Saturday, August 18, 2007

तुलसी की छाँव

"इ तुलसी हमार जवान बच्चे को निगल गई , हुजूर। इ कुल्टा है सरकार .......
इ डायन है। " -पंचों के सामने धनेसर बिलख रहा था।

सुबह के दस बजे थे। धूप माथे के ऊपर चढने को बेताब थी। जानलेवा गर्मी के बावजूद गाँव के चौपाल में लगभग ५०-६० लोग जुटे थे| गाँव का यह रिवाज हो चला था कि जब कभी पंचायत बैठती थी तो सारे बड़े-बुर्जुग लोग इकट्ठा होते थे। गाँव के मुखिया जी भी पंचायत में आते थे। फिर चाहे मामला फौजदारी हो या दिवानी, आखिरी निर्णय पंचायत का हीं माना जाता था। आज जो पंचायत बैठी थी उसमें धनेसर मुद्दई था।

अब कोई भले ही इसे अंधविश्वास कहे, लेकिन गाँव में 'नज़र-गुजर' का माहात्म्य बहुत बड़ा होता है। सभी गुस्सैल निगाहें बस तुलसी को घूर रही थीं। ऎसा लग रहा था मानो सहस्त्र-मुखी राक्षस एक शिकार की ओर बढ रहा हो। उस भीड़ में तुलसी एक जिंदा लाश की तरह शांत थी - असहाय और बेबस।
धनेसर की आँखे रो-रो कर सूज गई थीं। बेटे को खोने का दर्द उसकी लड़खड़ाती बोली में साफ झलक रहा था। कोई पत्थर हीं होता जिसका दिल धनेसर की आँसूओं से न पिघलता! माहौल में दर्द इस कदर पैठ गया था कि हर कोई तुलसी को सजा दिलवाना चाहता था । अब कोई भले हीं इसे अंधविश्वास कहें लेकिन गाँव में"नज़र-गुजर" का महात्म्य बहुत बड़ा होता है। सभी गुस्सैल निगाहें बस तुलसी को घुर रही थीं। ऎसा लग रहा था मानो सहस्त्र-मुखी राक्षस एक शिकार की ओर बढ रहा हो। उस भीड़ में तुलसी एक जिंदा लाश की तरह शांत थी- असहाय और बेबस ।

पंचों ने पंच होने के नाते तुलसी से उसका भी विचार पूछना जरूरी समझा ।

"तुलसी एका खिलाफ तुमका कुछ कहना है क्या"- एक पंच ने पूछा।

"का कहें, आपन लोग पढल-लिखल हैं, जो अच्छा लगे सो करिए"- तुलसी सुगबुगाई।
"देख तुलसी, तुम्हरे से बिना पूछे अगर कुछ निर्णय कर दिये तो हम पर लांछन लगेगी।"

"हम कुछ कहें या न कहें , समाज में त हमार चरित्तर डूब गया हुजूर , जियें-मरें अब सब बराबर है। "

"ना ! तुम खुलकर आपन बात रखो, हम सबन हीं सुनने को तैयार हैं। - पंच ने तुलसी को विश्वास में लेकर कहा।

"सरकार! औरत जात का कहऊँ गुजारा नहीं है। ऊपर से हम बेवा ठहरे , निपूत्तर बेवा, जिंदगी तीता हो गईल है , मानो करैला पर नीम चढ गईल हो।" तुलसी ने अपनी कहानी शुरू की।

गाँव के हीं मुंडन महतो से तीन साल पहले तुलसी का लगन हुआ था । दिल में कई सारे ख्वाब सजाये तुलसी अपने ससुराल आई। लेकिन हाय रे करम। ब्याह के एक-दो दिन के अंदर हीं तुलसी का मर्द गुजर गया । कोई लाइलाज बिमारी थी। अंधेरे में रखा गया था तुलसी को। तुलसी को मुंडन के बिमारी के बारे में कुछ भी खबर न थी । घर में कोई और न था । तुलसी के माँ-बाप ने भी उसे अपनाने से मना कर दिया । घर से बेटी की डोली उठती है और ससुराल से अर्थी । अब तुम्हारा ससुराल हीं तुम्हारा घर है। वहीं रहो । तुलसी अपने घर से भी बिसरा दी गई । अब अभागी तुलसी दर-बदर हो गई। ऊपर से ठहरी अनपढ , गंवार। जीने के लिए कुछ तो करना हीं था । तुलसी ने गाँव में हीं कुछ छोटा-मोटा काम करने का सोचा ।

