकि आपके लिये मेरे पास कोई सम्बोधन है ही नहीं । जब अपने चारों तरफ नंजर दौड़ाती हूँ तो पाती हूँ कि वे सभी जो मेरे आस पास हैं उनके लिये मेरे पास एक उचित सम्बोधन भी है किन्तु आपके लिये ...? आपके लिये तो मेरे पास कुछ भी नहीं है, न भावनाएँ और ना ही सम्बोधन। वैसे अगर रिश्तों की परिभाषाओं के मान से देखा जाए तो आपके और मेरे बीच में भी एक सूत्र जुड़ा है मगर मैं उस सूत्र को नहीं मानती इसीलिये ये पत्र लिख रही हूं ।
यहाँ इस घर से जब मेरे विदा होने की घड़ी आ गई है तब स्मृतियों के अध्यायों को खोलते हुए सुधियों के पन्नों को टटोलते हुए ये पत्र आपको लिख रही हूँ। यकीन मानिये मैं ऐसा कभी भी करना नहीं चाहती थी, अगर चाहती तो पिछले वर्षों में कभी भी लिख देती। आज भी ये पत्र लिख रही हूं तो उसके पीछे भी एक बड़ा कारण है और ये कारण आपसे भी जुड़ा है और मुझसे भी। ये पत्र संभवत: आपके और मेरे बीच का पहला संवाद है और ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि यही अंतिम भी हो क्योंकि इसीलिये तो मैं ये पत्र लिख रही हूँ। पत्र शुरू करने से पहले बहुत सारी भूमिका इसलिये बाँध रही हूँ ताकि आपको ऐसा ना लगे कि ये एक लड़की द्वारा भावुकता में लिखा गया पत्र है। ये पत्र एक सुदृढ़ मन:स्थिति में लिख रही हूं। एक बात पुन: दोहरा रही हूँ कि लिख इसलिये रही हूं क्योंकि इसके अलावा कोई चारा था भी नहीं।

मैं भी नहीं जानती कि उस वक्त यदि मैं कुछ सोच पाती तो क्या सोचती जब मैं केवल कुछ ही दिनों की थी। शायद दस दिन पहले ही मेरा जन्म हुआ था। दादी बताती हैं कि आप शहर से आए थे और बरामदे में बैठे थे जब दादी ने दस दिन की मुझे आपकी गोद में लाकर लिटा दिया था और कुछ हँसते हुए कहा था ''ले मुन्ना देख ले अपनी बिटिया को''। आगे की घटना बताते हुए दादी कुछ गंभीर हो जाती हैं किन्तु बताती अवश्य हैं। संभवत: यही वह बात है जिसने मुझे इतना मजबूत बनाया है । मैं सोचती हूँ कि दादी ने भी शायद इसीलिये मुझे बार बार वो घटना सुनाई है क्योंकि वो भी मुझे ऐसा ही बनाना चाहती थीं। दस दिन की मैं आपकी गोद में लेटी ही थी कि आपने हिकारत से मुझे उठाकर नीचे गोबर से लिपे कच्चे फर्श पर पटक दिया था ये कहते हुए ''हटाओ ये तमाशा, एक तो अनपढ़, गंवार देहातन मेरे पल्ले बाँध दी ऊपर से इन सब चक्करों में भी उलझा रहे हो''।

