Monday, December 31, 2007

अपंग

-तो, अब लड़की को बुलाया जाये?
मेरे घरवाले, जिनमे मैं, मेरी बहन, मेरी माँ और मेरे पिताजी हैं, मेरे लिए दुल्हन पसंद करने आये हैं

लड़की परंपरागत भेष-भूषा में चाय-बिस्कुट के साथ हाज़िर होती है
-बैठ जाओ, बेटी! - माँ ने कहा
साड़ी संभालते हुए हलकी-सी मुस्कान के साथ बैठ जाती है
-अच्छा हँसती हो। - मैने कहा
-शुक्रिया। -वह हल्की मुस्कुराई।
-हँसने के लिए क्या..... गालों को आपरेशन से सजाया है ?
- जी नही, बचपन से ऐसे ही हैं
-लगते नहीछोडो कोई बात नहींअच्छा यह बताओ , हाथों से काम कर लेती हो , मतलब की खाना-पीना, खाना बनानाकहीं ये हाथ नकली तो नहीं हैं
- नही जी, असली हैंएकदम भगवान के घर से ही जुड़ कर आये हैं
-वाह ! बहुत ख़ूब ! और पैरों के बारे में क्या ख्याल है , देखने में तो ये भी भगवान के घर वाले ही लगते हैं, लेकिनआज के जमाने में किसी भी चीज़ पर भरोसा नही किया जा सकता
-ये भी असली हैंमाँ कसम!
-ठीक है , जरा चल कर दिखाओ तोएडियों और पाँव की ऊंगलियों को इधर-उधर घुमाओहाँ , असली ही लग रहीहैं
( मैं क्या पूछ रह हूँकिसी के चेहरे पर किसी भी तरह के भाव क्यों नही उभर रहे? )
-तो यह शादी पक्की समझी जाये । - माँ ने स्वीकृति के शब्दों में कहा

दृश्य तेजी से बदलते हैंशादी हो चुकी हैसुहागरात का सुखद अवसर सामने है

आज हमारी पहली रात है- मैंने कहा
- आज हम एक-दुसरे को अच्छी तरह से जान ले, पहचान लेसुनो, मैं तुम्हारे हाथ- पाँव देखना चाहता हूँ। ( यहमैं क्या बोल रह हूँ ! )
- लो देखो । - यह कहकर उसने अपने हाथ- पाँव शरीर से उतारकर धर दिए।
-क्या ? ....... तुम्हारे हाथ-पाँव ...... तुम अपंग !

मैं बेहोश हो जाता हूँ

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बड़ा ही भयावह एवं अजीबो-गरीब स्वप्न थादिल में कुतूहल पैदा हो, उससे पहले ही मैंने करवट बदल लीमेरामस्तिष्क एक नए ख्वाब की संरचना में जुट गया

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-दोस्तों , आज मैं सबके सामने अपने इश्क का इकरार कर रहा हूँ
सारे मित्रों की नज़रें मुझपर हीं टिकी हैं
-मेरा पाक प्रेम! यह 'क्लास' मेरी मोहब्बत का गवाह रहेगा, रहेगा ना?
मैं पूरे जोश और होश में विभा से अपना प्रेम स्वीकार कर रहा हूँक्लास में विभा भी मौज़ूद है
(लेकिन हम दोनों तो साथ में नहीं पढते! )
विभा सर झुकाकर हामीं भरती है
(लेकिन विभा से मेरा प्यार तो एकतरफा है। )
सारे दोस्त खड़े होकर तालियाँ बजाते हैं, सीटियाँ बजाते हैंमाहौल बड़ा हीं खुशनुमा हैतभी 'क्लास' में प्रोफेसरगांगुली का आना होता है। ( प्रोफेसर गांगुली! ये तो मुझे केमिस्ट्री पढाते हैं।)
-आज मैं जो चैप्टर पढाने जा रहा हूँ , उसका नाम है " वेन विश्व मेट विभा "।
(केमिस्ट्री के पीरियड में इंग्लिश लव स्टोरी ! उफ ! पर पता नहीं क्यों, किसी भी छात्र को इसकी कोई परवाह हींनहीं है।)
-विभा की पहचान विश्व से पहले उसकी छोटी बहन प्रीति से हुई थी। -प्रोफेसर ने कहा