वहीं उसके घर के पास हीं रहते थे धनेसर यादव, एक मध्यमवर्गीय गवंई रईस। आस-पास के गाँव के लोग उन्हें जानते थे। काफी नाम था उनका । गाँव में सबसे ज्यादा खेत उन्हीं के पास था । इतना होने के बावजूद भी उन्हें खेती पसंद नहीं थी । अपने तहसील में एक छोटी-सी नौकरी करना उन्हें ज्यादा भाता था । ज्यादा पढे लिखे थे नहीं , इसलिए चौकादारी संभालते थे।

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धनेसर यादव के दो बेटे थे- मुनीसर और बटेसर । मुनीसर बचपन से हीं अपने पिता की बातों में रहता था । पिता चाहते थे कि उसके घर में कम-से-कम कोई एक तो अपना खेत खुद देखे। इसलिए उन्होंने मुनीसर को खेती करने के लिए प्रेरित किया । जब मु्नीसर होशगर हुआ तो वह खुद-ब-खुद खेती में रूचि लेने लगा । जैसे हीं मुनीसर ने खेती संभाली , फसलों की पैदावार बढ गई। अब आमदनी का दूसरा जरिया भी मजबूत हो चला था । बूढे होते माता-पिता को एक बहू की जरूरत महसूस होने लगी । पिता ने अपना धर्म और अपना अधिकार निबाहते हुए , बड़े बेटे का ब्याह कर दिया। भाव-स्वभाव में बहू हीरा थी। भगवान की दुआ से एक साल बाद लक्ष्मी का आगमन हुआ । दादा जी ने अपनी पोती को प्यार से "ननकी" नाम दिया।

वहीं दूसरी ओर धनेसर यादव का छोटा बेटा बटेसर छूटपन से हीं टेढे किस्म का था । माँ-पिता की बातों का उस पर कुछ भी असर नहीं होता । ना हीं वह खेत जाता था और ना हीं पढाई-लिखाई में तबियत जमती थी उसकी । बस आवारा लोगों की तरह इधर-उधर घुमता रहता था । समय के साथ बटेसर की उम्र बढती रही लेकिन बुद्धि से मानो उसका जन्मों का बैर था । जवान हो चले बटेसर को अब भी बस एक हीं काम था - मटरगश्ती और सिर्फ मटरगश्ती ।

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ननकी के जन्म के बाद से तीन साल बीत चुके थे।

घर अब बड़ा हो चला था । हर दिन कुछ काम अकाज रह जाता था । इसलिए धनेसर की बहू ने एक नौकरानी रखने का विचार किया ।पास में हीं तुलसी रहती थी ,गाँव के कई घरों में काम भी करती थी वह । स्वभाव भी अच्छा था । इसलिए उसने अपने सास से तुलसी के बारे में बात की। सास ने साफ इनकार कर दिया । बेवा की परछाई तक घर में नहीं पड़नी चाहिए। बहू के यह कहने पर कि घर के अंदर का काम वह खुद करेगी , तुलसी केवल आंगन और चुल्हा-चौका का काम देखेगी , सास ने तुलसी को नौकरानी रखना स्वीकार किया ।

