Thursday, January 22, 2009

डर- नया ज्ञानोदय द्वारा पुरस्कृत ६वीं कहानी

कहानी-कलश के पाठकों को हमने बताया था कि हिन्द-युग्म के युवा कहानीकार विमल चंद्र पाण्डेय को इनके पहले कहानी-संग्रह 'डर' के लिए वर्ष २००८ का नवलेखन पुरस्कार दिया गया है। अब तक आपने इस संग्रह की
५ कहानियाँ (चश्मे, 'मन्नन राय ग़ज़ब आदमी हैं', स्वेटर, रंगमंच और सफ़र) पढ़ चुके हैं। आज पढ़िए शीर्षक कहानी 'डर'


डर

लड़की कमसिन थी, सांवली थी और डरपोक थी। शरीर का भराव उसे उसकी आयु से अधिक का दिखाता था नहीं तो वैसे वह चैदह पार कर ही रही थी। उसका बाप उसके डर की वजह से अक्सर उसकी उम्र का उलाहना दिया करता था-"तेरी उमर में तेरी मां की शादी हो गयी थी और तू चूहों से डरती है।" कभी प्यार से समझाता- "बेटी, गांव की बिटिहनियां मकड़ों और तिलचट्टों से नहीं डरती। ये शहर की छोरियों के नखरे होवे हैं।"
लेकिन लड़की कुछ चीज़ों से हमेशा डरती रही थी। चूहों से, अंधेरे से, तिलचट्टों से, भूतों से..........। फ़ेहरिस्त लम्बी थी। इस फ़ेहरिस्त में कुछ ऐसे नाम थे जिनसे वह रोज़ दो-चार होती थी, मसलन चूहे, तिलचट्टे, मकड़े, अंधेरा.........। कुछ ऐसे भी नाम थे जिनसे अब तक उसका सामना नहीं हुआ था मसलन भूत-प्रेत, अजगर, हाजी बाबा.........। लेकिन उन चीज़ों से उसे ज़्यादा डर लगता था जिन्हें उसने सुना था, देखा नहीं था बनिस्पत उनके जिन्हें रोज़ देखती थी।
अजगर की तस्वीर उसने सरपंच की बेटी की किताब में देखी थी। सरपंच की बेटी उसकी सहेली थी और स्कूल भी जाती थी। वह अक्सर अपनी किताबें उसे दिखाया करती थी। वह तस्वीर देख कर सहम गयी थी। बाप रे, इतना बड़ा सांप। और जब उसने सुना कि यह सांप काटता नहीं पूरे आदमी को निगल जाता हे तो अजगर कई रातों तक उसके सपने में आकर उसे डराता रहा।
जब बापू ने समझाया कि अजगर बड़े-बड़े जंगलों में होते हैं, इतने छोटे जंगल में नहीं जितने हमारे गांव में हैं तब लड़की को कुछ राहत मिली थी। लेकिन सबसे बड़ा डर था हाजी बाबा का। कहते थे कब्रिस्तान में हाजी बाबा रात को अपनी कब्र से निकल कर घूमा करता है। लड़की बाबा से इतना डरती थी कि रात को अपनी झोंपड़ी से बाहर भी नहीं निकलती थी।
आज जब अंधेरी रात में उसे उसी रास्ते से जाना पड़ रहा था तो उसकी टांगें कांप रही थीं। उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और कदम जैसे तुरंत मंज़िल पर पहुंच जाना चाह रहे थे। दिमाग में हालांकि डर से अधिक बाप की खून की उल्टियां नाच रही थीं, लेकिन कब्रिस्तान तक पहुंचते ही दिमाग से हर बात को निकाल कर डर ने क़ब्ज़ा जमा लिया।