मैं संग-संग सोचता जाता हूँ
प्रीति मुझसे विभा की ढेर सारी बातें किया करती थी
-आज विभा ने रंगोली बनाई
-आज, जानते हो भैया, एक लड़के ने विभा को छेड़ना चाहा तो उसने उसे थप्पर रसीद कर दिया
-आज विभा ने अपने हाथों पर मेंहद रची थी

-विश्व विभा की मेंहदी में "वि" ढूँढकर उसमें अपने नाम को महसूस करता था

मैं फिर सोचने लगता हूँ
विभा का नाम लिखकर उससे बातें कर रहा हूँ
-विभा मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँबचपन से हीं तुम्हें चाहता हूँना!ना! पिछले जन्म से या फिर हजार जन्मोंसे

-विश्व विभा के प्यार में पागल हो गया था, जबकि उसे उसने देखा तक नहीं था
-एक दिन वह विभा से मिलने गया

-भैया! यही है विभामेरी सबसे अच्छी और खूबसूरत सहेली। -प्रीति मुझसे कहती है
मैं कुछ भी नहीं कह पाताबस उसे एक टक देखता रह जाता हूँउसके सौन्दर्य के सान्निध्य का पल मैं खोना नहींचाहताशनै: शनै: मेरा प्रेम अपरीमित हुआ जाता है

-विश्व विभा के प्यार में इस कदर मशगूल था कि उसे इसका भान हीं नहीं रहा कि विभा जिन दो पैरों पर खड़ी थी, वे हाड़-माँस के नहीं थेउसके दोनों पैर कृत्रिम थेलेकिन प्रेम........

यकायक मैं सोच से बाहर आता हूँमैं विभा की ओर देखता हूँविभा मुझे हीं देख रही होती हैमुझसे नज़र मिलतेहीं वह अपना सर नीचे कर लेती हैफिर, मैं उसके कदमों को निहारने लगता हूँ
एक झटके से पैरों से आवाज आती है- हाँ, हम असली नहीं है।- यह कहकर दोनों पैर बाहर निकल आते हैं
मैं कुछ भी समझ नहीं पातापल में हीं दोनों पैर लोहे के तार बनकर मेरी आँखों में चुभने लगते हैंविभा ओझलहोती जाती है..........

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एक करवट, दूसरी करवट....तीसरी.... नींद खुल गईमेरा पूरा चेहरा पसीने से तर-बतर थादोनों हीं स्वप्न मेरीआँखों पर उपलाते-से प्रतीत हो रहे थे
उठकर मैं माँ के पास चला गया
-बेटा! कोई बुरा ख्वाब देखा क्या?
मैं निरूत्तर
-मैने हजार बार मना किया कि दिन में मत सो .... मत सोदिन के ख्वाब अच्छे नहीं होतेलेकिन मेरी माने तोना
-कुछ नहीं माँबस ऎसे हीं
मैं माँ के पास भी खुद को असहज महसूस कर रहा थासो, बात टालकर बरामदे में गया
एक हीं तरह के दो स्वप्न.....मुझे कुछ भी समझ नहीं रहा था
- आखिर ऎसे स्वप्न मुझे आए हीं क्यों? और जो स्वप्न में हुआ , क्या ऎसा हो भी सकता है
-कोई किसी अपंग से प्रेम कर भी सकता है क्या? जो खुद को नहीं संभाल सकती, वह दूसरों को क्या संभालगी, प्यार कैसे करेगीऔर ऎसों से शादी ! ऎसी किसी लड़की से शादी की कोई सोच भी कैसे सकता है
-किसी अपाहिज के साथ जीना क्या, एक पल गुजारना भी असंभव है
-छि: , मैं भी कैसे-कैसे सपने देखने लग गया हूँ
-विभा, मेरी विभा, ना...ना.... सपना हीं थावो ऎसी नहीं हो सकतीना....! लेकिन मैने अभी तक उससे खुलकरबात भी तो नहीं की हैउसे ठीक से देखा भी तो नहीं हैकहीं वो भी.....
- भगवान करे, ऎसा होमैं आज हीं उससे मिलता हूँउससे अपने दिल की सारी बातें कहकर डालूँगा