तुलसी काम पर लगा दी गई । लेकिन तुलसी को सख्त हिदायत थी कि ननकी को नज़र उठाकर देखना तक
नहीं है। बेवा और निपूत्तर होने की दोहरी चोट मिलनी हीं थी , आखिर कब तक बचती तुलसी। तुलसी ने इसे अपने भाग्य का लेखा मानकर स्वीकार कर लिया। मालकिन ने तुलसी को चुल्हा-चौका और आँगन को धोने-पोछने के काम तक हीं सीमित रखा था। इसलिए तुलसी सुबह और शाम हीं काम पर आती थी। दिन भर वह दूसरे घरों में बर्त्तन-बासन साफ कर दिया करती थी। इसी तरह वह अपना पेट भर रही थी।

धनेसर के छोटे बेटे बटेसर की तुलसी पर निगाह थी। लेकिन तुलसी को वह फूटी आँख भी नहीं सुहाता था। बटेसर ने कई बार तुलसी के साथ "जोर-जबर" करना चाहा था, लेकिन वह बच निकलती थी। मालिक से कहती नहीं थी, नहीं तो काम छूट
जाता। बस जिंदगी के हाथों मजबूर थी , नहीं तो वह यह काम कब का छोड़ चुकी होती।

काम न छोड़ने का दूसरा कारण भी था और वह थी ननकी। वह जब भी ननकी को देखती थी , उसके सीने से ननकी के लिए प्यार उमड़ पड़ता था। अकेले में वह उसे गले लगा लिया करती थी। नन्ही जान ननकी , क्या जाने बेवा और बांझ से उसके करम का क्या रगड़ा है। वह भी प्यार-मोहब्बत के साथ बह कर तुलसी के सीने से लिपट जाती थी। सोई ममता जाग पड़ती , लेकिन दिल भारी करके फिर तुलसी उसे छोड़ देती थी। उसे भी अपने भाग्य से डर जो लगता था। कहीं उसका दुर्भाग्य
ननकी पर हावी न हो जाए। यही कर्म चलता था रोज। जिंदगी करवटें लेती रहती , लेकिन माहौल चुपचाप हीं था। किसे पता था कि तुलसी की जिंदगी में बवंडर आने वाला है।

धनेसर को पता था कि बटेसर तुलसी को चाहता है। वह बटेसर को कई बार टोक चुका था। लेकिन बटेसर पर उसके पिता की बातों का कोई असर तक न था। घर की बात घर तक हीं रहे इसलिए धनेसर ने तुलसी को कुछ न कहा था। तुलसी इन सब
बातों से अंजानी थी, या यूँ कहिए कि जान कर अनजान हीं रहती थी।

आखिर उसके मन में बटेसर के लिए नफरत के सिवा कुछ था हीं नहीं। यह नफरत कब जानलेवा हो जाती , तुलसी भी नहीं जानती थी।

दिन ऎसे हीं बीतते गए । एक शाम तुलसी हमेशा की तरह खाना बनाने के लिए धनेसर के घर आई। रसोईघर के पास में हीं बटेसर का कमरा था। तुलसी अपनी हद में हीं रहती , इसलिए उसे पता भी न था कि किसका कमरा किधर है। उस समय
मालिक-मालकिन शहर गए हुए थे, कुछ सामान लाने। ननकी को दादी के पास छोड़ गए थे। दादा जी तो ड्यूटी पर थे। इसलिए ,घर में थे केवल बटेसर और उसकी माँ । तुलसी जब खाना बना रही थी तो उसे ननकी के रोने की आवाज सुनाई दी।
पहले तो वह अपना मन मार कर रह गई। लेकिन उससे रहा न गया। वह उस आवाज के पीछे दौड़ने लगी। बटेसर के कमरे के पास आकर उसने जो देखा , वह बयाँ करने लायक न था। बटेसर ननकी के साथ "जबर" कर रहा था। नन्हीं जान ननकी चीख मारकर रो रहीं थी। लेकिन हैवान के पास दिल तक नहीं था ।

आज तुलसी ने बटेसर का सबसे नीचा रूप देखा था। तुलसी के मुँह से आह निकल गई। हैवान तुलसी की और झपटा। तुलसी किसी तरह जान बचाकर भागी।

