Wednesday, August 15, 2007

वो आदमी

"छोड़िए ,आप मुझे नहीं समझ पाऐंगे।...( फिर एक लम्बी साँस .... कुर्सी के हत्थों से उसके हाथ फिसल कर नीचे गिरने और आँखो मे शून्य घिर आने की एक साथ प्रक्रिया...)...मैं भी खुद को नही समझ पाया ।"- सामने बैठे शख्स के होठो की थिरकन मे लिपटी ये आखिरी आवाज मुझे मीलो दूर से आती लगी।मैने उठने का उपक्रम किया ,पर मीलो दूर से इस आदमी ने अंगुलियों की एक अजीब सी हरकत से मुझे रोक दिया और फिर शुरू हुआ वही सिलसिला .......।

ये पहली बार नही था कि मै उसके सामने बैठा इस स्थिति से गुजर रहा था। और अब तो दावे के साथ कह सकता हूँ ,कि ये आखिरी बार भी नही था। जब भी मै उसके पास जाता था, बातचीत कुछ यूँ मोड़ ले लेती और अंतिम पलों मे ऐसा ही दृश्य उभर आता। वो मीलो दूर से अपने कदम बढाता ,अपने कदमो को जाँचता-परखता मेरी ओर बढता आता और मै सामने वाली कुर्सी पर निर्विकार अपनी धैर्य परीक्षण करता रहता। उसे मुझसे कोई सरोकार नही था;शायद मै ना भी रहता, तो कोई फर्क नही पड़ता।..... कदम हमेशा उसी रफ्तार से बढते,किसी मुकाम पर थमते...पर एक जगह पर वो वापस जरूर मुड़ता था... और जिन्दगी का वो हिस्सा उसने हमेशा अपनी कहानी मे दुहराया था। जिस अदा से, जिन शब्दो के सहारे उसने अपनी कहानी बताई थी, वो मुझे जुबानी याद हो आई थी। शायद उसे भी नही मालूम हो,पर मै जानता था कि फलां हर्फ पे ओठ कितने खुलते हैं ,किस बात पर माथे पे तीन लकीरे उभर आती हैं और......।

वो आदमी था और आदमी नही भी था। दूर से देखने वाले को वो आदमी ही नजर आता- सामान्य कद,इकहरा बदन और शरीर की परिभाषा पूरी करने को जो जो चाहिए था, सब के सब मुकम्मल अपनी जगह जमा थे। आँखे वहीं नाक के उपर और ललाट के नीचे थी, नाक होठो के ऊपर और होठ ठुड्डी के ऊपर- सब गर्दन पे टिके सिर मे ही स्थित थे। ये और बात थी कि आँखे बुझी-बुझी थी,नाक थोड़ी झुकी थी,ठुड्डी थोड़ी निकली और होठो के दोनो सिरे पे अदृश्य सी लक्ष्मणरेखा। उसे इस लक्ष्मणरेखा के बारे मे पता नही था। पर महीनों मैने उसके होठो का जरा भी क्षैतिज फैलाव नही देखा,फिर सीता-सुरक्षा के इस विद्या के स्वामित्व की जानकारी उसे दी। उसे तो ब्रम्हास्त्र मिल गया और अब मेरे सामने मुस्कराने की भी कोशिश नही करता था ।

पर इस आदमी सा दिखने वाले जीव के नजदीक कोई भूल से भी पहुँच जाता,फिर मालूम होता था कि ये आदमी नही था। वो तो एक खुली किताब था ,जो गुजरी जिन्दगी के हर पलो को खुले पन्ने मे बिखेरे पड़ा था। पता नही भूत का भूत उस पर इस कदर छाया था कि आज की तस्वीरों मे भी वो कल की सूरत ढूँढता फिरता। जो कोई भी अपना लगता,उसे सारी कहानी सुना डालता। विषय कोइ भी हो,मसला कैसा भी हो, साहबान सारे वाकयात अपने उपर ढाल लेंगे और जैसे ही उनके ओठो से ये लफ्ज फिसलता कि "छोड़िए ,आप मुझे नहीं समझ पाऐंगे।",फिर आगे की बाकी सारी घटनाएँ मेरे आगे नाच जाती - एक लम्बी साँस... फिर कुर्सी पे टिका हाथ नीचे झूल जाएगा;उसी समय आँखो मे सूनापन पसर आएगा..बहुत दूर से एक आवाज आएगी-"मैं भी खुद को नही समझ पाया।"... मै उठने की कोशिश करूँगा, वो अंगुलियाँ धीरे-धीरे मुठ्ठी बाँधने की स्टाइल मे खींचेगा(मुझे रोकने की ये उसकी खास अदा थी।).. और प्रोजेक्टर पर पहली रील चढ जाएगी फिर से। उसके करीबी लोगो की ये बदनसीबी थी कि उसके रीलो की संख्या दिन-प्रतिदिन बढती जाती थी। इस बात पर फिर अफसोस होने लगता था कि ये वर्तमान फिसल कर अगले ही पल भूत क्यूँ बन जाता है।

शुरू-शुरू मे तो अजीब सा लगता था,जब मै यूँ घंटो बैठा उसकी रोज की वही बकवास सुनता रहता था। वो हर बार कुछ इस तरह से पुरानी बातो को दुहराता रहता, मानो एक नई दास्तां उसके जीवन मे गढी गई हो। प्रतिक्रिया-स्वरूप टोकता भी था मै बीच मे-"क्या ये पुरानी जिन्दगी से चिपके हुए हो।भविष्य के सुनहरे सपने देखो;सपने ना रास आते हो, तो वर्तमान की कठोर जमीन पे चलो।"एक बार यहाँ तक पूछ डाला था-"यार,आँखे तुम्हारी जड़ी तो सामने है,पर पीछे ही क्यूँ देखती है?"सुनकर सूनी आँखों से मुझे घूरा उसने(शुक्र था,उस क्षण वो आगे को ही देख रही थी)और फिर वही से शुरू हो गया,जिस शब्द पे उसने बात रोकी थी। धीरे-धीरे मै भी अपनी इन हरकतों की निरर्थकता समझ गया अब तटस्थ भाव से उसके सामने बैठा रहता हूँ। कहानी चलती रह्ती है ;रील पे रील चढती जाती है....और मै बीच मे फुर्सत निकाल जाने-पहचाने पात्रो को कोई और जामा पहनाने की सोंचता रहता हूँ।