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मैं विभा के दरवाजे पर थाआज तक जो कह सका, पता नहीं कैसे, आज उससे कह देने की हिम्मत गई थीमुझमेंशायद यह मेरी मजबूरी थी या मेरा प्यार.... कुछ भी हो, लेकिन आज अपने दिल की बात जबां पर लानीहीं थीमैने अपनी ऊँगलियों को डोरबेल पर प्रहार करने के लिए तैयार किया.... आगे बढाया... फिर रूक गयापहली दफा होने के कारण मैं अपने आप को पूरी तरह से तैयार नहीं कर पा रहा थासहमते हुए मैने डोरबेलबजाया

-खोलता हूँ। (दरवाज खोलकर) कहिए, कौन हैं, किससे मिलना है?
- वि....... विश्व आया है, वि...... विभा से कह दीजिए। (शायद विभा का भाई था।)
-विश्व कौन?
-उसकी सहेली प्रीति का भाई
वह मुझे घूरता रहामैं आगे कुछ कह सका
फिर कुर्सी की ओर ईशारा करते हुए उसने कहा- ठीक है, आप यहाँ बैठिएमैं पूछता हूँ

अंदर से आवाजें रही थीं-
-दीदी, कोई विश्व है
-बैठाओमेरी .......

आगे की बातें मैं सुन नहीं पायाकहीं खो गया था , शायद
-दीदी रही है
-अच्छा, सुनो यह बैसाखी किसकी है।- कोने में रखी एक बैसाखी की ओर ईशारा करके मैने पूछा। ( मैं अभी भीअपने स्वप्न की दुनिया में हीं था।)
- जी.... अच्छा, यह बैसाखी! दीदी की है
-दीदी...
मेरा स्वप्न यथार्थ में बदलने लगा थामेरी आँखों के सामने अंधेरा-सा छाने लगा
-वो क्या है कि कभी-कभार वो कॄत्रिम पाँव लगा लेती हैहमेशा नहीं लगाती..... चुभता है नाजैसे कि अभी लगाईहुई है
वह बोले जा रहा था
-सुनो, कह देना कि कुहासे छट गए हैंमुझे रास्ता दीख गया हैमंजिल ..... मेरी मंजिल.... वोछोड़ो, इतना हींकह देना वो समझ जाएगी। - यह कहकर मैं वहाँ से चल दिया
वह मुझे रोकने की कोशिश करता रहा, पर मैं ना रूका

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-विभा भी! इतनी झूठी और मक्कार होगी वो , मैने कभी सोचा भी नहीं थामुझे पहले हीं इस बात का भान क्योंनहीं हुआआह....! वह हमेशा जूत क्यों पहनी होती थी, हमेशा एड़ियों तक के हीं कपड़े क्यों पहनती थी.... छुपातीथी मुझसेझूठी.... अपंग.....। सारे अपंग लोग हीं झूठे होते हैं... मक्कार होते हैं.....चालबाज......
मैं सड़क पर निर्बाध बढा जा रहा था