बटेसर डर चुका था। वहीं तुलसी गुस्से से फंफक रही थी। वह बटेसर को सबक सीखाना चाहती थी। वह जानती थी कि किसी को बताएगी तो कोई मानेगा नहीं। इसलिए वह खुद हीं बटेसर से निपटना चाहती थीं , आखिर बटेसर ने तुलसी की छांव को मैला जो करना चाहा था।

"हाँ, सरकार हम कुल्टा हैं, डायन हैं। हम अपने मर्द को निगल गए, इनके बेटा को लील गए। लेकिन सरकार, आपन छांव खाली होना क्या होत है, हम हीं जानत हैं। सब सच कह दिए हम। अब जो सजा देना हो, हमका दे दीजिए।"
अगले दिन तुलसी ठीक समय पर काम पर आ गई। बटेसर यह देखकर डर गया। लेकिन आज उसके प्रति तुलसी का बर्त्ताव कुछ बदला-बदला-सा था। खाना बनाने और झाड़ू-पोंछा करने के बाद तुलसी ने उसे अपने पास बुलाया। वह खुद हीं तुलसी से
समझौता करना चाहता था। तुलसी ने अपनी चाहत का हवाला देकर बटेसर को गांव के बाहर एक खेत में आने को कहा। उसने कहा कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगी अगर बटेसर उसके कहे समय पर बताए जगह पर आ जाए। बटेसर के पास कोई चारा भी न था । फिर उसने सोचा कि औरत-जात उसका क्या बिगाड़ लेगी । कुछ कहेगी या करेगी तो वह उसे भी नहीं छोड़ेगा । बटेसर हवस के मद में चूर हो चला था । जाने कई सारे ख्वाब देख डाले उसने । उसे लगा कि आज उसकी जरूरत पूरी हो जाएगी।

समय ने करवट ली । दोपहर में बटेसर तुलसी से मिलने गया और अगले दिन सुबह-सुबह हीं वह अपने कमरे में मरा मिला। मरने का क्या कारण था, किसी को कोई खबर न थी। हकिंम ने बताया कि "जहर पीने से मौत हुई है"। लेकिन बटेसर और जहर - आखिर क्यों, पल्लै न पड़ा ।

धनेसर ने पिछले सुबह तुलसी और बटेसर को बात करते देखा था । उसे बटेसर की तुलसी के लिए इश्कमिजाजी भी पता थी । इसलिए इसमें उसे तुलसी की बुरी नज़र का दोष मालूम करने में समय न लगा ।

"जरूरे तुलसी जादू-टोना की है एकापर , ना तो हमार बेटा काहे जहर पीने लगा। "-धनेसर ने अपने बड़े बेटे से कहा।
"बापू , कहें तो , तुलसी को अभिये उठाके ले आएँ।"
"ना! समाज के पता चले चाहीं कि तुलसी कैसी है। कल पंचन के सामने हम ओका सजा दिलाएँगे" - धनेसर का यह कहते हुए गला भर आया।

पंचों के सामने तुलसी ने सारी बात सच-सच बयां कर दी। उसने स्वीकार भी कर लिया कि बटेसर को जहर उसी ने दिया था।

"हाँ, सरकार हम कुल्टा हैं, डायन हैं। हम अपने मर्द को निगल गए, इनके बेटा को लील गए। लेकिन सरकार, आपन छांव खाली होना क्या होत है, हम हीं जानत हैं। सब सच कह दिए हम। अब जो सजा देना हो, हमका दे दीजिए।" तुलसी ने गर्व से कहा।

गाँव वालों ने तुलसी पर पत्थर फेंके, पूरे गाँव में नंगा घुमाया । अगले हीं दिन पास के कुएँ में तुलसी की लाश मिली । वह जानती थी कि उसकी बात कोई नहीं मानेगा, लेकिन खुश थी वह कि उसने अपने छाँव को मैला होने से बचाया था ।

-विश्व दीपक ''
१०-०८-२००७
पहली कहानी

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21 कहानीप्रेमियों का कहना है :

rakesh का कहना है कि -

bahut achchha likhe ho!!!!!

pahli kahaani hi itni achchhi likhoge........socha na tha....

kahin kahin wo ne ke types vibhakti errors ( typing errors )

dekh lenaa

par jo bhi kaho......kahaani jabardasht hai..........