सब के सब तो मेरे परिचित हैं,जान पहचान वाले बन गए हैं। मैं उसके मुहल्ले के उस अवारा,बदमाश लड़के को लाखो की भीड़ मे पहचान सकता हूँ,जिसने गुल्ली-डण्डे मे इसे सैंकड़ो बार पदाया था। बाल-मनोविञान की परख से वंचित उसके मास्टर को भी मैं पहचान सकता हूँ, जिसने होम-वर्क नही कर पाने के कारण इसे दिन भर धूप मे मुर्गा बनाए रखा था। जिस बॉस ने पहली बार देर से आने पर इसे डाँटा था,उसकी डाँट और दानवी चेहरा मै कभी भी जेहन मे ला सकता हूँ। वो बात-बात पर पीटने वाला बड़ा भाई,बगल मे रहने वाला इसकी बहन का आशिक,कॉलेज मे पढ़ने वाली दो चोटी वाली लड़की,इसकी मरगिल्ली पत्नी(सॉरी,अब दिवंगत हो गई है),दिन मे दो बार घर खाली करने की धमकी देने वाला मकान-मालिक और सारे ऐसे लोग,जो गलती से इसकी जिन्दगी का शरीके-इतिहास बनने आए(इतिहास की ऐसी मिट्टी पलीद होती है,जानता होता तो कोई अतीत को शब्दों का आकार ना देता)-सबको भली-भाँति जानता हूँ मै। कभी-कभी तो लगता है,जिसका भी जिक्र चल रहा होता है,वो आकर हम दोनो के बीच बैठ गया है और मुझसे दरख्वास्त कर रहा होता है कि उसकी नजरो से मै उसे देखूँ। पर मुझे तो कहानी से मतलब है,उसकी सच्चाई या सापेक्षता से नही।

आप कहेंगे कि ये तो सबकी जिन्दगी मे होते रहता हैं;फिर इसे क्यूँ अपने पास सहेजे रखना और रोज जम आए वक्त की धूल को साफ करते रहना। समझाया तो मैने भी यही था इसे,पर कोई फायदा नही हुआ। अपना पुराना राग उसने अलाप डाला-"छोड़िए ,आप मुझे नहीं समझ पाऐंगे।(एक लम्बा अंतराल,शरीर की कुछ हरकतें)शायद मैं भी खुद को नही समझ पाया!"सच कहता था वो,सचमुच मै उसे समझ नही पाया;मैने कोशिश भी नही की। वह जब अपने अतीत की गलियों मे खो जाया करता था,तब मै पूरा ध्यान सिर्फ इसमे टिका रहता कि ये वाली मैने कितनी बार सुन रखी है। वो समझता था कि मै उसके साथ हुमसफर बना चल रहा हूँ,सो कहानी मे उसे किसी नए मसाले भरने की जरूरत नही होती थी। नीरस,बेजान सा वो लफ्ज निकालता रहता और मै जाने कहाँ-कहाँ से उन रास्तों से भागता फिरता।

उसकी जिन्दगी मे आखिर समझने को आखिर रखा भी क्या था-दफ्तर के बाबू के घर मे,जहाँ महीने के बीस तारीख के बाद जीवन के निशान बस दो वक्त बिना सब्जी वाली रोटी हो,वहाँ अपने पाँच भाई-बहनो की छाया मे इसने बचपन गुजारा था। किसी तरह पढता रहा;एक सरकारी स्कूल जाता रहा। फिर ट्यूशन की बैशाखी ने कॉलेज का मुँह दिखा दिया। सालो बेरोजगारी के साथ हमबिस्तरी के बाद किसी तरह से उससे पीछा छूटा और अपनी टूटी खटिया पे वह एक प्राइवेट ऑफिस के बाबू का तमगा लगाए अकेला सोने लगा। फिर शादी हुई,बीबी की बीमारी और इलाज के खर्च ने कभी परिवार बढाने की इजाजत नही दी।... बीबी मर गई और फिर वो अकेला हो गया है। अब ऐसी जिन्दगी मे क्या खासियत हो सकती है,जिसकी गुत्थी मै सुलझाने की कोशिश करता। जटिलताएँ तो वहाँ आती है,जहाँ लोग आम छोटी-छोटी समस्याओं से उपर उठ गए हों;सब कुछ पास मे है,फिर भी अन्जानी सी अपरिभाषित कमी महसूस हुए जा रही है। जिसकी पूरी जिन्दगी मे कमी ही कमी हो,उसके बारे मे क्या दिमाग लगाना। खाली पेट खाना न मिले,तो जाहिर है भूख लगेगी,कमजोरी का अहसास होगा..हाँ,भरपेट लजीज खाने के बाद कोई भूख जगे,तब कोई खास बात है;तह मे जाने को वो वाला कीड़ा कुलबुलाए।

