Wednesday, September 26, 2007

ज़िन्दा हो गया है...




काँव-काँव-काँव, कौवा झोपडी के छप्पर पर चीख सा रहा था। अब जोखन की खोली में तो कोई मुण्डेर ही नहीं थी जो मेहमान के आने का खतरा हो, और भीतर चूल्हें की राख को बुझे चार दिन से उपर हो गया था। उंह!, जोखन ने करकशता से तंग आकर करवट बदली। काँव-काँव-काँव, कान में पिघला शीशा गर्म का गर्म समा गया। हत!! जोखन ने कौवे को हकालते हुए झल्लाहट मे चीखना चाहा। आवाज़ उसके ही कानो तक शायद पहुची हो। अकड़ता सा वह उठ बैठा। खाट में चरमराहट हुई, जोखन कुछ और संभल कर बैठा।...।फिर सारे बदन को हल्का छोड, घुटनों को दोनों हाथों से दबा, लडखडाता खडा हुआ। बदन सुन्न सा लग रहा था। कौआ उड चुका था। गाँव मुर्दाघर प्रतीत होता था। घुप सन्नाटा। बेचैन हो उठा जोखन.....खोली के बाहर कडी धूप थी। बेहद उजाड सा दीखता उसका गांव और वीराना। उसे सन्नाटे से घुटन होने लगी। दीवारों के पास कान होते है जुबान तो नहीं कि.... चलो कान तो होते है। अपना दर्द उन दीवारों को सुना हल्का हो लेना चाहता है जोखन, पर उसकी ज़ुबान....पानी...पानी....। जोखन के सूखे होठों में बुदबुदाहट उठी और एक पल में उसकी निगाह सारे कमरे में घूम गई। आल्युमीनियम की एक काला सा पतीला ढ़का हुआ....जोखन ये जानता है कि एक बून्द पानी नहीं, फिर भी घूंट भर या बस जीभ भर.....नहीं, बूंद भी नहीं। काले चहरे पर जाने कौन से भाव उभरे, उसने पतीला हाथों में उठाया और खोली के बाहर आ गया।

“भूख” सिर्फ मार्क्स का चिंतन ही तो नहीं। रोटी जोखन खुद उगाता है फिर भी भूखा क्यों है? क्या हुआ उसकी फसल का, उसके रोज के पसीने की कीमत अठठाईस रुपये पैतीस पैसे तो आकी गई थी फिर? आज उसके पेट की हजारों अंतडिया आपस में गत्थम-गुत्था क्यों हों रही है? जोखन सोचना नहीं जानता। सचमुच वह सोचना नहीं जानता। जिंदगी के प्रति उसका नजरिया कुछ भी तो नहीं? हाल ही में घरवाली की पेचिस से मौत हुई थी। छोटा, दो माह हुए, चल बसा। दिन भर तो अच्छा भला खेलता रहा था। दोपहर को जानें क्या खा लिया उसने, कै...दस्त। शाम तक शरीर में पानी न बचा था। जोखन डाक्टर को ढूढ़ता घूमता रहा। डाक्टर साहब सुबह के सोये थे और जब जब जोखन गया, सोते मिले। छोटा शाम को एक ही शब्द बुदबुदा सका – पानी!!!, जोखन सिरहने ही उनींदा पड़ा था, दौडा हैंड़पम्प की ओर। हाँफते हाँफते उसने हैंड पंप की हैंडिल थामी और पतीली नीचे रख पूरी ताकत से हैंडिल ओंठनें लगा, एक दो.. तीन..दस..पंद्रह.. हफ.. हफ..पानी नहीं था। पानी तो कहीं नहीं था गांव में। ताल सूखे, कूप सूखे गंदा पानी भी...अठठारह..उन्नीस..हफ हफ..महीने भर सें हैंडपम्प सूखा था लेकिन उम्मीद कैसे सूख जाती?....थक कर चूर हो गया वह और अब उम्मीद भी थकने लगी थी। छोटा उसका बहुत लाडला था। बदहवास, भागता हुआ घर पहुँचा। छोटा एक बार फिर बुदबुदाया..पानी!! और चुप हो गया बिलकुल चुप..।