Kisi patrika me chhapne ke liye bhej kyun nahi dete???

bas thoda aur lamba kar dena 1-2 para........n bhej do chaapne ke liye.....

ummid karta hun jald hi aapki kahaani waali kisi patrika ki prati bhi padhne ko mil jaye :)

a real good work!!!!!

KEEP IT UP!!!

god bless u!!!!!!!

A Silent Lover का कहना है कि -

तन्हा जी, कहानी बहत ही अच्छी थी। आप जिस तरह से गाँव के एक कूसंस्कार पर नजर दिया है, देखके अच्छा लगा। एक बात केहनी थी। जब आप कहानी लिख रहे हो, तो थोडा ज्यादा descriptive होना बेहतर रेहता है। आपकी कहानी पडते हुए पाठक को यह एहसास होना चाहिए की वह कहानी उनकी आंखो के सामने है, वह घटना सच में हो रही हो, जीसमें वह भी involved हो।

और एह एक short story है। ईसका अन्त कभी सही से नही किया जाता। short story की अन्त में कूछ "threads" खुले छोड देने चाहीए, जीस्से पडने के बाद भी पाठक को यह बात खटकती रहे कि "ईसके बाद कया हुया होगा?" ईस कहानी में आपने सारी threads बदं कर दिया। कुछ सोचने का अवसर नेही बचता।

आपके रचना पर criticise करने की गुसताखी करने के लिए माफ़ी चाहता हूं।

और यह आपकी पेहली कहानी है। बधाई।

shobha का कहना है कि -

तनहा जी
कहानी बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण और दिल को छू लेने वाली है ।
आपने एक बहुत ही सशक्त विषय लिया है । आँचलिक शब्दों के प्रयोग
से कहानी काफी प्रभावी हो गई है । नारी के दृढ़ संकल्प और शक्ति को
कितनी सहजता से दिखाया है । वही नारी जिसे सबलोग अबला समझते
हैं कितनी सबला बन जाती है ? जब भी समाज को आवश्यकता पड़ेगी
नारी इसी प्रकार के निर्णय लेगी । यह कहानी महिलाओं के लिए
भी प्रेरणा है । यदि उसे सम्मान से जीना है तो हिम्मत करनी ही होगी ।
नारी की इसी शक्ति से प्रसाद परिचित थे । उन्होने इसीलिए कहा था-
नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूज़ स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में ।
भारत की हर नारी अन्याय एवं कुत्सित कार्य करने वाले को
यदि दंड देने लगे तो भविष्य में नर पाप करने से डरेगा जरूर ।
इतनी अच्छी रचना के लिए बधाई ।

तपन शर्मा का कहना है कि -

तन्हा जी,
पहली कहानी के लिहाज से आपने बहुत सुंदर कहानी लिखी है। और विषय भी बहुत अच्छा चुना। आपने जिस तरह से गाँव की कुरीतियों के खिलाफ़ यह छोटी सी कहानी लिखी है वो काबिले तारीफ़ है।

"a silent lover" ने जो कहा इससे मैं भी सहमत हूँ। ध्यान दीजियेगा।

मैंने कवितायें तो लिखी हैं पर कभी कहानी लिखने का साहस नहीं कर पाया हूँ। अब साहस करने की प्रेरण मिली है।
आपका धन्यवाद,
तपन शर्मा

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

शब्द-शिल्पीजी,

गाँव का एक चित्र उभर कर सामने आ गया, आपकी कहानी बहुत ही मार्मिक है।

कहानी के अंत में तुलसी के साथ हुआ, क्या वैसा वाकई होता है?