पर थी एक खासियत,जो इसे औरो से जुदा करता था। भूत को इसने अपने वजूद का हिस्सा बना लिया था,जिसके बिना इसे अपना अस्तित्व ही अधूरा लगता;जिसके जिक्र के बिना जिन्दगी इसे बेमानी लगती। वह अपने बीते कल के बिना रह नही सकता था और अतीत उसे वर्तमान और भविष्य की तरफ देखने की फुरसत नही देता था। हाँ,बस इतना ही समझ पाया था उसे...वो भी,क्यूँकि सिर्फ यही खासियत उसमे मुझे दिखी थी। सच बताऊँ,वक्त का इतना अच्छा इस्तेमाल मैने किसी और को करते नही देखा। वक्त घड़ियों की सूई की टिक-टिक मे बँधा रहता था और ये दोनो हाथो से उस बीते हुए टिक को समेटता और अगले टिक के बीतने का इंतजार करता। मैने एक बार पूछा भी था उससे-"तुम्हे नही लगता,कि तुम्हारी जिन्दगी टिक-टिक की मोहताज हो गई है?"वो शायद समझ नही पाया,अलबत्ता उसने एक कहानी जरूर शुरू कर दी थी,जिसमे वो था,उसका बाप था,एक टेबुल घड़ी थी और उसके हाथो से नीचे गिर टिक-टिक के लायक नही बची थी।...कुछेक पात्र और थे-उसके बाप का थप्पर और तीन दिन तक सारे बच्चों के रात का नदारद खाना... हाँ एक नंगी सच्चाई जुड़ी थी-वे महीने के आखिरी दिन थे। अब इस बात को क्या याद रखना और बार-बार दुहराना;बच्चे तोड़-फोड़ करेंगे,तो बाप को गुस्सा आएगा ही।

मै भी क्या करूँ,उसकी वाली नजर कहाँ से लाऊँ। अब देखो ना,उसके साथ पढने वाली दो चोटी बाँधने वाली लड़की छुट्टियों के बाद बॉब-कट मे आ गई,तो जनाब ने उस दिन से उसे देखना ही छोड़ दिया। गुस्से मे रात का खाना भी नही खाया। यहाँ तक तो सोच पाया मै कि ड्रीमगर्ल कैसे नापसंद हो गयी,पर मेरी समझ के बाहर की बात थी कि उसने रात का खाना क्यूँ नही खाया। एक और तफसील(उसी की जुबानी)संग इसके जोड़ना चाहूँगा कि उस दिन शाम मे घर पहुँचने पर बाप ने उसे अवारा,बेरोजगार आदि विशेषणों से लांछित किया था और माँ टीन के खाली कनिस्तरों को पटक-पटक कर उनमे से आटा निकालने की नाकाम कोशिश रात नौ बजे तक करती रही थी।

कई सारे ऐसे वाकयात हैं,जो मुझे भी सोचने को बाध्य कर देते हैं कि उससे बोल ही डालूँ-"मै आपको नही समझ सकता।"जब इसकी पत्नी बहुत ज्यादा बीमार थी और बिस्तर पे पड़े-पड़े भगवान को याद करती थी,तो ये भी साथ मे उपरवाले से कुछ माँगा करता था। दवा या दुआ -दो विकल्प हैं;सब तो इतने खुशकिस्मत होते नही कि दोनो एक साथ मिल जाए। बात उन दिनो की थी,जब नौकरी मे छँटनी वाली लिस्ट मे इसका भी नाम था। इसने मुझे जब बताया कि वो दुआ किसलिए करता था,तो सचमुच मुझे लगा कि इसे समझने के लिए कई और बुद्धियाँ मुझे चाहिए। अपनी बीबी से जुड़े इसके पास मुकम्म्ल दो या तीन किस्से ही थे,जिनको सुनाते वक्त आँखो का सूनापन और गहरा हो जाता था और बीच-बीच मे होठ अपनी हरकत बंद कर निगाहों को आगे की दास्तां का जिम्मा दे देते थे। एक तो बता चुका मै कि उसकी बीमार पत्नी उपर जाने का इन्तजार कर रही थी और वो दुआ माँग रहा था कि इन्तजार कम से कम हो जाए;सही मे दिल से इसने कभी ठीक होने कि दुआ नही माँगी। हाँ,बाकी कुछ जो भी वो माँगती थी,ये दे देता था...पानी पिलाता रहता था,दूर कुर्सी पे सामने बैठा रहता था...उन दिनो ये भी बैठा ही था। दुनियावाले समझते थे कि बीबी का कितना ख्याल रखता है और ये जानता होता था कि लोग इसे समझ नही सकते।

बाकी दोनो दास्ताने एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। शादी हुई जब इसकी,पतित्व के सारे अरमान मचल रही थे;फूटपाथी किताबो के अफसाने और वात्सायन के फल्सफे कुलाचे मार रहे थे। पर पहली रात ही इसे पता चला कि लोग मुर्दों के साथ सोने मे डरते क्यूँ हैं। अंत मे वही इसके बेवजह पौरूष प्रदर्शन से टूट गई और शादी के पहले की दास्तां....वादे,कसमें और किसी और के हो जाने की तफसील सुना डाली। ये पत्थर का बुत हो गया और बुत जब हिला,तो कमरे मे दो बिस्तर(अलग-अलग)लग चुके थे....दोनो अभी भी हैं। वैसे बीबी जल्द ही साथ छोड़ गई;उसकी लाश के संग उसकी दो तमन्नायें भी जल के धुआँ हो गई। जब तक जीती रही,सोचती रही कि अपने पति(वैध)की गोद मे सर रख के बीमार जिस्म मे नई रूह जगवाए और उसके पावों मे सर रखके माफी माँग ले। पर जनाब ने न कभी छुआ,न छुने की छुट दी। काश इतना ही तटस्थ रहता... पर सब कुछ होते हुए व्यक्तित्व की मूरत मे झाँकते रहते थे-रिएक्शन्स, ओवर-रिएक्शन्स, रिटेलिएशन और कभी एसकेपिज़म...फिर भी दुनियावाले इसे न्यूट्रल ही समझते रहते थे। जब इसकी बहनो के किस्से आम होने लगे थे,फिर इसने वो शहर छोड़ दिया था...मैने उसके व्यक्तित्व की मूरत से झाँकते सारे चेहरो का विशेषण उस पर थोप दिया था और उसका सपाट सा जबाब था-"मै क्या हूँ,ये नही जानता।पर इतना जरूर मालूम है कि ये मेरी जिन्दगी का हिस्सा है।"अब बताइए,ऐसे मे कौन इसे समझ पाएगा।