जोखन घरवाली को तो अब याद नहीं करता। कभी कभी जब छोटे की याद करता भी है तो उसकी चंद नादानियों को याद कर मुस्करा भर लेता है। फिर उदास हो जाता है, कुछ पल बाद फिर पूर्ववत। हाँ!! बडे की उसे बेहद चिंता है। वह चाहता तो है कि उसे पढाये, लिखायें। उसने सुन रखा है कि पढ लिख कर साहब बनते हैं, पर कैसे पढाये? गांव में कोई स्कूल नहीं है, हाँ एक मास्टर जी है, पर वो पढाते वढाते तो नहीं। लाखी बता रही थी कि ठेकेदार के बेटे को शाम को पढाने जाते हैं। वहाँ साहब लोगों के लड़के भी आते है। जोखन का लड़का उनके साथ कैसे पढ सकता है? आखिर वो नीच बिरादरी का ठहरा। जोखन, ऊँच और नीच का अंतर जानता है, लेकिन उसे यह नहीं पता कि वो ऊचे लोग जिन्हे उसकी छुवन से भी घिन है उसी का उगाया अन्न कैसे खाते हैं? बहुत नादान है जोखन।

जोखन आहिस्ता आहिस्ता सरपंच के घर की तरफ बढने लगा। सामने ही मैदान में सरकारी दलिया बंट रहा था। जोखन नें बडे को ढूंढने की जहमत नहीं उठाई। वह जानता था कि बडा यहीं होगा। लम्बी कतार थी भूखों की, नंगो की। जोखन भी कतार में घुस पडा। ऊँट के मुंह में जीरा, कहावत तो है किंतु ऊंट अगर भूखा हो, और मुंह में जीरा भी पडे तो कहावत निरर्थक हो जायेगी। चार दिन ,पांच दिन, सात सात दिन के भूखे प्यासे, मरियल औरतें, बूढे, बच्चे और जवान भी। दलिया क्या था, यदा कदा पीला सा कुछ दिख पडता था, पर जब सरकार कह रही कि सूखा राहत में वह दलिया बाँट रही है। जब प्रेस लिख रहा है कि दलिया बाँटा गया तो हमें मान लेनें में क्या है। दलिया नहीं भी है तो पानी तो है और लोग भूखे ही नहीं प्यासे भी है...।

ले तू भी ले सामल के बर्तन पर कलछुल से दलिया टपकाते हुए बाँट रहे आदमी ने कहा, और आगे बढ़ने को हुआ। "थोडा सा और साब गिडगिडाने लगा सामल, पर कर्मचारी के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया न थी।

“साब् मेरी माँ मर जायेगी। बीमार घर में पडी है साब्, रुआँसा सा सामल घिघिया उठा”।

“तू भी मर” सरकारी कार्यवाही का निरीक्षण करते हुए सरपंच नें चुप कराने के लिये झिड़क दिया।

“साब, थोडा...” अपने स्वाभिमान को ताक में रख सामल ने एक बार कातर हो कर सरपंच को देखा, फिर चुप हो गया।

दलिया जोखन के पात्र में भी आया, उसने गट गट, एसे निगल लिया जैसें वह...जैसे नहीं सचमुच ही वह चार दिनों का भूखा था। अचानक एक जीप वहां आकर रुकी धडधडाते हुए चार पांच आदमी वहां उतरे । कैमरे लटकाये और डायरियां पकडे ये आदमी पेड की छाँह मे जा खडे हो गये और डायरी मे कुछ लिखने लगे। जोखन दलिया खा चुका था, उसकी जान में अब कुछ जान थी। सरपंच ने शरबत उन तक भिजवाई...वे प्रेस वाले थे। जोखन ने एक बार कस कर प्यास फिर अनुभव की। कुछ फोटोग्राफ लिये गये, कुछ डायरियों मे लिखा, सरपंच से कुछ बातचीत की, फिर सब चले गये ।