कविता के साथ-साथ आप कहानी भी खूबसूरत गढ़ते हैं, बधाई स्वीकार करें।

"राज" का कहना है कि -

दीपक !!!
कविता तो आप बेसक अच्छी लिखते है......मगर आपकी लिखि कहानी पढ्के ऐसा प्रतीत नही होता कि यह आपकी पहली कहनी है.....आपने हर पात्र को बखूबी अहमियत दी है....पात्र के नाम भी कहानी के अनूसार बहुत बढिया चुना है....कहनी मे मुझे कुच्छ कमी दीखई नही दे रही है.......
आप अपनी कलम का जादू ऐसे ही दीखाते रहो.....!!!
बधाई हो!!!!
आपका मित्र,
रणधीर.....

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

कहानी विधा पर मैंने भी एक-दो बार हाथ साफ करने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हुआ। आपकी यह पहली कहानी है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कथाकार के रूप में आपका भविष्त उज्ज्वल है। इस कहानी में शुरू की १-२ पंक्तियाँ पढ़ते ही पाठक इससे जुड़ जाता है। मुझे तो बहुत पसंद आई।

pitambar का कहना है कि -

yeeee VD ...
such a nice entry .... i appreciate it!
kahani e point se jyada aapke likhne dhang achha laga... aise meri aukat hi kya hai par itna jaroor kahna chahunga ki aapne traditional theme par ye kahani likha hai ... lekin usmein aapne naye dhang se paathkon ke saamne rakha hai ... keep it up

रंजू का कहना है कि -

पहली सुंदर कहानी के लिए बधाई...तन्हा ज़ी ..विषय बहुत अच्छा चुना है।गाँव का एक चित्र कहानी के साथ साथ चलता रहा ..
बाक़ी नारी के विषय में सुंदर पंक्तियाँ शोभा ज़ी ने
प्रसाद ज़ी के लिखी हुई कह दी है ..:)

सिफ़र का कहना है कि -

प्रिय तन्हा जी,
आपने पहले ही प्रयास मे एक सशक्त रचना को जन्म दे दिया..... बधाई हो आपको और आने वाली आपकी कहानियो के लिए शुभकामनाएँ।
कहानी का परिवेश एवं भाषा मे आँचलिकता के पुट ने इसे वास्तविक बना दिया। प्रस्तुतीकरण इतना सशक्त है कि उसने कथानक की अपेक्षाकृत थोड़ी कमजोरी को बिल्कुल ही प्रकट नही होने दिया। किरदारो पर थोड़ी मेहनत की और आवश्यकता थी।
पर मुझे कहानी बहुत पसंद आई।

श्रवण

amrendra kumar का कहना है कि -

Sabse pehle apni pehli kahani ke liye badhai sweekar karen VD Bhai...

Kahani achhi hai VD Bhai. Kuchhek para men utna achha flow nahin ban paya hai jaise -

(1)"इसलिए उन्होंने मुनीसर को खेती करने के लिए प्रेरित किया । जब मु्नीसर होशगर हुआ तो वह खुद-ब-खुद खेती में रूचि लेने लगा । जैसे हीं मुनीसर ने खेती संभाली , फसलों की पैदावार बढ गई। अब आमदनी का दूसरा जरिया भी मजबूत हो चला था ।..."

(2)ek para men hai-"किसे पता था कि तुलसी की जिंदगी में बवंडर आने वाला है।"
and again in next para -
"यह नफरत कब जानलेवा हो जाती , तुलसी भी नहीं जानती थी।"

(3)"वह जानती थी कि उसकी बात कोई नहीं मानेगा, लेकिन खुश थी वह कि उसने अपने छाँव को मैला होने से बचाया था ।"
upar ki panktiyan
"तुलसी ने गर्व से कहा।" ke jast bad dete to I think ki jyada achha hota.

Fir bhi pehli kahani hai aapki and may be i'm being more critical...