लड़की बहुत तेज़ क़दमों से चलने लगी। वह जल्दी से जल्दी दूसरे गांव, डॉक्टर के घर पहुंच जाना चाह रही थी। अब तक बाप का इलाज गांव का वैद्य ही कर रहा था लेकिन ख़ून की उल्टियों के दौरे रुकने की बजाय बढ़ते गये। आज जब दौरा पड़ा तो ख़ून के साथ मांस का टुकड़ा भी आया। उल्टियों ने जब रुकने का नाम न लिया तो वैद्य ने घबराकर दूसरे गांव से डॉक्टर को बुलाने के लिए लड़की को तुरंत भेजा। घर में बाप बेटी के अलावा कोई तीसरा था भी नहीं जो इतनी रात में तीन मील का रास्ता तय करके डॉक्टर को बुलाने जाता। अचानक उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे-पीछे चल रहा है। उसे अपने क़दमों में किसी और के क़दमों की सम्मिलित आवाज़ सुनायी देने लगी। शरीर के भीतर एक ठंडी लहर उठी और पूरा शरीर एक बार कंपकंपा उठा। क़दमों की रफ्तार उसने तेज़ कर दी। पीछे भी क़दमों की आवाज़ तेज़ हो गयी और ठंडी बयार के बावजूद उसके माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा। अभी भी कब्रिस्तान का रास्ता पांच सौ मीटर बचा था। लड़की जल्दी से जल्दी कब्रिस्तान का रास्ता पार कर जाना चाहती थी लेकिन वह उड़ नहीं सकती थी पीछे घूम कर देखना भी उसके बस में नहीं था। उसे पक्का विश्वास था कि पीछे कब्रिस्तान से निकल कर हाजी बाबा ही आ रहा है।
हवाएं अलग-अलग पेड़ों के पत्तों से टकराकर अलग-अलग आवाज़ें निकाल रही थीं। इन आवाज़ों को भले ही कोई प्रकृति की सुंदरता और मनोहरता मानता हो, लड़की के लिए ये आवाज़ें उसके डर को कई गुना बढ़ाने वाली थीं। ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर जब उसके क़दम पड़ रहे थे तो उनके चरमराने की आवाज़ ऐसी लग रही थी मानो पत्ते पैरों से कुचले जाने के कारण चीत्कार कर रहे हों।
भय का साम्राज्य लड़की के पूरे वजूद पर हावी हो रहा था। उसने एक गीत गाने की कोशिश की जो उसकी मां गाया करती थी। दो साल पहले जब मां मरी तो लड़की को गीत पूरा ज़बानी याद हो चुका था। मगर फंसी-फंसी आवाज़ ने विचारों का साथ नहीं दिया। जब गीत की एक पंक्ति लड़की के मुंह से निकली तो रात के सन्नाटे को चीरती हुयी दूर तक निकल गयी। लड़की को अपनी ही आवाज़ बिल्कुल पहचान में नहीं आयी और वह उस अजनबी आवाज़ को सुनकर डर गयी। उसके गीत का एक पत्थर सन्नाटे की झील की शांति को भंग कर गया।