-------------------------------------------------------------------------
सामल नहीं रोया। उसकी मां निश्चेष्ट पड़ी थी, गहरी नींद में। सामल नें एक बार मां की लाश की ओर देखा, चेहरे पर कोई भाव नही थे। आँखो में पीडा भी नहीं, पर कुछ डर सा....आज ही गांव में एक मौत और हुई थी। क्लिक, कैमरे का फ्लेश चमका और ये तस्वीर कैमरे मे कैद हो गई। अखबार के तीसरे पृष्ठ पर छ्पी और बहुत ही साधारण तरीके से छ्पी इस तस्वीर पर अचानक गौर किया मिस्टर शर्मा नें। जबसे अपोजिशन में आये हैं, आज कल, इन्ही सब खबरों पर ज्यादा गौर करते हैं। देखते ही देखते ये खबर अखबर के पहले पृष्ठ पर आ गई। विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान मुख्यमंत्री को आया पसीना देख कर उनके चमचो को घबराहट हुई और रातों रात गांव की और कई जीप रवाना हुईं। शर्मां जी ने कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं। आखिर सरकार की छवि पर कालिख पोतने का ये मौका हाथों से क्यों जाय? उनके चेहरे पर मगरमच्छ के आँसू कहीं से अचानक आ गये जिन्हें सहेजे सहेजे उन्होंने सारे जिले का दौरा किया। एक एक को बुलाकर आपने आसूँ दिखाये। अपने चुनाव क्षेत्र में तो वे फूट फूट कर रो पडे। अकाल पीडितों के लिये अपनी व्यक्तिगत संवेदना, पत्रकारों को प्रदर्शित करते हुए उन्होनें कहा कि वे भूखी आत्माओं की शांति के लिये दो दिन उपवास रहेंगे। शर्मा जी तो छुपे रुस्तम निकले, पर मुख्यमंत्री जी की कुर्सी पर अचानक काटें उग आये। मुख्यमंत्री जी को काटों से बेहद कष्ट का अनुभव हुआ तो उन्होने राम नाम लेकर शुभ मुहूर्त में अपनें ज्योतिषी को बुलवाया। ज्योतिषी परम ज्ञानी, महाविद्वान था। उसनें सलाह दी कि “मंत्रीवर, एक ही मार्ग शेष है। अखबार में छपवा दीजिए भूख से कोई मरा ही नही। हमारे राज्य में लोग महीनों राम के नाम पर उपवास रह लेते हैं, जब भूख लगती है तो तुलसीदास रचित रामचरितमानस का पाठ करते हैं। एक पंथ दो काज। जनता की नजरों से शर्मा जी के सितारे ओझल और...”।...।“श!!श्!!’’ मुख्यमंत्री नें ज्योतिषी के मुख पर हड़बडा कर हाथ रखा और मेज के नीचे से दक्षिणा खिसका दी।

ट्रिंग..ट्रिंग, कलेक्टर साहब के शयन कक्ष में रात के बारह बजे फोन की घंटी बजी। फिर क्या था, कलेक्टर साहब की नींद हराम। दूसरे दिन सुबह हुई। शर्मा जी नें अखबार उठाया तो दंग रह गये। पासा इस तरह पलट जायेगा उम्मीद न थी। आठ दस फोन तो नाश्ता करते करते निपटाये और भोजन के तुरंत बाद विपक्षी दलों का एक शिष्ट-मंड़ल गांव की हालत कें निरीक्षण के लिए पहुंचा। एक एक हैंडपंप शर्मा जी नें देख डाले। पानी पीने को तो क्या नहाने तक को पर्याप्त था। शर्मा जी दंग। अचानक वाटर लेवल इतना उठ गया कि....शर्मा जी के सिर मे दर्द होने लगा। तुरंत उनके डाक्टर, जो साथ ही आये थे ने गोली दी। अब हैंड़पंप का पानी जाने कैसा हो। कार से वाटर-बोटल लिये तुरंत एक चमचा दौडा आया। शर्म जी निराश लौटे, रास्ते भर कुछ सोचते रहे। अचानक उनकी आँखें चमक उठीं। भूख से मौत हुई तो है। फ्लां फ्लां अखबार में तो मृतक की तस्वीर भी है।...और एक बार फिर शर्मा जी के इस अचूक अस्त्र ने विधान सभा मे भूकंप ला दिया। जैसे छ्त की दीवारें टूट टूट कर मुख्यमंत्री के सिर पर गिरने लगीं। कलेक्टर साहब भी चुप कहाँ बैठे थे। अकाल की गहन समस्या पर अपनी पत्नी से उन्होंने विस्तार से चर्चा की। माननीया कलेक्टरानी साहिबा ने जिग्यासावश पूछा कि “जब खानें का अनाज नहीं मिलता तो लोग डवल रोटी क्यों नही खाते?”। डायलाग घिसा पिटा था, पर जब इंग्लैण्ड की महारानी ये कह सकती थीं तो आखिर माननीया भी हिन्दुस्तान के एक जिले के कलेक्टर की पत्नी थी। पानी की समस्या पर वे अत्यंत गंभीर होकर बोलीं कि इस विषय में प्रशासन को कठोर कदम उठाने चाहिये। आज घर में भी एक घंटा पानी कम आया। बाथिंगटब पूरा भरा भी नहीं।