दादी बताती हैं कि तब आप शायद केवल अपना सामान बटोरने ही वहाँ आए थे क्योंकि तब के गए आप फिर कभी भी नहीं लौटे। मैं कभी भी नहीं भूल पाई इस बात को कि आपने मुझे हिकारत से जमीन पर पटकते हुए एक घिनौना सा नाम दिया था 'तमाशा'। चूंकि मैं नहीं समझती कि आपके और मेरे बीच में मर्यादा की कोई ओट है इसीलिये पूछती हूँ आपसे कि ये तमाशा आया कहाँ से? उसी अनपढ़, गंवार देहातन के साथ आपके संबंधों का ही तो परिणाम थी मैं। उस स्त्री को भोगते समय तो आपको विचार नहीं आया कि ये तो अनपढ़, गंवार देहातन है। मेरी माँ ने भले ही उस तिरस्कार को सह लिया हो पर मेरे मन ने अपने आपको दिया गया आपके नाम तमाशा रूपी अपमान को कभी भी सहजता से नहीं लिया।
आप एक बड़ा लेखक बनना चाहते थे और बन भी गए हैं। आज आपका नाम है, मान है सम्मान है सब कुछ है और इन सबके बीच में मैं या मेरी वो कृषकाय माँ कहीं भी नहीं आते हैं क्योंकि वहाँ तो कोई और है, वो जिसे आपने सीढी क़ी तरह इस्तेमाल किया है। सीढ़ी इसलिये क्योंकि वो उस आलोचक की बेटी थी जिसकी कलम आपको एक गुमनाम लेखक के अंधेरों से निकाल कर सफलता की रोशनी में ला सकती थी। मेरी माँ चाहतीं तो उनके रहते दूसरा विवाह करने पर आपको कोर्ट में भी घसीट सकतीं थीं परंतु वो आपकी तरह नहीं थीं, हाँ अगर उनकी जगह मैं होती तो ऐसा जरूर करती।
मुझे याद है जब मैं छोटी थी तो बहुत बार मुझे उस एक पुरुष की कमी महसूस हुई जिसे मैं दूसरों के घर में पिता के रूप में देखती थी। वह पुरुष जब किसी नन्ही बच्ची को रुई से भरी हुई गदबदी सी गुड़िया लाकर देता तो रो देती थी मैं। जब किसी बच्ची को पिता की उंगली थामे जाते देखती तो पूछती थी माँ से, दादी से कि कहाँ है ये पुरुष जो बाकी के सब घरों में तो है पर मेरे ही घर में नहीं है। उन दोनों स्त्रियों की ऑंखों में नमी का सोता फूट पड़ता था मेरे इस प्रश्न से। हालंकि ये सब बातें तब की हैं जब मैं छोटी थी नासमझ थी। उस समय मुझे पता ही नहीं था कि जिस पुरुष को लेकर मैं इतना परेशान हो रही हूं वही पुरुष मुझे 'तमाशा'नाम देकर चला गया है।

जब ठीक से समझने लायक हुई थी तब पहली बार दादी ने मुझे बैठाकर सब कुछ बताया था और बिल्कुल साफ-साफ बताया था। मुझे याद है कि उस दिन मैं स्कूल नहीं गई थी दिन भर घर में बैठी रोती रही थी। लेकिन अगले दिन जब सुबह हुई तो मैं सब कुछ भूल चुकी थी उस विगत को जो मेरा था। मुझे केवल वह शब्द 'तमाशा' ही याद था। उस दिन के बाद मुझे फिर उस पुरुष की कमी कभी भी अपने जीवन में महसूस नहीं हुई जो दूसरों के घर में पिता बन कर नंजर आता था। उस दिन के बाद मेरा एक नया जन्म हुआ था एक मजबूत और दृढ़ निश्चयी लड़की का जन्म। दादी और माँ दोनो ही चाहती थीं कि मैं खूब पढ़ूं और मैंने किया भी वही। हिंदी में मास्टर डिग्री लेने के पीछे मेरी मंशा यही थी कि मैं उस तमाशा नाम देने वाले को बता सकूँ कि अब मैं भी वही हूँ जो तुम हो।
कॉलेज के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि आपका नाम गाहे-बगाहे आता रहा। फिर जब आपने अपना आत्मकथ्यात्मक उपन्यास लिखा तब तो आपके और मेरे बीच के उस एक सच का पता सबको चल गया था। जब मैं हिंदी में एम ए कर रही थी तब उसी उपन्यास पर एक संगोष्ठी का आयोजन किसा गया था। मुझे भी उसमें अपने विचार रखने थे। मैंने अपनी बात की शुरूआत कुछ इस तरह से की थी 'ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भी इस उपन्यास में कहीं हूँ और ऐसा इसलिये क्योंकि इसका लेखक मेरी माँ का पति रहा है किंतु एक बात मैं यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मेरी माँ का पति होने का मतलब ये कदापि नहीं है कि वो मेरा पिता भी है। पिता एक पदवी होती है जो मैं किसी कायर और भगोड़े को नहीं दे सकती' इतना कह कर जब मैं सांस लेने के लिये रुकी तब पूरा हाल तालियों से गूंज रहा था। सच कहती हूं उन तालियों से बड़ा पुरुस्कार मुझे अपने जीवन में दूसरा नहीं मिला। उन तालियों ने मुझे और भी मजबूत कर दिया था वह उस व्यक्ति को मेरा पहला जवाब था जिसने मुझे तमाशा नाम दिया था।