बाप का जिक्र आते ही नफरत और हिकारत से इसका चेहरा विद्रूप हो जाता। माँ को भी कभी स्वतंत्र माना नही इसने,सो बाप के संग वो भी होम हो जाती थी। अपने जीवन के शुरू के हिस्से की कहानियों का खात्मा वो कुछ यूँ किया करता-"माई बर्थ वाज़ ऐन एक्सीडेन्टल डिफ़ाल्ट..सालो ने अपनी मस्ती के लिए..।"कभी उसने ये नही सुनाया था कि बाप ने कन्धे पे बिठा गलियो मे उसे घुमाया था या माँ ने गोद मे बिठा बड़े-बड़े कौर उसके मुँह मे ठूँसे थे। हाँ,बड़े भाईयो के दोस्तो से उसे ये जरूर पता चला था कि उसके जन्म के कुछ दिन तक उसका बाप अपने बच्चों से नजर बचाते रहता था। फिर एक गाली उसकी जुबान से फटाक से निकलती थी-"साले के पास इतनी ही शरम थी,फिर बेटियों से क्यूँ?"मैने कभी उससे पूछा भी नही कि बाप को लेकर इतना गन्दा क्यूँ सोचता है। शायद उसके जबाब से मै संतुष्ट भी नही हो पाता;उसका नजरिया मै समझ कहाँ पाता हूँ। एक सॉफ़िस्टीकेटेड आदमी की जुबान से इतनी गन्दी भाषा-ये विरोधाभास समझ पाना हर किसी के बस की बात थोड़े ही है।

हुआ यूँ था कि दफ्तर मे काम करने वाली एक संवेदनशील महिला,जिसका कोई भाई नही था,ने रक्षाबंधन पे इसे राखी बाँधने की पेशकश की। पहले ये तो ठठाकर हँसा,फिर उसने कलाई के इस धागे का महत्व पूछा। वो चकरा गई और खिसियाना सा चेहरा बनाए खिसक गई। शायद वो समझ ही नही पाई-सवाल मे जुड़े तथ्य को,या सवाल पूछने वाले आदमी को-या कुछ और तो नही समझ गई ,जैसी विडम्बना इसके साथ अक्सर होती है। बाद मे इसने मुझे बताया था कि जब से बाहर से लगे कमरे मे इसकी दोनो बड़ी बहने सोने लगी थी ,परिवार की माली हालत सुधरने लगी थी। जब इसने अपने किताबो के आदर्श को यथार्थ की जमीन पर पटकना चाहा,फिर’बहन...’ का इल्जाम लगा इसे घर से निकाल दिया गया। अर्थ और मूल्यों की इस लड़ाई से अब किसी को क्या लेना,क्यूँ कोई समझने की कोशिश करे।

उसकी जिन्दगी हर मायने मे अधूरी सी लगती रहती थी,हाँ हर जगह कमी ही कमी भरी हुई थी;अभाव का कही अभाव बिल्कुल नही था। हर खाली गैप को भरने की उसकी अदा भी निराली थी-उस गैप से जुड़े किस्से से जिन्दगी का खालीपन भर लेता था। उसकी जिन्दगी एक शीशे का मकान सा था,जिसमे वो कैद था। रोज कुछ शीशा पिघल कर उसमे समा जाता और मकान का दायरा घटता जाता। मकान सिमट रहा था,वो बढता जा रहा था। एक बार मैने सवाल का प्रारूप बदल दिया था-"क्या आपने खुद को समझने की कभी कोशिश की?"कुछ पल खामोश रहा,फिर बोल फूट पड़े-"एक मुकम्मल तस्वीर तभी बन पाती है,जब आईने के सामने एक ही चेहरा हो। आईने के सामने खड़े होते ही बहुत सारे चहरे एक साथ आ जाते हैं,सबको मिलाकर देखने की कोशिश मे एक अजीब सा चेहरा सामने आता है-थोड़ा मूर्त्त,थोड़ा अमूर्त्त-शायद लिजलिजा सा। लिजलिजेपन को छूने गया,फिर अपने लिजलिजे वजूद का अह्सास होते ही खुद पर से विश्वास ही हट गया।"उसने मेरे चेहरे पर अजीब सी असामान्यता देखी और फिर अपने किशोरवय की वो दास्तां शुरू कर दी,जब उसकी मसें भींगने लगी थी और दिन मे बीसियों बार वो अपना चेहरा देखता रहता था.... और तब तक सुनाता रहा,जब तक मेरा चेहरे पे सुनी कहानी को फिर से सुनने की जिल्लत और उससे उत्पन्न खीझ नही दिखाई देने लगी।

वो तो खुद को नही समझ पाया,पर मै क्या समझूँ उसे-पिघला हुआ शीशा,लिजलिजा अक्स....या अतीत के पर्दो मे छुपा एक कुण्ठित व्यक्तित्व... पर कुण्ठा तो मेरे ही अंदर है। ठीक ही कहता है वो-"देखिए,आप मुझे नही समझ सकते।"


-श्रवण सिंह

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26 कहानीप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

श्रवण जी।
बहुत अच्छी कहानी है। जिस प्रकार से आपने घटना दर घटना कुंठा को विस्तार दिया है पूरे कथानक को रोचक बनाता है। यद्यपि क्लामेक्स जैसी कोई चीज इस कहानी में नहीं है जो अचानक इसकी रोचकता को बढाये। पढ़ते हुए कहानी के अंत का पूर्वानुमान भी होने लगता है।...। किंतु कहानी लिखने की आपकी शैली प्रसंशनीय है। आपनें अनावश्यक विस्तार में यकीन नहीं रखा है और बेवजह के बोझिल शब्दों में भी आपकी रुचि प्रतीत नहीं होती। कहानी का अंत अच्छा किया है आपने।