कलेक्टर साहब शनिवार की हिन्दी टेलीफिल्म देखने के मूड में थे पर कम्बख्त दौरा निकल आया, वो भी अकाल पीडित क्षेत्र का। बाढ पीडित इलाका होता तो एक बार दौरे का मजा भी आता। हेलीकाप्टर में कभी कभी तो विजिट मिलती है। कलेक्टर साहब दौरे पर बस निकल ही रहे थे कि मुख्यमंत्री का फिर फोन आ गया। मुख्यमंत्री जी की सख्त हिदायत थी कि गाँव में कोई मरा नहीं होना चाहिये। अगर मर गया हो तो भी नहीं, ये सरकारी आदेश है।



---------------------------------------------------------------------------
“हो! व्हाट आर दे डूईंग?’’ कलेक्टर साहब ने अपनी वातानुकूलित कार से अचानक बाहर का दृश्य देख कर, चौक कर कहा। किसी पेड पर बहुत से नंगे-अधनंगे बच्चे चढ़े कुछ तोड़ तोड़ कर खा रहे थे। खाने के लिये तो है फिर भी भूख-भूख का हल्ला मचाते है। फूल्स, जंगली!!। हमारी गवर्नमेंट इनके लिये क्या नही करती, एण्ड सी दीज़ पीपुल। दे डोण्ट वांट टू डू वर्क। सेक्रेटरी को आधी हिन्दी समझ में नही आई, फिर भी बेवकूफ कैसे बना रह सकता था। जोर से बोला- जी साहब।...। कलेक्टर साहब की गाडी रुकी। कार से उतरे तो धूप से आंखे चौंधियाने लगीं। जेब से उन्होनें काला चश्मा निकाल, आखों में लगा लिया। गाँव सरकारी दलिया खा चुका था। जिन्हें नहीं मिला वो कल का इंतजार करने में लगे थे। जिन्हें मिला, भूख उनकी मिटी तो थी नहीं फिर नींद कहा आती? लोग घरों से बाहर झाँक झाँक कर कलेक्टर साहब को देख रहे थे।

“इस गाँव में भूख से मौतें हुई हैं?” क्लेक्टर ने सरपंच से पूछा।

“नहीं सर, एक बुढिया मरी थी और एक डोकरा”

“डैम दीज प्रेस रिपोर्टर्स, सच्चाई तो कभी छपते ही नहीं। सूखे से निपटनें के लिये आखिर क्या नहीं किया गवर्नमेंट नें....पर छ्पेगे भूख से मौत”। कलेक्टर साहब ने ओठों में जाने क्या बुदबुदा कर कडुवा सा मुँह बनाया। पास ही भीड में कलेक्टर की बातें सुन रहा सामल भीतर-भीतर खौल रहा था

“मेरी मां मरी है साहब...” सामल धीरे से बोला।

“तुम्हारी मां मरी है, भूख से?....कैसे?” कलेक्टर् की भौहें ललाट पर जा चढीं।
“साब! घर में खाने को नहीं है तो मरेंगे नहीं?”

“खाना नहीं है?” कलेक्टर साहब सोच में पड गये। कलेक्टर को सोच में पडा देख कर उनके बुद्धिमान सेक्रेटरी नें कान में कुछ कहा। फिर क्या था। दो सिपाहियों, चमचों और सरपंच के साथ खुद कलेक्टर साहब एक खोली में जा घुसे। जोखन हडबडा कर उठ बैठा।
“देखो अच्छे से देखो, घर में खाने के लिये क्या क्या रखा है” कलेक्टर ने आदेश दिया। सिपाहियों नें अपनी मुस्तैदी दिखायी। एक एक बर्तन, टोकनी, हंडी यहाँ तक कि खाट के उपर नीचे भी झाँक कर देख लिया।

“कुछ नहीं है साब” एक सिपाही नें रिपोर्ट दी।

“तुम्हारे घर में कौन मरा है भूख से?” आश्चर्यचकित कलेक्टर नें बडी बडी आँखें मटकायीं।