Mujhe ye panktiyan jyada achhi lagi-
"वह जब भी ननकी को देखती थी , उसके सीने से ननकी के लिए प्यार उमड़ पड़ता था। अकेले में वह उसे गले लगा लिया करती थी। नन्ही जान ननकी , क्या जाने बेवा और बांझ से उसके करम का क्या रगड़ा है। वह भी प्यार-मोहब्बत के साथ बह कर तुलसी के सीने से लिपट जाती थी। सोई ममता जाग पड़ती , लेकिन दिल भारी करके फिर तुलसी उसे छोड़ देती थी। उसे भी अपने भाग्य से डर जो लगता था। कहीं उसका दुर्भाग्य
ननकी पर हावी न हो जाए। यही कर्म चलता था रोज। जिंदगी करवटें लेती रहती , लेकिन माहौल चुपचाप हीं था।"

In panktiyon ka flow bahut achha hai.

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

विश्व दीपक जी
तुलसी की छांव आपकी पहली कहानी होने के नाते विशेष प्रोत्साहन के सर्वथा उपयुक्त है. आपने ग्रमीण समाज की विसंगतियों को अच्छे ढंग से पाठकों के सम्मुख उकेरा है. देशज शब्दों का प्रयोग कथानक को रोचक ही नहीं बनाता अपितु अत्यंत पभावी ढंग से उसका अभिदृश्यीकरण करता है. "हाँ, सरकार हम कुल्टा हैं, डायन हैं। हम अपने मर्द को निगल गए, इनके बेटा को लील गए। लेकिन सरकार, आपन छांव खाली होना क्या होत है, हम हीं जानत हैं। सब सच कह दिए हम। अब जो सजा देना हो, हमका दे दीजिए।" तुलसी का गर्व समाज को संदेश भी देता है. एक बहुत अच्छे प्रयास के लिये बधाई. भविष्य के लिये शुभकामनायें.

सस्नेह
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

तनहा जी,

आपकी पहली कहानी है यह जान कर हर्ष होता है कि आपके भीतर एक गंभीर कथाकार छुपा बैठा था। मैं मानता हूँ कि आपने कहानी के साथ न्याय किया है। देशज शब्दों से निभाना कोई आसान काम नहीं फिर उसे हिन्दी की साहित्यिक शर्तों में ढालना। आपने कथानक को कहीं कमज़ोर पडने नहीं दिया है।

कहानी में कुछ पहलू कमज़ोर हैं। कई महत्वपूर्ण घटनायें चित्रण माँग रहीं हैं। यदि आप कुछ हृदय-विदारक घटनाओं का शब्दचित्र खींचते तो वह पाठक को भावुक कर देता। यह कहानी मन बोझिल करे, उतनी सफल होगी।

पात्रों के नाम आपने बहुत सटीक रखे हैं और परिवेश के अनुरूप भी हैं। कहानी का दूसरा खंड, परिवेश का विस्तार चाह रहा है। गाँव कैसा है? क्यों है? इसके लिखे बिना भी निबाह हो सकता है किंतु कहानी जितना सजीव होती है उतना जोडती है। घटनाओं को लिखने की बजाये उन्हें जीवित करने का अलग आनंद है और आपकी काव्य दक्षता यहाँ आपकी मदद कर सकती है। कहानी का अंत और मार्मिक हो सकता था, आप लिखने में थोडी कोताही कर गये।

आपकी कहानी समाज से जितने प्रश्न पूछती है कम ही कहानियाँ पूछ पाती हैं। जिस गहराई में उतर कर आपने सोचा है उसके लिये आप बधाई के पात्र हैं। मुझे आपकी अन्य कहानियों की प्रतीक्षा है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Anupama Chauhan का कहना है कि -

Deepak ji,

kam shabdon me itna hi kahungi jo mehsoos kiya...aapki kahaani padh kar mere rongte khade ho gaye...man ko janjhor diya is kahaani ne.