एमए के बाद पीएचडी की और उसके बाद मेरा नाम हो गया डॉ. स्वाति कुसुम देशपाण्डे। कुसुम को स्वयं मैंने अपने नाम के बीच में स्थान दिया है क्योंकि ये मेरी माँ का नाम है, मेरे नाम के बीच में किसी भगोड़े का नाम आ ही नहीं सकता था। ये मेरा दूसरा जवाब था। ये पत्र जिस खास प्रयोजन से लिख रही हूं अब उस पर ही आती हूँ। आपको ये तो पता हो ही गया होगा कि मेरी शादी हो रही है। पता इसलिये चल गया होगा क्योंकि मैं जानती हूँ कि माँ और दादी ने मुझसे छुपाकर आपको खबर की है। मैं ये भी जानती हूँ कि उन दोनों स्त्रियों ने नहीं चाहते हुए भी केवल सामाजिक मान और मर्यादाओं के चलते ही ऐसा किया है। मैंने भी सब कुछ जानते हुए भी उनसे कुछ भी नहीं कहा, मैं उन दोनों स्त्रियों को छोड़कर अब जब जा रही हूँ तब कुछ भी कह कर या करके उन दोनों का दिल दुखाना नहीं चाहती। परम्परा है कि कन्यादान के समय स्त्री का पति भी साथ होता है और दोनों मिलकर अपनी कन्या का दान करते हैं, शायद केवल और केवल इसी परम्परा के चलते ही उन दोनों स्त्रियों ने आपको सूचना दी है।