जोखन अब तक चुप खडा था। फटी फटी आँखों से देख रहा था सब कुछ, और सोच रहा था। हाँ, जोखन सोच रहा था।

“मैं मरा हूँ कलेक्टर साहब!!” उसकी आँखों में अंगारे तैरने लगे थे। ये सारा गाँव मर गया है।.......।

...पर दूर खडा मैं देख रहा हूँ कि जोखन ज़िन्दा हो गया है। गाँव अब मुर्दा नहीं रहेगा।


*** राजीव रंजन प्रसाद

7.06.1993

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

18 कहानीप्रेमियों का कहना है :

श्रवण सिंह का कहना है कि -

राजीव जी,
एक और वास्तविक चित्रण के लिए बधाई!
कथानक को इतने सशक्तता से आपने सजाया है कि मन खुश हो गया। एक-दूसरे से जुड़े सारे मुद्दे, सारे के सारे सम्बन्धित पात्र- सब के सब आ गए हैं इस कहानी मे। सामल और जोखन के रूप मे पुराने ’कफन’ के दोनो बाप-बेटो का ये नया रूपान्तरण बहुत भाया। आखिर कोई कब तक सहेगा?
भूख या तो लाचारी लाती है,बेगैरत लाती है या फिर सब कुछ मिटा देने की प्रवृति का जन्म देती है;
और आपने सारे भावो को यहाँ ला खड़ा किया- वो भी सशरीर।
एक बात और....थोड़ी सूक्ष्म सी है,मगर आपसे कैसे छूट गई,थोड़ा समझना मुश्किल हो रहा है। सामल और जोखन तो भुक्तभोगी हैं,कुछ ना कुछ प्रतिक्रिया तो दिखायेंगे ही.... चलिए उन्हे हम व्यवस्था के विरूद्ध खड़ा कर दिए देते हैं। एक बात तलबगौर है कि गाँववालो की ओर से आप पूरी कहानी मे तटस्थ रहे, अपने किसी शब्द को जाया नही किया, पर अंत मे निष्कर्ष मे आपने पूरे गाँव को समेट लिया!... आप शायद मेरी बात समझ गए होंगे।
एक और पाप आपने फिर से कर दिया है!
हा !हा !हा!
हँसने के अलावा मै और कुछ नही कर सकता।
कहानी मे ’राम’ शब्द का उपयोग हो गया है!
मेरी करबद्ध प्रार्थना एक बार फिर से है( वैसे इससे कोई फर्क तो पड़ता नही,फिर भी धर्म निभाए दे रहा हूँ।)
सस्नेह,
श्रवण

ऋषिकेश खोङके "रुह" का कहना है कि -

राजीव जी ,
वास्तविक चित्रण मन को मोह लेने वाला है और पाठक को विचारों के समन्दर मे डुबा देता है , आज भी जब हम विकास की बातें करते हैं तो कहीं न कहीं ये त्रासदियाँ मन को कचोटती है और २१वी सदी मे हमे जाने से रोक लेती है |
इस कथा का सार्थकता शब्दों की मोहताज नही है और आप इस बात के लिये बधाई के पात्र है की इस प्रकार का लेखन आप की कलम से जन्मता है |

yogesh samdarshi का कहना है कि -

बहुत सुंदर कहानी है.. स्तब्ध कर देने वाली.. आपको बधाई.

रंजू का कहना है कि -

आपके लिखे सच दिल को हिला देने वाले होते हैं
कल से कोशिश कर रहीं हूँ इस को पढने की समझने की
बहुत कठोर सत्य लिखा है आपने इस कहानी में
कहीं हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं पर कुछ समस्याएँ अभी भी जस की तस है ...
नमन आपको इस कहानी के लिए !!

shobha का कहना है कि -

राजीव जी
बहुत ही सुन्दर यथार्थ वादी धरातल लिए कथा लिखी है आपने । आपके लेखन की यह बड़ी विशेषता है कि आप
अपने समय और समाज की यथार्थ छवि उपस्थित के देते हैं । पढ़कर रसानुभूति तो होती ही है एक नई सोच
भी मिलती है । आपको हार्दिक बधाई ।

Gita pandit का कहना है कि -

राजीव जी,

एक और वास्तविक चित्रण ....
एक और बहुत सुंदर कहानी....