Keep writing
God Bless You
Anu

Neeraj का कहना है कि -

sachmuch bahut dard bhari khani hai deepak ji
aurat ke dard ko bahut paas se dikhaya hai
sabse achhi baat lagi ki anya kahaniyon ki tarah ye lambi nahi hai.
Saath hi saath this is not a happy ending story like our primary school stories

praveen pandit का कहना है कि -

तन्हा जी!
आपसे अपरिचित तो मैं नहीं ही हूं लेकिन 'तुलसी' ने जिस प्रकार परिचय कराया,मेरी खुशी निश्चय ही दोगुनी हो गयी.
और वास्तव मे यदि यह आपकी पहली कहानी है,तो मेरी सौ-गुनी बधाइयां .
शैली,चरित्र-चित्रण,पात्र-निर्वाह बहुत सुंदर . विषय-वस्तु और आंचलिकता कथा से जोड़े हुए है.ग्राम्य नारी-चरित्र की दृढता अनुकरणीय.

और क्या पढवा रहे हैं

सस्नेह

प्रवीण पंडित

आलोक शंकर का कहना है कि -

Tanha ji
Pahli kahani kahti hai ki aap kahani kaar utne hi achche hai jitne ki aap kavi . Sahitya ki har vidha me aap utne hi paarangat lagte hian . Kahani aur uskaa gaaon aur stree vishay se juda hona to use marmik banata hai hi .. aapane apni shaili se use khub sawaara hai . Kahani bahut pasand aayi .. agli kahani ka intzaar rahega.
[deri ke liye maaf kariyega . kuch jyada hi vyast tha]

nagendra547 का कहना है कि -

Nice story dude.
tu to bahut bada sahityakar ban gaya deepak bhai.

laga rah!!

विपुल का कहना है कि -

तन्हा जी,
कहानी बहत ही अच्छी थी।कहानी से पाठक अपने को जुड़ा हुआ पता है कहानी के प्रारंभ से अंत तक एहसास होता है की घटनाओं से हम जुड़े हुए हैं|यही कहानी की सफलता है |
तुलसी ने जो किया उसे किस विशेषण से उल्लेखित करूँ समझ नही आ रहा है |सच, आपमे एक बहुत ही समर्थ कहानीकार छुपा बैठा है जो वक़्त के साथ निखरता ही जाएगा |
एक बात कहना चाहूँगा,मुझे लगता है कि जब विषय मार्मिक हो तो तर्क की ज़्यादा बात नही करना चाहिए | भावों की सांद्रता के चलते वे गौण हो जाते हैं | फिर भी मैं यह ध्रष्टता कर रहा हूं .. आप कहानी मैं लिखते हैं कि तुलसी ने बटेसर के बारे में मालिक को नही बताया क्योंकि इससे काम छोटने का डर था पर दूसरी और धनेसर को भी तो बटेसर की बुरी नीयत के बारे में पता था | वो चाहता तो आसानी से तुलसी को काम से निकल कर उनके बीच दूरी बना सकता था पर आपके कथानक के घटनाक्रम ने इसकी इज़ाज़त उसे नही दी |ख़ैर यह तो छोटी सी बात है और मुझे पता है की ऐसी बात अब आगे से आपकी कहानियों में नही दिखाई नही देगी |
फिर से कह रहा हूं की आपमे निश्चित ही एक बहुत ही समर्थ कहानीकार छुपा बैठा है जो समय के साथ निखरता जाएगा |

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

तन्हा जी,
आपने पहली कहानी बहुत अच्छी लिखी है। जो आक्रोश और वेदना आप तुलसी के माध्यम से व्यक्त करना चाहते थे, वो हर पाठक तक पहुंच गई है।
साथ में स्थानीय बोली का नियंत्रित और सुन्दर प्रयोग कहानी को और प्रभावशाली और वास्तविक बनाता है।
आगे भी ऐसी भावनाप्रधान कहानियों का इंतज़ार रहेगा।

Bhag1 Behera का कहना है कि -

tanhaji acchi kahani likhi hai aapne........badhai ho......
aapke kalam se aage bhi aise kahani aur kavitayein janm lein....ye bhagwan se prarthna hai humaari...

gaon ke andhwishwas ke baare main ek kahaani ho gayi......
ab ek kahaaani shahar ki jindagi pe

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