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-भैया, अब कैसे हो?
-बेटा.... होश गया मेरे बेटे को
-मैं.... मैं कहाँ हूँ?......अस्पताल में...... क्यों?
-भैया.... परसो सड़क पर ....परसो आप रहे थे तो पीछे से ट्रक ने आपको धक्का दे दियालेकिन कोई बात नहीं, चोट ज्यादा गहरी नहीं थी। ( उसकी आँखों में आँसू थेमैने उन्हें पढने की कोशिश की।)
-अच्छा.....
-अब कैसे हो? -विभा ने पूछा
-तुम... तुम भी यहीं होक्यों आई हो? झूठी .... मक्कार....। यह सब... सब तुम्हारे कारण हीं तो हुआ है
-मेरे कारण? मैने क्या किया?
-भैया, क्या बोल रहे हो?
-बेटा, ऎसा नहीं कहते
-हाँ , सही बोल रहा हूँतुम्हारी सहेली अपंग हैउसके पाँव नकली हैंऔर अपंग लोग छलिया होते हैं, मक्कारहोते हैं। .... अपनी सहेली के बारे में जानती थी तुम.... हाँ... नहीं ना.... पूछो अपनी सहेली से। - मैने प्रीति से कहा
-क्या अनाप-शनाप बक रहे हो! - विभा चौंकी
- अनाप-शनाप! वाह! छोड़ो , मुझे यहाँ नहीं रहनातुम्हारे सामने सच भी नहीं कह सकताओह!
मैने उठने की कोशिश की
- आह! नहीं...... मेरा पाँव! मेरा एक पाँव क्या हुआ?
-बेटा, एक्सीडेंट में तुम्हारा दाहिना पाँव बुरी तरह जख्मी हो गया थाजहर पूरे शरीर में फैल रहा थाइसलिए उसेहटाना पड़ा। - माँ ने रोते हुए कहा
-किस..... किससे पूछ कर ऎसा किया?
-आपसे कैसे पूछता कोईआप बेहोश थे। - प्रीति की आँखें सूजी जा रही थीं
- नहीं..... मुझे मरने दिया होतालेकिन अपंग.....अपंग.....। मैं भी!
-चले जाओ तुम सब यहाँ सेमुझे अकेला छोड़ दो
डाक्टर ने उन सब को इशारे से बाहर जाने को कहामैं घंटों रोता रहा

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चोट ने इनके स्वभाव पर ऎसा असर किया हैऊपर से पाँव चले जाने का सदमा! इंसान ढेर सारा खून गँवा देने केबाद चिरचिरा हो हीं जाता है
मेरे कमरे के बाहर डाक्टर किसी को समझा रहे थे
कुछ देर बाद-
-विभा, भैया को माफ कर देना
-माफ किया.... लेकिन मुझे समझ नहीं रहा कि वह ऎसा क्यों कह रहा था... वो अपंग वाली बातेंमुझसे तोउसकी बात भी नहीं हुई थीएक्सीडेंट वाले दिन वो मेरे घर आया थामेरे छोटे भाई से कुछ पूछा, फिर जानेक्या-क्या ऊलूल-जूलूल बोल कर वहाँ से चल दिया
-क्या बातें हुई थीं?
-अरे मेरे घर में मेरी बहन की बैसाखी पड़ी थीउसी के बारे में कुछ पूछ रहा था
-विभावरी दीदी की?
-हाँ! तुम्हें पता तो है हीं कि दो साल पहले उसने ऎसे हीं एक एक्सीडेंट में अपना एक पाँव गँवा दिया था
-हाँ, पता है
-अब इस बात से नाराजगी! मुझे तो कुछ समझ नहीं रहा
-लेकिन मैं समझ गईदर-असल भैया ने उस बैसाखी को तुम्हारा समझावो तुम्हें पसंद करता है नातुमसेकहता नहीं अलग बात हैशायद इसी वज़ह....
-पसंद वाली बात अपनी जगह है। (उसके भाव में किसी भी तरह का बदलाव, हीं आवाज में किसी तरह कीउतार-चढाव महसूस हुई।) लेकिन बैसाखी की बात से नाराजगी.... यह तो कोई बात नहीं हुई ना! बैसाखी मेरी दीदीकी हैवो पहले भी मेरी दीदी थी और पैर गंवाने के बाद भी मेरी दीदी हीं हैमैं उनकी अब भी उतनी हीं इज़्ज़तकरती हूँ , जितना पहले करती थी, उतना हीं प्यार भीशरीर का एक हिस्सा कम होने या होने से इंसान काअस्तित्व नहीं मिटतावह यथावत रहता हैतुम्हारे भाई ने मेरा नहीं,मेरी दीदी का अपमान किया है.....
- मानती हूँलेकिन.....
- लेकिन क्या? तुम मानती हो ना कि तुम्हारे भैया ने गलती की है
-हाँ!
-अगर तुम्हारा भैया भी यह मानता तो......