बधाई.

praveen pandit का कहना है कि -

राजीव जी!
आपकी क़लम ने एक और सच को प्रत्यक्षकर दिया,उसके यथार्थ रूप मे -नंगा।
'रोटी जोखन खुद उगाता है फिर भी भूखा क्यों है? '
'उसे यह नहीं पता कि वो ऊचे लोग जिन्हे उसकी छुवन से भी घिन है उसी का उगाया अन्न कैसे खाते हैं?'
जोखन के सभी प्रश्न बेचैन करते हैं।इसी बेचैनी का दूसरा नाम बधाई भी है।स्वीकार करें

प्रवीण पंडित

RAVI KANT का कहना है कि -

राजीव जी,
आपने तथाकथित विकास की कलई खोल दी इस कहानी के माध्यम से। सामल और जोखन के सहारे कटु यथार्थ का चित्रण जीवंत बन पड़ा है। बधाई।

अजय यादव का कहना है कि -

राजीव जी!
कहानी के शिल्प आदि के बारे में कहना मेरे लिये खासा मुश्किल कार्य रहा है. इसलिये आपकी इस कहानी की विशेषतायें या खामियाँ गिनाना संभव नहीं है. हाँ, आपकी कहानी मुझे बहुत पसंद आयी.
आभार!

supriya का कहना है कि -

Rajiv ji aap ki kahani bahut marmaspersi thi bahut achai thi asa hi likta raha.

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

मित्र राजीव जी

बहुत ही सामयिक विषय पर आपने इस कहानी के माध्यम से पाठक का ध्यानाकर्षण किया है. गांव-गांव में चल रहे तथाकथित सरकारी सहायता कार्यक्रमों की कलई खोलती हुयी कहानी में कई शैली-गत विशिष्टतायें हैं. ग्रामीण परिवेश का वर्णन तथा चरित्रों के संवाद में आपने बहुत अच्छा संतुलन रखा है.

अस्तु कहानी का जहां पर आपने अंत किया है मुझे वहां से वास्तविक कथा का प्रारम्भ लगता है. कुल मिलाकर अंतिम वाक्य अपने आप में एक पूरी कहानी की भूमिका का संदेश देता है.
शुभकामनायें


श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

kammo का कहना है कि -

aapki kahani ne ander tak jhakjhor diya. he kya vastav me esa hota he.
hamare yaha ki rajniti ka ye hal ho gaya he.

दिवाकर मणि का कहना है कि -

राजीव जी !! चाहे रामसेतु पर लिखी आपकी कविता हो या गरीब जनता की नंगी सच्चाई का चित्रण करने वाली यह कहानी, दोनों अद्भुत हैं. आपकी लेखनी का पैनापन प्रशंसनीय है. एक सच्चा कवि/लेखक वही होता है जो समाज को अपनी रचनाओं में प्रतिबिम्बित करता है. आप अपने इस कर्तव्य को शत-प्रतिशत पूरा कर रहे हैं. धन्यवाद.....

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

श्रीकांत मिश्र 'कांत' जी ने बिलकुल ठीक कहा कि 'आपकी अंतिम लाइन ही पूरी कहानी है' ।
गाँवों में विकास कार्यों के नाम पर हो रहे अन्याय पर व्यंग्य करती आपकी यह कहानी व्यवस्था पर चोट करती है। शिल्पगत विशेषताएँ तो होती ही हैं। नये कथाकारों के लिए प्रेरणास्रोत हो सकती है।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

चाहे भूख का चित्रण हो, चाहे प्यास का, चाहे भ्रष्टाचार का और चाहे मौत का....
हर स्तर पर कहानी सफल रही है।
बहुत बधाई राजीव जी।

tanha kavi का कहना है कि -

राजीव जी,
आपकी कहानी समाज का सच बयां करती है। हम इस सच को विकास के चाहे कितने हीं खोखले और झूठे पर्दों से ढंक दें,यथार्थ चीत्कार करता हीं रहेगा। भूख, राजनीति और भ्रष्टाचार के कई सारे पहलूओं पर वार करने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

राजीव जी,
एक मार्मिक चित्रण है ..जब तक आत्मा सोई रहती है आदमी मरे बराबर ही होता है.......जिस दिन इस नींद से जाग जाये उसी दिन उसके लिये सवेरा है और सब वस्तुएं उपलब्ध भी.

Anonymous का कहना है कि -

You are a very smart person!

rH3uYcBX

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)