लड़की मन ही मन गीत गाने लगी। मां बहुत अच्छा गाया करती थी। मां को तो जलाया गया था, उसे दफ़नाया नहीं गया था, क्या इसीलिये मां से डर नहीं लगता? दफ़नाने और जलाने का फ़र्क उसे कभी समझ में नहीं आया। तौहीद चाचा को तो इसी कब्रिस्तान में दफ़नाया गया था। यहां से गुज़रने पर उनका चेहरा याद आना और डर लगना स्वाभाविक ही है। मान लो हाजी बाबा के बारे में तो सिर्फ़ सुना है पर तौहीद चाचा तो......। अभी तीन महीना पहले तक उसके घर आया करते थे। उसे लगा जला देना ही ठीक है, किसी को भूत बनने का मौका ही न मिले। नहीं तो कब्रिस्तान में रात को अपनी कब्र से निकल कर भूत बन कर...............।
तौहीद चाचा का चेहरा याद आ जाने पर लड़की मन में भी गीत गाना भूल गयी। कितनी ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगा कर हंसते थे। उसे लगा जैसे वह पीछे पलटी तो तौहीद चाचा उसके ठीक पीछे ठहाके लगाते दिख जाएंगे। वह सिहर उठी। दिमाग में तौहीद चाचा की ठहाकेदार हंसी गूंजने लगी।
दिमाग में एक साथ कई विचार घूम रहे थे लेकिन सभी विचारों को अचानक विराम मिल गया। लड़की के हाथ पर पानी की एक बूंद गिरी। फिर दूसरी.........तीसरी.........चैथी........टिप........टिप............टिपटिप..........टिपटिप........। पानी से बचने के लिए लड़की ने चारों तरफ़ देखा। इसी बहाने एक झटके में पीछे भी देख लिया। पीछे कोई नहीं था। उसने फिर पीछे देखा। कई बार पीछे देखकर उसने अपने डर पर काबू पाने की पूरी कोशिश की। कब्रिस्तान क़रीब सौ मीटर पीछे छूट चुका था। शायद भ्रम रहा हो किसी का चलना.........या कब्रिस्तान ख़त्म हो गया इसलिये वह भी वापस..............?
बारिश तेज़ होने लगी। दूसरे गांव की सीमा शुरू हो चुकी थी। इस गांव के दूसरे किनारे से सड़क जाती थी, इसलिये यह गांव कुछ विकसित था। इसमें कई पक्के घर भी थे जिसमें एक शानदार घर उस डॉक्टर का भी था जिसे कई गांवों से लोग बुलाने आया करते थे। कब्रिस्तान की सीमा समाप्त होने के कुछ देर बाद गांव शुरू होते थे वरना बीच में सिर्फ़ खेत ही खेत थे, या फिर एकाध मड़इयां या टीन शेड की छत वाले एकाध कमरे जिनमें रात रुक कर लोग अपने खेतों की रखवाली करते थे या अपने ट्यूबवेल की मशीनें गाड़ रखी थीं।
एक टीन शेड वाले कमरे में हल्की रोशनी आ रही थी। लड़की तेज़ कदमों से बारिश से बचती हुयी जाकर दरवाज़े से सटकर खड़ी हो गयी। कुछ दूरी पर गांव नज़र आ रहा था और टिमटिमाती रोशनियां भी। लड़की का डर अपने आप को गांव के नज़दीक और कब्रिस्तान से दूर पाकर थोड़ा समाप्त हो चुका था।
छींटें हवा के कारण तिरछी पड़ रही थीं। लड़की के मुंह पर बौछारें पड़ने लगीं। वह थोड़ी पीछे खिसकी। दरवाज़ा थोड़ा सा खुल गया।
’’आ जा, दरवाज़ा खुला है।........जल्दी आ।’’ अंदर से एक मर्दाना आवाज़ आयी।
’’जी.........मैं।’’
’’जी मैं क्या..........जल्दी अंदर आ। कब से इंतज़ार कर रहा हूं।’’
आवाज़ में कड़कपन और आदेश था। लड़की सहम कर अंदर प्रवेश कर गयी। अंदर एक मोटा आदमी चारपाई पर बैठा हुआ था। तिपाई पर बोतल गिलास और नमकीन रखे हुए थे। लड़की ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा। मोमबत्ती सी रोशनी बिखेरता एक पीला बीमार बल्ब आदमी के ख़तरनाक चेहरे को और भी ख़तरनाक बना रहा था। ऐसा लगता था उसके चेहरे पर बाल ही बाल हों। लड़की ने उसके चेहरे से नज़रें हटा लीं।