मैं सब सुन रहा था और अंदर हीं अंदर घुटा जा रहा थाआगे की बातें सुन सकूँ, मुझमें इतनी हिम्मत थीमैंखुद में डूबता चला गया

*******************

-विभा , जानता हूँ कि मुझे तुमसे कुछ भी कहने का कोई हक नहीं है, फिर भी तुमसे एक आग्रह करना चाहता हूँ
-अगर कहने को कुछ बचा है तो नि:संकोच कहो। - उसके इस जवाब में पहले वाली चंचलता थी, बल्कि एकअकाट्य शिथिलता थी
-मैने तुम्हारा दिल दुखाया हैअनजाने में तुम्हारी बहन का अपमान किया है, तो देखो... इसकी सज़ा मुझे मिलगई हैअब मैं जान गया हूँ कि इंसान अपने शरीर के बाहरी हिस्सों से नहीं , बल्कि अंदरूनी हिस्से-अपनी रूह- सेबनता है
-काश , पहले जान लेतेअच्छा छोड़ो, गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदायह बताओ कि अब कैसे हो? तबियतकैसी है?
- तबियत नासाज़ है, इसलिए तो तुम्हारे दर पर हूँमुझे जो भी कहना है कह लेने दो, रोको नहीं
-ठीक हैकहो!
- मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में मुझ-जैसे कई लोग हैं, जो एक अपंग को सहारे का मुहताज समझते हैंइसलिएउनसे प्रेम, दोस्ती ,शादी से कतराते हैंमैने यह गलती की थीअब मैं इसका प्रायश्चित करना चाहता हूँतुम मेरासाथ दोगी? बोलो!
- मैं .... मैं क्या कर सकती हूँ?
-तुम हीं सब कुछ कर सकती होमैं तुम्हारी बहन विभावरी से शादी करना चाहता हूँ
-विश्व!
-हाँ विभा! दूसरे के भरोसे जीने से अच्छा है खुद का भरोसा बनोना
-लेकिन तुम दोनों हीं तो....
- अब तुम तो ना कहोतुम्हारी हीं बातों से खुद को जान पाया हूँवैसे भी जिंदगी को चलने के लिए दो हीं पाँवचाहिएहम दोनों का एक-एक पाँव जिंदगी को अपंग नहीं बनने देगा, अपाहिज नहीं होने देगा
- विश्व , तुम क्या थे, क्या हो गये?
- अच्छा हीं हुआ हूँहाँ सुनो, उससे भी तो पूछ लोबस मेरे कहने से शादी थोड़े हीं हो जाएगी
- पूछती हूँ
-दीदी....दीदी.....
-दीदी की हाँ है जीजाजी। -उसका लहजा मजाकिया हो चला था

**********************

उस रात फिर से वही स्वप्न...
सुहागरात के लिए सेज सजी हुई हैविभावर घूँघट में बैठी हैमैं कमरे में प्रवेश करता हूँ
-यह हमारी पहली रात हैआज हम एक-दूसरे को जान लें, पहचान लें
-सुनो, मैं तुम्हारे हाथ-पाँव देखना चाहता हूँ
उसने अपना पाँव उतारकर रख दिया
-यह लो मेरा भी। - मैने हँसते हुए कहा
हमदोनों आसमान की ओर देख रहे हैंजिंदगी हमारे पैरों से चलकर हमारी ओर रही है