*** राजीव रंजन प्रसाद

ALOK PURANIK का कहना है कि -

बहुत खतरनाक कहानी है जी।
एक नया प्रयोग। और करें।

piyush का कहना है कि -

कहानी काफ़ी स्तरीय है............
शुरू मे थोड़ी खींच गयी है पर बाद मे गति बनी रहती है.........
कथानक अच्छा है.....पर चूँकि क्लाइमॅक्स नही सो अंत मे अचंभीत करती है कहानी...................
कुछ गद्यांश अच्छे लगे जैसे यदि किसी की ज़िंदगी मे कोई कमी ना हो और वो उदास हो तो आश्चर्य की बात होती है पर जिसके जीवन मे अभाव ही अभाव है उसके बारे मे क्या सोचना?
और.......
घड़ियों की सूई की टिक-टिक मे बँधा रहता था और ये दोनो हाथो से उस बीते हुए टिक को समेटता और अगले टिक के बीतने का इंतजार करता।
एक अच्छी कहानी के लिए धन्यवाद और आगे की रचनाओ के लिए शुभकामनाएँ

anurag arya का कहना है कि -

sabse pahle badhayi...bhagte daudte jeevan me kuch shan tharkar likhna aor aaj ke jeevan se juda likhna.....shaily lajavab hai, katha ka udeeshya mujhe to spast prateet hua.
likhte rahe.

Shishir Mittal (शिशिर मित्तल) का कहना है कि -

श्रवण जी,

क्ष्मा चाहूँगा, कुछ कठोर कहना चाह्ता हूँ. अपने पूर्ववर्तियों की भांति मेरे पास प्रशंसा के कोई शब्द नहीं हैं. आपने ऐसी कहानी क्यूं लिखी? इसका क्या अर्थ है? यह कौन सी सामाजिक, व्यक्तिगत अथवा साहित्यिक आवश्यकता को पूरा करती है?

विस्तार भी अनवश्यक है. भाषा में वह कसाव भी नहीं जो पाठक को बाँधे रह सके. आपके शब्दों का चयन कहीं-कहीं पर अच्छा है, पर मुझे तो यह "पुरुषों की साहित्यिक पंचायत" से अधिक और कुछ नहीं लगा.

आप अपना समय किसी सार्थक प्रयास में लगाइये.

आपकी भावनाओँ को चोट पहुंची हो तो क्षमा चाहता हूँ.


शिशिर

Siddhartha का कहना है कि -

Mere liye sabse bada prashn ye hai ki mai
"Kis nazar se kahani ko padhu taki baad me, mere oopar ye aarop na lage ki, maine jis nazar se kahani padhi us nazar se nahi padhi jani chahiye".........parantu maine padh hi li....ek lumbi si chhoti kahani.
Bade Bhai, aap kahani ko ekjut karne me chook gaye. Aapne itane sare maanviya vishado ko ek kirdar ke maadhyam se bhadaas ke taur pe nikalte rahe par aap iski majbooti barkaraar nahi rakh sake.
Kahani me ant ka itezar nahi tha darasal kahani me rochkta ka bharpoor abhaav mila.

Jaha aap kamyaab rahe;
aapne sookshmta se apne kirdar ka make-up kiya,
badhiya lafz diye,
Kahani likhne ke liye kuchh naye aayam bhi banaye.

Is baar aapne bas achha likha,
Aap aage achha likhenge meri aasha hai.
Aur aap mujhe apne vichar mujhe vyaktigat roop se mail/scrap kar sakte hai,
mujhe aatmik prasannta hogi.

Sadhanyvaad,

Siddhartha

Sanjiv का कहना है कि -

shabdo ke apni samajh ke dayre me kahani kafi achhi lagi. aur ek baar padhunga, behtar appreciation ke liye.....

रंजू का कहना है कि -

श्रवण जी...एक अच्छी कहानी के लिए धन्यवाद

Keerti Vaidya का कहना है कि -

BHUT ACHI LIKHI HAI..EK GEHRA ANDAAZ HAI LIKHNE KA.....AUR PADHNE MEIN EK ROCHKATA BANI REHATI HAI...MUJHE APKE LIKHNE KA ANDAZ BHUT BAHAYA..

SHURIYA..KEERTI

विपिन चौहान "मन" का कहना है कि -

श्रवण जी...
सबकी अपनी अपनी सोच अपना अपना नज़रिया होता है..
किसी की टिप्पणी से हम को सीख लेनी चाहिये..
अगर टिप्पणी से मन व्यथित हो जाये तो ये गलत होता है..
आप की कहानी का शीर्षक कहानी के लिहाज़ से बहुत अच्छा है..
और जितना मैं आप की कहानी को समझ पाया हूँ तो वो ये है कि आप की कहानी का नायक..
एक साथ कई चरित्र जी रहा है....समाज में ऐसे भी इन्सान होते हैं...
खुशी की और प्रशंशा की बात ये है कि आप ने कहानी को फिज़ूल विस्तार नहीं दिया..
कहीं भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि कहानी को खींचा गया हो..
और मुझे पूरी कहानी में अन्त ही सब से ज्यादा सुन्दर लगा..
शब्द चयन आप का ला-जवाब है..
बस प्रयास कीजिये कि आप जो भी लिखें.
वो हर प्रकार के पाठक को पसन्द आये..
मैं जानता हूँ कि कोई भी व्यक्ति परिपूर्ण नहीं होता किन्तु आप से मैं ऐसी अपेक्षा कर सकता हूँ
आप के स्तर से मैं परिचित हो रहा हूँ..
कुछ बुरा लगा हो तो छमा कीजियेगा..
आपका अनुज..
विपिन चौहान"मन"

shobha का कहना है कि -

एक अच्छी एवं संवेदनशील कहानी । दुनिया में बहुत कुछ है बस
देखने की दृष्टि और समझने की भावना चाहिए । कहानी के पात्र
हमेशा हमारे आस-पास होते हैं किन्तु हम देख नहीं पाते । एक संवेदन शील
लेखक जब अपनी कलम चलाता है तो सब कुछ साफ-साफ दिखने
लगता है । एक ऐसी ही दृष्टि देने के लिए धन्यवाद ।

shal का कहना है कि -

kahani bahut achhi hai
samagn katha me ek vyatha simti hui hai
aapka andaj-e-bayan behtareen hai

shalini

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

श्रवण सिंह जी
वो आदमी कहानी मुख्य पात्र के माध्यम से आजादी के बाद के भारतीय समाज के कई दशकों की आर्थिक सामाजिक परिवेश की कुंठा अपने आप में समेटे हुये है. वो आदमी जो इसमें जी रहा है, उसे कोई नहीं समझ सकता कयोंकि 'एक मुकम्मल तश्वीर तभी बन पाती है जब आइने के सामने एक ही चेहरा हो'. कहानी का अंत नहीं होता है कहानी पाठक के मानस को खुला छोड ज़ाती है. अच्छा प्रयास है शुभकामनायें
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