’’जी, बाहर पानी बरस रहा था....................इसलिये मैं.....यहां।’’
’’इसलिए देर से आयी। मैं कब से इंतजार कर रहा हूं। बारिश आ गयी थी तो कयामत आ गयी थी क्या.....? कमबख्त, सारा नशा उतार दिया... फिर चढाना पड़ेगा ... साली... पैसा इतना ज्यादा लिया और समय का कुछ ख्याल ...।’’ आदमी बड़बड़ाता हुआ उठकर गिलास भरने लगा।
’’अब वहां खड़ी क्या है ? यहां आ, चारपाई पर बैठ। माघव तो कह रहा था तू बड़ी मुंहजोर है, मगर मुझे तो लगता है तेरे मुंह में जबान ही नहीं है।’’ आदमी गिलास खाली करने लगा।
लड़की ने उसके आदेश का पालन किया और चारपाई पर बैठ गयी। वह उसके चेहरे की ओर देखने हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। नजरें नीची कर अपने नाखून कुतरती रही।
थोड़ी देर में आदमी ने दो गिलास खाली कर दिए और ज़ोर की डकार ली। लड़की ने चिंहुककर आदमी के चेहरे की ओर देखा। बाल ही बाल...दाढ़ी़....मूंछे। अगले ही पल लड़की की चीख निकल गयी जब उसने वही बाल, दाढी, मूंछे अपने चेहरे से टकराते पाया।
’’क्या हुआ?’’ आदमी रुक गया।
’’क़ु॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰कुछ नहीं ।’’ लड़की कांप रही थी।
’’फिर तू चीखी क्यों...?’’
’’मुझे गांव जाना है...बापू को खून की उल्टियां ....... डॉक्टर.. ।’’ लड़की की आवाज़ के साथ उसका शरीर भी कांप रहा था।
’’हर इंसान की कोई मजबूरी होती है तभी उसे इस काम में...।’’ आदमी कुछ सोचते हुए बोला, फिर उसे महसूस हुआ कि एक रात के सम्बन्धों में कोई जुड़ाव नहीं होना चाहिए। वह बात पूरी किए बिना लड़की के चेहरे को फिर से सहलाने लगा।
’’मुझे जाने दो।’’ लडक़ी का पूरा वजूद कांप रहा था।
’’क्यों ... क्यों जाने दूं..? माधव को पैसे दिए हैं। फ्री में नहीं बुलाया तुझे।’’ वह झुंझलाने लगा था।
’’ क........कौन माधव....? मैं तो बापू के लिये..............डॉक्टर को बुलाने जा रही थी कि बारिश होने लगी। ख़ून की......उल्टियां हो रही हैं। आज मांस का...... टुकड़ा भी आया। वैद्यजी ने बताया कि यह बीमारी......।’’ लड़की कांपती और सुबकती आवाज़ में पूरा इतिहास सुनाने लगी।
’’चुप रह......चुप।’’ आदमी ने डपटा। उल्टियों की बात सुनकर उसका जी ख़राब हो आया था। नशा भी कम होने लगा था।
’’ तू झारगांव की नहीं है ?’’
’’ नहीं जी.......मैं माहपुर की हूं।’’
’’..........’’
’’ जी, मैं जाऊं ?’’ लड़की उठ खड़ी हुयी।
अब आदमी को सारा माजरा समझ में आ चुका था। लड़की किसी दूसरे गांव की है। किसी ग़रीब की बेटी। गलती से यहां आ गयी है। शराब का नशा सिर पर नाचने लगा। एकदम अनछुई कली जिस पर जवानी ने अभी-अभी आक्रमण किया है। एकदम नादान, एकदम अंजान..........। आदमी ने मुस्कराते हुये ज़ोर की अंगड़ाई ली और दरवाज़े तक पहुंची लड़की को पकड़कर चारपाई पर गिरा दिया। एक अलग तरह का उत्साह और वहशीपन उस पर हावी हो चुका था।
’’छोड़ो, छोड़ो मुझे..........मुझे डॉक्टर के...........।’’
आदमी अपने पूरे शरीर का बोझ उसके शरीर पर डालकर उसके होंठ चूमने लगा। लड़की को लगा जैसे उसका पूरा वजूद बालों ही बालों से भर गया। उसने आदमी को उठाने के लिये पूरी ताक़त लगा दी पर आदमी टस से मस नहीं हुआ।