सुबह उठा तो माँ ने कहा कि मैं रात भर नींद में मंद-मंद मुस्कुरा रहा था

-विश्व दीपक 'तन्हा'


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10 कहानीप्रेमियों का कहना है :

Alpana Verma का कहना है कि -

''नायक का यह स्वीकार करना कि 'इंसान अपने शरीर के बाहरी हिस्सों से नहीं , बल्कि अंदरूनी हिस्से-अपनी रूह- सेबनाता है।'
कहानी का मकसद पूरा करती है.
दिल को छू लेने वाली कहानी है.सरल शब्द और वाक्य रचना के कारण आसानी से दिल दिमाग में उतर रही है.
कहानी में कही गयी विकलांगों के दिल की बात ''इस दुनिया में मुझ-जैसे कई लोग हैं, जो एक अपंग को सहारे का मुहताज समझते हैं।' पुरानी मगर आज भी सामायिक और सच्ची है.

sahil का कहना है कि -

तन्हा जी बहुत अच्छे, बहुत ही सटीक कहानी लिखी है आपने,
एक सच्ची और दिल को छू लेने वाली कहानी
बहुत बहुत साधुवाद
नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित
आलोक सिंह "साहिल"

mahashakti का कहना है कि -

कहानी पढ़ने का असली मजा आनलाईन नही मिल पाता है आपकी कहानी को प्रिन्‍ट कर लिया है, जल्‍द ही पढ़ना होगा।

रंजू का कहना है कि -

बहुत सुंदर कहानी लिखी है आपने .दीपक जी ..भाव सुंदर है और शब्द सरल ..बाँध के रखती है यह कहानी आखिर तक ..
बधाई सुंदर कहानी के लिए !!

amrendra kumar का कहना है कि -

Aadarniy Tanha Jee,
Sader Pranaam
Aapki Kahani padhi. Dil khush ho gaya. Bus ek shikayat rah gayi hai aapse. Aapne aagaz damdar nahin kiya.
Pehle sapne ko thik se nahin bun sake, isliye kahin kahin jeewantta ki kami lagi. Mera matlab in panktiyon se hai...
"लड़की परंपरागत भेष-भूषा में चाय-बिस्कुट के साथ हाज़िर होती है । ...साड़ी संभालते हुए हलकी-सी मुस्कान के साथ बैठ जाती है।"
Pehale sapne ko agar dynamic rakhte arthat actions ke language men likhte to shayad jyada achha hota.

Ab vishesh kya likhoon. Agge aapki aisi hin drishti hum padakganon par bani rahe yahi humari kamna hai.

Yours
amru 420

A Silent Lover का कहना है कि -

nice one VD. Ek bahut hi sensitive topic par likha hai aap ne. And the whole thing is very well presented.

Good Work !

BiDvI का कहना है कि -

बहुत सुंदर कहानी लिखी है आपने तन्हा जी
बाँध के रखती है यह कहानी आखिर तक
एक सच्ची और दिल को छू लेने वाली कहानी
सरल शब्द और वाक्य रचना के कारण आसानी से दिल दिमाग में उतर रही है.

इंसान अपने शरीर के बाहरी हिस्सों से नहीं , बल्कि अंदरूनी हिस्से-अपनी रूह- सेबनाता है।