श्रवण जी,
आपने कहानी से पाठक को बखूबी जोड़ दिया है। जो कुंठा, क्षोभ और आक्रोश आप उस आदमी के माध्यम से दिखाना चाहते थे, उसमें आप सफल रहे हैं। उसके हर क्रियाकलाप को आपने एक कुशल चित्रकार की भांति कहानी में उकेर दिया है।
लेकिन एक बात की कमी रह गई। शायद भावों के उमड़ते सागर के कारण आप कहानी को कुशलता से गढ़ नहीं पाए। जैसा कि सबने कहा कि कहानी चौंकाती नहीं है, सही है। पाठक को कहानी में किसी चीज की प्रतीक्षा नहीं रहती, इससे उसकी रुचि भी भंग हो सकती है। कहानी में कुछ नाटकीय घटनाक्रम भी होता तो कहानी सम्पूर्ण हो जाती।
आशा है, अगली कहानी में आप इस बात पर ध्यान देंगे।
वैसे एक सुन्दर कहानी के लिए बहुत धन्यवाद। मैं अनुमान लगा सकता हूं कि यह कहानी कितने लम्बे चिंतन का परिणाम रही होगी।

आलोक शंकर का कहना है कि -

kahaani to nahi kah sakta par han ek vaicharik bahav jarur hai aur prastutikaran se aisa pratiit hota hai ki kahanikaar ne airf apni bhavanaon ki prastuti kii hai .. par fir bi overall achcha laga padh kar aapke andar ka lekhak bahut asaadharan hai aur prayog karte rahiye

Pappu का कहना है कि -

मुझे नही पता कि लेखक के इस कहानी को गढकर अपने लिए कैसे पाठक वर्ग की अभिकल्पना की है। मुझे जहाँ तक लगता है कि ये कहानी इन्होने साहित्य के तथाकथित बुर्जुआ एवं प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग के पढने के लिए लिखी है, जिनके पास बस यही काम हो तथा एक एक वाक्य और शब्द पर चटकारें ले ; पर वे भूल जाते हैं कि इस बाजारी माहौल और आज के भागम-भाग एवं आपाधापी के युग मे इतना सब्र कम ही लोगो के पास रहता है । हाँ , नजर वहाँ जाती है, जहाँ ’मसाला’ हो, वो चीज टपकती हो।

सो उनसे गुजारिश है कि वे आज के परिपेक्ष्य मे पाठक के हिसाब से लिखे। जरूरी थोडे ही है कि पाठक भी उन्ही की तरह वैसी ही यंत्रणा से गुजरने के लिए तैयार हो !

कहानी मुझे तो बहुत पसन्द आई;खासकर इसका शिल्प। बिल्कुल ही एक नया प्रयोग था और बेहतर ढंग से लेखक ने इस पर मेहनत की। पूरी कहानी मे अपनी सम्पूर्णता के लिए व्याकुल एक अधूरे व्यक्तित्व की एक असाधारण सी कोशिश दिखती रही- एक अस्तित्ववादी मनुष्य का सही चित्रण।

अंत बहुत ही लाजबाब रहा। ऐसे अंत खुद तो शब्दहीन हो खत्म हो जाते हैं,पर सामने वाले के लिए सब कुछ खुला छोड़ जाते हैं..... A THOUGHT PROVOKING STORY...

लेखक को इस कहानी के लिए बधाई एवं आगे की रचनाओ के लिए शुभकामनाएँ।

mili का कहना है कि -

कहानी बहुत गहरी है... और उसी गहराई के कारण एक ठहराव सा दिखता है इसमे.. पर ये परिपक्वता वाली ठहराव मालूम पड़ती है। हाँ, नॉन-स्टॉफ व रिमिक्स वाले सतही युग के लिये बोरिंग सी लगती होती है; शायद पचास फीसदी लोग इसे पूर पढने की जहमत भी ना लें, मगर जिसने पढ़ लिया, वाह वाह के लिए शब्द नही बचेंगे उसके पास।

एक बेहतरीन कहानी... लेखक इस कला मे काफी मँजे हुए लगते हैं।... उनसे भविष्य मे इसी स्तर की कहानियों की उम्मीद रहेगी।

Navin-true Indian का कहना है कि -

श्रवण जी,
मैं आपको एक बात के लिये बधाई देना चाहता हुँ कि आपने महान लेखक स्व॰ प्रेमचंद के पथ पर चलने का साहसिक कार्य किया है। और काफी हद तक आप पहुँच भी गये हैं।
क्लाइमेक्स आज के लेखको की और कहानी पढने वालो की जरुरत बन गयी है या आप कह सकते हैं कि व्यसाय बन गया है,और मैं ज्यादातर क्लाइमेक्स नहीं देखता हुँ।
इक आलोचनात्मक बात कहनी है कि आपने गवई भाषा और हिन्दी भाषा का समन्वय सही तरीके से नही किया है।लेकिन आप का प्रयाश सराहनीय है और उम्मीद है कि आगे की कहानियो में आप इन छोटी-छोटी गलतियों कु सुधार कर इक नये युग के प्रेमचंद को अवतरित करेंगे।
धन्यवाद
नवीन-इक सच्चा भारतीय