मैं ये पत्र इसलिये लिख रही हूं ताकि आपको ये बता सकूँ कि कोई भी व्यक्ति दान उसी चींज का कर सकता है जो उसकी हो और जब आपका मुझ पर कोई भी अधिकार है ही नहीं तब भला आप मुझे दान कैसे कर सकते हैं? जिस उम्र में मैं एक गुड़िया के लिये तरसती थी तब आप वह मुझे दे नहीं पाए और अब जब उन दोनों स्त्रियों ने मिलकर एक गुड्डा मेरे लिये तलाश किया है तब मैं नहीं चाहती कि आप दुनिया के सामने आकर ये साबित करने का प्रयास करें कि आप ने ही मेरे लिये ये गुड्डा लाकर दिया है। समाज पुरुष प्रधान है और निश्चित रूप से जब आप होंगे तो आपको ही सारा श्रेय मिलेगा और उन दोनों स्त्रियों की सारी तपस्या व्यर्थ हो जाएगी। मैं नहीं चाहती कि आप उस गुड्डे के हाथों में मेरा हाथ सौंपें, पिता का सम्बोधन मैं न कल आपको दे सकती थी न आज दे सकती हूं, मेरा जीवन इस सम्बोधन से विहीन है। रही बात आपकी तो आपके साथ तो ईश्वर ने न्याय किया है आप मुझे तमाशा कह कर जमीन पर फैंक कर चले गए थे शायद इसी कारण आप फिर नि:संतान ही रहे। नि:संतान इसलिये क्योंकि मैं अपने आप को आपकी संतान नहीं मानती और उस दूसरी स्त्री से आपको कुछ नहीं मिला ना बेटा ना बेटी। मैने अपने आपको पिता सम्बोधन से स्वयं विहीन किया है किन्तु आपको बच्चों के सम्बोधन से तो स्वयं ईश्वर ने विहीन कर दिया है। मैं जानती हूं कि इस सम्बोधन से विहीन होने के कारण ही आप जरूर आना चाहेंगे मेरी शादी में।
इसीलिये आपसे कह रही हूं कि आप मेरी शादी में मत आना। मैं अपनी ही शादी में कोई भी 'तमाशा' खड़ा करके उन दो महान स्त्रियों को कोई दु:ख नहीं पहुंचाना चाहती जिन्होंने मुझे यहाँ तक लाकर खड़ा किया है कि मैं आज कॉलेज में आप और आप जैसे कई लेखकों को अपने छात्रों को पढ़ाती हूँ। पुन: आपसे कह रही हूं कि ये मैं डॉ. स्वाती कुसुम देशपाण्डे चाहती हूं कि आप मेरी शादी में ना आएँ। मैं जानती हूं कि आप इतने बेशर्म नहीं हैं कि इतना कुछ लिखने के बाद भी चले आएँ। पत्र में लिखी हुई किसी भी बात के लिये क्षमा माँगने की औपचारिकता इसलिये नहीं करूंगी क्योंकि मैने कुछ भी गलत लिखा ही नहीं है, अगर आपको किसी भी बात के लिये बुरा लगा हो तो उसके लिये आप अपने आप से खुद क्षमा मांगें और शायद मुझसे भी। आशा है आप नहीं आएंगे।-

-डॉ. स्वाती कुसुम देशपाण्डे, प्राध्यापक हिंदी विभाग, शास. कॉलेज


कहानीकार- पंकज सुबीर

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6 कहानीप्रेमियों का कहना है :

अनिल कान्त : का कहना है कि -

बहुत ही बेहतरीन कहानी ...जज्बातों की गाथा है ये ...एक ऐसे सच को कहानी में पिरोया है जिसे कई लोगों ने जिया है अपने जीवन में ....लेखक बधाई का पात्र है

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

कहानी कहने की शैली पसंद आई।

Anonymous का कहना है कि -

एक प्रखयात लेखक और तथाकथित समालोचक को मैं भी जानता हूं जिनकी कथा इससे काफी मिलती जुलती है....नाम तो नहीं लूंगा पर वे रहने वाले उत्तर प्रदेश के हैं पर कई साल से भोपाल में हैं...पहली पत्नी वहीं गांव में उ प्र में हैं शायद....कई साहित्यकारों की अटैचियां ढो कर बड़े आलोचक हो गए हैं...पढ़ाते भी हैं ...अभी एक हिंदी सभा के अध्यक्ष भी हो गए है....पर पहली पत्नी आज भी गुमनाम...हां धोती पहनते हैं, गांधी दर्शन पर बहुत बात करते हैं और स्त्री विमर्श-नारी उत्थान के प्रबल पैरोकार

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

एक पत्र ने कितनों की पोल खोल दी। ऎसे तथाकथित साहित्यकारों/कलाकारों/फनकारों के कईयों उदाहरण हैं जो आए दिनों कहीं न कहीं देखने या फिर पढने को मिल जाते हैं। दोमुँहे साँप बस राजनीति में हीं नहीं होते!!!

-विश्व दीपक

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आपनी-अपनी जिन्दगी, अपने-अपने ढोल.

ढोल मिला जितना बड़ा, उतनी ज्यादा पोल.

कोई सियासत कर रहा, कोई रचे साहित्य.

दाग रहित कोई नहीं, शशि हो या आदित्य.

बहता पानी निर्मला, मैला बिना प्रवाह.

'सलिल' न पग को रोकना आह मिले या वाह.

prabha का कहना है कि -

bahut hi shaandar

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