इस दुनिया में मुझ-जैसे कई लोग हैं, जो एक अपंग को सहारे का मुहताज समझते हैं।

dictator का कहना है कि -

vishwadeepak tanha bhai ki rachna padhi .katha ki aatma atishay samvedansheel hai.aajkal bhagdaur wale jeewan me ( visheshtah comp science me hokar katha lekhan ke liye time nikalna ) in samwedna ke sahityakash me vyomvihar karna aasan nahi.
fir bhi in samvedansheel vishayon per likhna aur utne hi sunder andaz me prastut karna bahut hi prashanshaneeya kaarya hai .wastutah BDVAI iske liye sadhuwaad ke patra hain.aane wale dinon me mai vishwadeepak bhai ko aashwast karna chahunga ki ab wo din thodee hi door hai jab apangata koi abhishap rah payega .aaj ke tatkshanik aanand ki chah ,bhog aur lipsa ke yug me mai sabon ka aahwan karta hun ki apne ander jad ho chuki chetana aur samvedana ko pighalakar apne himalaya roopee hridaystahl se pawan GANGA ko nikalne den. aur yeh GANGA nav manaw sabhyata ka srijan kare jisme kahin bhi manasik apangata na ho waran jisse aatmik satta ka aadhipatya sthapit ho sake.
mai ALPANA VERMA se bhi aksharshah sahmat hun .aur marender ji kee to baat hi niralee hai.mujhe to amrender ji me katha ka patra nazar aaya ..........vishwa bhai se aagrah hai ki wo apnee kath ayatra ki gati ko kabhi shithil na hone den waran poorn utsah aur umang se lage rahe .. samaj nirman me aise prayas ki mahatee awashyakata hai ..hum aashanwit hi nahi waran poornatah wishwast hain ki a vishwa bhai is abhiyan me humesha humesha humlogon ke liye pathpradarshn karte rahenge.......likhne ko to bahut khyal man me tarangayit ho rahe hain kintu jitna bhi lika jaye wo "hari anant hari katha ananta ki bhanti " prateet ho raha hai .. atah yahi apne is tathakathit pralap ko band karta hun......!!!
(ajitsingh007iitkgp@gmail.com)

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

जब जब नायक सपने देखता है तो कहानीकार के प्रस्तुतिकरण को दाद देने को जी चाहता है।
कथ्य हल्का सा पुराना है, लेकिन विश्वदीपक भाई, तुमने यह कहीं भी महसूस नहीं होने दिया। पूरी कहानी रोचक है और और मैं इस विषय पर कई कहानी पढ़ चुका हूं, फिर भी अंत का अनुमान नहीं लगा पाया। यही तुम्हारी सफलता है।

हँसने के लिए क्या..... गालों को आपरेशन से सजाया है ?

- आज हम एक-दुसरे को अच्छी तरह से जान ले, पहचान ले। सुनो, मैं तुम्हारे हाथ- पाँव देखना चाहता हूँ। ( यहमैं क्या बोल रह हूँ ! ) - लो देखो । - यह कहकर उसने अपने हाथ- पाँव शरीर से उतारकर धर दिए।

एक झटके से पैरों से आवाज आती है- हाँ, हम असली नहीं है।- यह कहकर दोनों पैर बाहर निकल आते हैं।
मैं कुछ भी समझ नहीं पाता। पल में हीं दोनों पैर लोहे के तार बनकर मेरी आँखों में चुभने लगते हैं। विभा ओझलहोती जाती है..........

-सुनो, कह देना कि कुहासे छट गए हैं। मुझे रास्ता दीख गया है। मंजिल ..... मेरी मंजिल.... वो । छोड़ो, इतना हींकह देना वो समझ जाएगी। - यह कहकर मैं वहाँ से चल दिया।

उसने अपना पाँव उतारकर रख दिया।
-यह लो मेरा भी। - मैने हँसते हुए कहा।
हमदोनों आसमान की ओर देख रहे हैं। जिंदगी हमारे पैरों से चलकर हमारी ओर आ रही है।

पिछली कहानियों से तुम्हारे बढ़ते कदमों को देखते हुए मैं यह सोच रहा हूं कि अगली कहानी कैसी होगी... :)
बधाई।

samir का कहना है कि -

helllo mr. tanha... nice story maharaj apang ke baaare mein sochne ko vivas kar diya aapne...sahi mein aadmi apne sarir ke androoni hisse rooh se banta hai...

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