पुनीत ओमर का कहना है कि -

भई बाकी सब तो ठीक है पर मैं स्वयं ना तो कोई ऐसा पहुँचा हुआ कहानीकार हूँ और ना आलोचक जो 18 टिप्पणियाँ पढ़ने के बाद भी अपनी "मौलिक टिप्पणी" दे सकूँ। इसलिये एक अन्य महानुभाव पप्पू जी की टिप्पणी के एक अंश -"गुजारिश है कि वे आज के परिपेक्ष्य मे पाठक के हिसाब से लिखे। जरूरी थोडे ही है कि पाठक भी उन्ही की तरह वैसी ही यंत्रणा से गुजरने के लिए तैयार हो!" को विस्तार देना चाहूँगा।

ऐसा प्रतीत होता है कि ये वाक्य लेखक के नजरिये से लिखा गया है। पर अगर ये वाक्य पाठक के नजरिये से लिखूँ तो यहाँ मौजूद सभी लोग सहमत होंगे कि "यदि लेखक ने मुझे इतनी यंत्रणा पहुचाई है तो मैं उसे ऐसे कैसे छोड़ दूँ? टिप्पणी भी लिखूँगा और ऐसी लिखूँगा कि लेखक भी क्या याद करेगा।"

एक सामान्य पाटक के द्रष्टिकोण से यहाँ पर मौजूद अधिकाँश टिप्पणियाँ पढ़ने से ऐसा ही प्रतीत हो रहा है जैसे अभिनेता मिथुन अपने चलचित्रों में खलनायकों से प्राय: एक सम्वाद बोलते थे -"चुन चुन कर बदला लिये बिना मैं तुझे इतनी आसानी से मरने नहीं दूँगा।"

टिप्पणियों पर टिप्पणी करने के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ। कहानी को दो एक बार और पढ़ना चाहूँगा उसके बारे में तकनीकी टिप्पणी के लिये।

वैसे बाकी सब ठीक है।

archana का कहना है कि -

उसकी जिन्दगी एक शीशे का मकान सा था,जिसमे वो कैद था। रोज कुछ शीशा पिघल कर उसमे समा जाता और मकान का दायरा घटता जाता। मकान सिमट रहा था,वो बढता जा रहा था। एक बार मैने सवाल का प्रारूप बदल दिया था-"क्या आपने खुद को समझने की कभी कोशिश की?"कुछ पल खामोश रहा,फिर बोल फूट पड़े-"एक मुकम्मल तस्वीर तभी बन पाती है,जब आईने के सामने एक ही चेहरा हो। आईने के सामने खड़े होते ही बहुत सारे चहरे एक साथ आ जाते हैं,सबको मिलाकर देखने की कोशिश मे एक अजीब सा चेहरा सामने आता है-थोड़ा मूर्त्त,थोड़ा अमूर्त्त-शायद लिजलिजा सा।

shrawan ji.......samajh mein na jaane kitne terah ke charitra hote hai.....aur vo kis wajah ka shikar hote hai.....aapki kahani ka vishay aur prastuti karan dono hi anootha hai.........aapki kalam ka nazer ka aabhas ho raha hai......aage intzaar rahega.....aise hi kisi anokhi rrachna ka......

archana

Raj का कहना है कि -

Apki kahani mein bahut dum hai.. jab maine padna suru kiya to last line ko padne ke baad hi chain aaya.. aisa lag raha tha.. kis uss admi ka chehra mere samne ho... aur main usse baatein kar raha huun..

praveen pandit का कहना है कि -

श्रवण जी!
सर्वप्रथम मेरी बधाई कथा-लेखन के लिये और मेरा विनम्र आग्रह कि आगे भी विभिन्न चरित्रों से रु-ब-रु कराते रहें.

'वोआदमी' का नायक बहुत से चरित्रों को अपने साथ ढो रहा है,पाठक उसकी विडंबनाओं का परिचय तो प्राप्त कर लेता है, अंत तक पहुंचते पहुंचते,किंतुगति कुछ धीमी प्रतीत हुई.संभवतः,विवरणात्मक शैलीके कारण.

चरित्र निश्चय ही अपना परिचय देने मे सफल है.
मैं आपकी दूसरी कहानियां भी पढने के लिये उत्सुक रहूंगा.

सस्नेह
प्रवीण पंडित

Anonymous का कहना है कि -

bashir badar ne kabi likha tha - Ek admi ke bhitar hai das bis admi
jab bhi mujhe dekhna bar bar dekhna..
apke bhitar ke rachnakar se jaise jaise wakif ho raha hun ek naye admi ko janne ka mauka mujhe mila hai.adhunik manaw ka yah astitwagat sankat naya nahi hai aj jisse ham ap do char hain..magar jis tarah se use apne is kahani me samjha aur barta hai adbhut aur insight invoking hai.
sabse jyada dhyan akarsit karta hai bhasa ke sath apka saluk..ekdam nirala aur taja ..
jaise--" uski ankh piche lagi hui thi..."
is ek pankti me apne Milan Kundera jaise sahitiyik ke sare Atit datsan aur Sahitya aur Astitva ke barks Smiriti ke dynamics ko apne uker diya hai ..