लड़की को कुछ नहीं सूझा तो उसने अपने नुकीले दांत आदमी के कंधे में गड़ा दिये.........पूरी ताक़त से। आदमी तड़प कर एक तरफ हट गया। लड़की फुर्ती से चारपाई से कूदकर दरवाज़े की तरफ लपकी। आदमी अपने कंधे को सहला रहा था। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर उसका ध्यान आकृष्ट हुआ। लड़की तब तक बाहर निकल चुकी थी। आदमी एक ही छलांग में दरवाज़े के पास पहुंच गया। लड़की गांव के उजाले वाले रास्ते की तरफ न भागकर अंधेरे वाले रास्ते की तरफ भाग रही थी। आदमी पल भर के लिये ठिठका फिर उसी अंधेरे कब्रिस्तान वाले रास्ते की तरफ लड़की के पीछे दौड़ पड़ा।
लड़की ने दौड़ते ही अंदाज़ा लगा लिये था कि वह गलत दिशा में दौड़ रही है, उसे उल्टी तरफ गांव की ओर जाना चाहिये था लेकिन अब पीछे जाने का मतलब था एक घिनौना और लिजलिजा एहसास जो अभी तक उसे अपनी सांसों में अनुभव हो रहा था। वह दौड़ती रही।
शेर और हिरन की दौड़ में अक्सर हिरन ही जीतता है क्योंकि शेर भोजन के लिये दौड़ता है और हिरन जीवन के लिये। आदमी पूरी ताक़त से दौड़ रहा था पर लड़की अब भी आगे थी। अचानक उसका पांव कहीं टकराया और वह आगे की ओर गिर पड़ी। उसने उठने में थोड़ा ही वक़्त लिया पर आदमी इस बीच काफी पास आ चुका था।
सोचने का समय नहीं था। लड़की ने बस क्षणांश के लिये सोचा और कब्रिस्तान में घुस गयी। आदमी भी दौड़ता हुआ कब्रिस्तान के गेट में प्रवेश कर गया। लड़की एक कब्र के पीछे सिमटी हुयी थी। आदमी कब्र के दूसरी ओर खड़ा था। पानी बरसना कम हों गया था। लड़की का भूतों और कब्रों वाला डर भी कम हो गया था।
लड़की ने अपनी फूलती सांस को काबू कर लिया। आदमी ने एक बीड़ी सुलगा ली थी और हर कब्र के पीछे लाकर झांक रहा था। लड़की इस कब्र के पीछे से धीरे से निकली और दूसरी कब्र के पीछे जा छुपी। आदमी जब उसकी वाली कब्र के पास आता तो वह दूसरी कब्र के पीछे जा छुपती। वह कब्रिस्तान और कब्रों से खेलने लगी थी।
आदमी ने अब दिमाग़ लगाया। वह माचिस जला जला कर हाथ से ओट करके एक कब्र के पास से कई कब्रों को देखने लगा। लड़की की सांस यथास्थान रुक गयी। आदमी अब लड़की वाली कब्र के पास आ चुका था। उसके माचिस जलाने से पहले ही लड़की ने अपने जीवन का सबसे साहसिक निर्णय लिया। वह दबे पांव उस कब्र से निकली और झुकते-झुकते कब्रिस्तान की सबसे विराट कब्र के पीछे चली गयी। उस कब्र के पास मोटे तने वाला पेड़ भी था जिसकी विशालकाय डालियां अजगर की तरह थीं। पेड़ भी उतना ही चर्चित था जितना हाजी बाबा की यह विराट कब्र। दिन में भी उस रास्ते से गुज़रने वाले इस कब्र और पेड़ की ओर देखने में सिहरन महसूस करते थे। लड़की पेड़ और कब्र के बीच की जगह में छुप गयी। बारिश बहुत कम हो गयी थी। लड़की का डर भी।
आदमी माचिस की तीलियां जलाता हुआ उस विराट कब्र के पास आ रहा था। कब्र से थोड़ी दूरी पर उसने तीली जलायी और भक्क से रोशनी में उसकी नज़र कब्र के विराट पत्थर पर पड़ी, फिर उस विशाल पेड़ पर। वह घबराकर पीछे हट गया। कब्र और पेड़ से संबंधित सारी कहानियां उसे याद आने लगीं। उसने एक बार अपने चारों तरफ देखा। एक ठंडी सिहरन पांवों से दिमाग तक दौड़ गयी। वह डर कर सीधा गेट की तरफ भागा और एक बार भी पीछे मुड़कर नही देखा। गेट से निकल कर भी वह सीधा भागता गया..........भागता गया...........भागता गया।