उसकी जिन्दगी एक शीशे का मकान सा था,जिसमे वो कैद था। रोज कुछ शीशा पिघल कर उसमे समा जाता और मकान का दायरा घटता जाता। मकान सिमट रहा था,वो बढता जा रहा था। एक बार मैने सवाल का प्रारूप बदल दिया था-"क्या आपने खुद को समझने की कभी कोशिश की?"कुछ पल खामोश रहा,फिर बोल फूट पड़े-"एक मुकम्मल तस्वीर तभी बन पाती है,जब आईने के सामने एक ही चेहरा हो। आईने के सामने खड़े होते ही बहुत सारे चहरे एक साथ आ जाते हैं,सबको मिलाकर देखने की कोशिश मे एक अजीब सा चेहरा सामने आता है-थोड़ा मूर्त्त,थोड़ा अमूर्त्त-शायद लिजलिजा सा।
kahani me aur kuch nahi bas ye ek pankti hoti ke" chhodiye ap nahi samjhenge..." tabh bhi ye kahani ek dhansu kahni hoti. is ek jumle me wajud ke kai kai sawal ubharate hain...is jumle me ek kism ka bemanipan,udasi,pasti,tatasthat,aur ant me ek sannata jaisi anek anubhutiyon ka gahara milajula gahra risaw hai..
jindagi ek ghaw ki tarah ahista ahista bah rahi hai..
"ap nahi samjhiyega.." ke sath sath sise ka pighalate jana...jindagi ke do chhro ko jodta hai yani ki jindagi ke beganagi aur wyarthta ke sath ant ki aniwaryata..
"ap nahi samhjiyega.." sanwad ki ye asambhawana(impossibility) Wo admi ko jis dimesion me le jati us dimension me mujhe dukh ke sath kehna padta hai apki kahni par pratikriya dene wala koi nahi pahunch paya..we kahani ke satah par sthith Silp aur kala ke hi charcha me ulajh gaye..aam ka gachh hi ginte rah gaye..kahani ke is phal ko chakha nahi ..
darasal apko padhane ke pahle Dostovosky ko padhna jaruri hai..dostivoski ek engineer tha , use bharat ke ek sahityakar ne Mansik biklang tak kah hai..
mane dostovosky ke pagalpan ko jo samjhe wahi apki kahni ki atma tak pahunche..
Shakespeare ne Hamlet ke madhaym se prasan uthaya that--"to be or not to be" ( by the way dostovosky ne kah hai achhi rachana wo nahi hai jo achha uttar deti hai balke wo hai jo bade prasn khade karti hai)
apki saflata Shakespeare ke us prasn ko Update karne me hai--
Apke yahan Be or not to be ka option hi nahi hai--ap puchhate hain--
वो आदमी था और आदमी नही भी था???
End of history ki tarah End of man ki anugunj is kahni ke harf dar harf pasarati jati hai.
apka prasna do tuk kahun to shakespeare se bhi jayda primitive hai--
"i am or not?"
mai manusya hun ya nahi?
admiyiyat se khali ek Wo admi
pura bimb hi bahut karun ,trasad,jugupsu,lijlija,bhayawah..na jane kya kya hai..
uttaradhunik samay ki puri pida hi nahi us pida ki wayarthata ..aur us wayarthata ke ek Bhayanak Ub me badlate jana kahani ko ek microscopic sakti balke X-ray chhamata se samppan karti hai jisse ke kahani Admi ke bahut bhitar ke ghaw ki ek Xiraynuma kankalik chitra prastut karti hai..
kitni bidambana hai ke Wo admi Admi ki nahi hai..sirf biology ke star par(सामान्य कद,इकहरा बदन और शरीर की परिभाषा पूरी करने को जो जो चाहिए था, सब के सब मुकम्मल अपनी जगह जमा थे। ) admi aur admi hone ke baki chihn uske wajud se ek sire se gayb hain..
uske is "nahone-numa" hone ko koi nahi samjahta ....छोड़िए ,आप मुझे नहीं समझ पाऐंगे।
"maine jivan ka stya pa liya hai..antim satya hai..ek bhayanak ub" --Albert Camus
asha apni rachnaon se mujh-se muftkhoro ko isi tarah nawajte rahenge

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

पहली बात-
कहानी में बहुत सी व्याकरण और मात्राओं की गलतियाँ हैं, जिसपर कहानीकार अगली बार से ध्यान दे।

दूसरी बात-
कहानी में यदि लेखक भी एक पात्र हो तो कोशिश करनी चाहिए वो अलग से पाठकों से बात न करे बल्कि उसका किरदार लोगों से बात करे। यह कहानी बीच-बीच में किसी मनोवैज्ञानिक का वक्तव्य लगने लगती है।

तीसरी बात-
कथावस्तु को सहज और सरल बनाने के लिए हिन्दी में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग सराहनीय कहा जाता है, परंतु तब जब ऐसे शब्द प्रयोग किये जायँ, जो आपलोगों की बोलचाल में इस तरह घुल मिल गये हों कि भाषाभेद ज्ञात न होता हो। उदाहरण के लिए गुलज़ार की रचनाओं पर नज़र फ़ेरें। आपने कहानी में कहीं-कहीं बहुत ही संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया है (जैसे- विद्रुप, विकल्प, विशेषणों आदि) तो कहीं-कहीं आंग्ल भाषा के 'रिएक्शन्स, ओवर-रिएक्शन्स, रिटेलिएशन और एसकेपिज़म आदि' का प्रयोग किया है।
मुझे लगता है कि कहानी को सरल बनाने के चक्कर में आप शब्द-प्रयोग में साम्य नहीं बना पाये हैं।

चौथी बात-
कथानक प्रभावी है और आपकी रचनधर्मिता का परिचायक भी। अगली बार के लिए शुभकामनाएँ।

tanha kavi का कहना है कि -

श्रवण जी,
देर से टिप्पणी करने के लिए क्षमा चाहता हूँ। सच बात तो यह है कि मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या टिप्पणी करूँ। कहानी-विधा का मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं है। मेरे जैसा पाठक किसी कहानी में क्लाइमेक्स खोजता है, जो मिला नहीं , इसलिए मुझे अपना दृष्टिकोण बदलना था, और इतना समय इसी में लगा।
बाद में जब इस कहानी को मैने दुबारा पढा तो मैने हर पंक्ति से खुद को जड़ना शुरू किया। तब जाकर यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी। आपने बड़ी हीं बखूबी से नायक की मनोस्थिति का वर्णन किया है। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।आपकी अगली कहानी का इंतज़ार रहेगा।
-विश्व दीपक 'तन्हा'

Soundarya का कहना है कि -

sabki apni jindagi hoti hai, kisi ke najariye ya mansikta ko kuntha kehna uchit nahi hai. Agar aapka patra kunthit hai to usko jhelne wala jo baar baar uski kahani sunte waqt sochta hai ki wo yeh kahani kon si bar sun raha hai to wo shakhs mansik rogi hai !

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