बारिश एकदम रुक गयी थी।

----विमल चंद्र पाण्डेय

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8 कहानीप्रेमियों का कहना है :

Nirmla Kapila का कहना है कि -

ramanchak kahani hai

pooja का कहना है कि -

विमल जी,

जब कहानी पढ़ना शुरू किया तो "डर" शीर्षक को खोज रही थी, अंत तक आते आते सिहरन हो रही थी और कहानी समाप्त होते होते डर का स्वरुप बदल चुका था.

एक ही साँस में कहानी का उत्तरार्ध समाप्त कर दिया.बहुत ही उम्दा कहानी है, प्रवाह निरंतर बना हुआ है , भाषा भी समयानुकूल है. बहुत बहुत बधाई.

पूजा अनिल

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

आरम्भ से अंत तक बांधे रखने वाली बेहतरीन कहानी...
आलोक सिंह "साहिल"

addictionofcinema का कहना है कि -

ap sabka bahut bahut dhanywad. aisi pratikriyaon se bahut protsahan milta hai mitron

चारु का कहना है कि -

शेर और हिरन की दौड़ में अक्सर हिरन ही जीतता है क्योंकि शेर भोजन के लिये दौड़ता है और हिरन जीवन के लिये...... यह बात बहुत ही अच्छी लगी बहुत ही उम्दा कहानी ..बहुत बहुत शुभकामनाएँ..

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

रोचक कहानी. प्रवाहमयी भाषा- सहज घटनाक्रम sanjivsalil.blogspot.com
-divyanarmada.blogspot.com

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

इस कहानी के माध्यम से डर की सही परिभाषा बताई है आपने। वैसे भी अमूर्त चीजों से क्या डरना जब मूर्त चीजें हीं आपके जान की प्यासी हो।
एक रोमांचक एवं विचारोत्तोजक कहानी के लिए बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक

Anonymous का कहना है कि -

जून विशेषांक सबसे बुरे और रचनात्मकता के नाम पर दीवालिया टायप के युवा लेखकों – लेखिकाओं की कहानियों से भरा है. ज्योति चावला से कहें कि वह सरिता या गृह्शोभा या मेरी सहेली में लिखे, या फिर ज्ञानोदय भी अब प्रेम , बेवफाई, प्रेम अपराध, यौन कथा, तंत्र – मंत्र, विशेषांक के स्तर पर गिरने को है बस प्रतीक्षा करे.
उमा शंकर खुद तो टीक लिख ले फिर श्रीमति को लॉंच करे.

वन्दना राग पूरे देश में गाती फिरी कि उसे रवीन्द्र्कालिया, अखिलेश, आलोक जैन ने धमकी दी... मगर इस लद्ध्ड युवा विशेषांक में उनकी लद्धड कहानी की उपस्थिति बताती है कि वन्दना राग को कौन उपेक्षित कर सकता है.अपनी घटिया कहानियाँ वो कहीं भी छ्पा सकती हैं, तहलका हो कि ज्ञानोदय. कमला जी तो वसुधा में उन्हें हर अंक में छाप दें. वो धडाधड हर अंग पर कहानी लिख रही हैं, नाक, कान, आँख, काँख, होंठ, गला..वक्ष…. संपादकों छापो उन्हें. वह तो पति के पद की गरिमा और गौरव अपने कन्धे पर लिए चलती हैं, अभी वो पंकज के साथ कालिया जी से मिलने दफ्तर आई थीं मैं संयोग से वहीं था, गर्व छलका जा रहा था, कालिया जी लपर – लपर…कर रहे थे

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