Monday, March 24, 2008

यहाँ वहाँ कहाँ

बूढ़े ने शीशम के पेड़ के सहारे ब्लैकबॉर्ड टिकाया और जेब में से मोटे काँच वाली ऐनक निकालकर आँखों पर चढ़ा ली।
- अ से....?
बूढ़े ने तीन का अंक बनाया, उसके बीच से एक लेटा हुआ डंडा खींचा और उसके दूसरी ओर एक खड़ा हुआ डंडा खींचा। फिर सामने टाट-पट्टी बिछाकर बैठे बच्चों की ओर देखने लगा।
- अर्जुन...
एक बच्चा बोला।
- अकबर...
दूसरा बोला।
- अरहर की दाल।
एक और बोला।
- अनार...
बूढ़े ने कहा और घबराकर मुँह फेर लिया। फिर उसने ‘आ’ लिखा।
- आ से?
- आग...
पहला बच्चा बोला।
- आग...., - आग...., - आग....
तीन और बच्चों ने भी पुष्टि की।
तभी कहीं से एक जवान लड़का आ गया।
- खाना खा लो।
बूढ़े ने बच्चों से पूछा- खाना खाओगे?
- नहीं...
- नहीं...
- नहीं...
- माँ ने मना किया है।
बूढ़ा डर गया। कुछ दिनों से वह छोटी छोटी बिना बात की बातों पर डरने लगा था। उसने घबराकर ऐनक उतार ली।
- बच्चों, आज का अंतिम प्रश्न। हमारा देश कौनसा है?
बच्चे चुप रहे।
- बूढ़े का देश कौनसा है?
एक बच्चे ने अपने पास बैठे बच्चे के कान में पूछा।
- बच्चों, कल ही मैंने बताया था। कौनसा है हमारा देश?
बच्चे चुप रहे।
- ठंडा हो जाएगा...
जवान लड़के ने कहा तो बूढ़ा निराश होकर चलने लगा। बच्चे अपनी टाट पट्टियाँ उठाकर भाग लिए।
- बूढ़े का देश कौनसा है?
तीसरे बच्चे ने अपना सामान समेटते हुए चौथे बच्चे के कान में कहा।
- कोई दूसरा है...
चौथे बच्चे ने उत्तर दिया।
- कोई दूसरा है...., - कोई दूसरा है...
सब बच्चे भागते हुए अपने-अपने कानों में फुसफुसा रहे थे।

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बुढ़िया ने लकड़ी की थाली में खाना परोसकर उसके सामने रख दिया।
- ठंडा हो गया है।
बूढ़े ने कहा। वह आई और थाली उठाकर ले गई।
- दे दो। खा लूंगा ऐसे ही।
कुछ देर बाद भूखे बूढ़े ने कहा तो वह वही थाली रख गई।
- तुम आजकल झुंझलाई हुई क्यों रहती हो?
बुढ़िया मशीन जैसी लगती थी। उसके हाथ-पैर भी यंत्र की तरह काम करते हुए लगते थे। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आता था। बूढ़े को लगता था कि उसके मन में भी कोई भाव नहीं आता।
- मुझे अच्छा नहीं लगता...
- क्या?
- यहाँ की औरतों के बाल सफेद नहीं होते। मेरे हो गए हैं।
- अच्छा क्यों नहीं लगता?
- सब पड़ोसनें मुझे अलग मानती हैं।
- इस उम्र में यहाँ के सब मर्दों की कमर झुक जाती है। मेरी नहीं झुकी....मुझे भी अच्छा नहीं लगता।
- तुम भी कमर झुका कर चला करो।
बुढ़िया ने दो रोटियाँ लकड़ी की थाली में रख दी।
- तुम भी कोयले के पानी में बाल धोया करो।
- उससे काले हो जाते हैं?
- पता नहीं। क्या पता, हो जाते हों...
फिर चुप्पी रही। बूढ़े ने इधर-उधर देखा। लड़के को घर में न पाकर उसने पूछा- यह लड़का कहाँ रहता है दिन भर?
- दरवाजे पर खड़ा रहता है...
- कल दोपहर में छत पर क्या कर रहा था?
- एक लड़की है पड़ोस में....
- उसकी माँ के बाल कैसे हैं?
- काले।
- लड़की के?
- भूरे।
बूढ़े के दिल को हल्का सा सुकून मिला। लेकिन अगले ही क्षण उसके चेहरे पर फिर घबराहट आ गई।
- उसका बाप तो झुककर चलता होगा...
वह बड़बड़ाया।
- सुनो...
फिर थाली में हाथ धोते हुए धीरे से बोला, ताकि बुढ़िया के सिवा कोई और न सुन ले।
- क्या?
- आज के बाद यह मूंग की दाल मत बनाना।
- क्यों?
- यहाँ सब अरहर की दाल ही खाते हैं।
- ठीक है।

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दोपहर हो गई थी। लड़का लड़की के साथ पेड़ की डाली पर बैठा था। लड़की कोई गीत गुनगुना रही थी।
- इसका अर्थ क्या है?
लड़के ने पूछा।
- तुम्हें नहीं पता?
- नहीं, मैंने पहली बार सुना है।
- तुम हमारे वाले गाने नहीं सुनते। तुम्हारे यहाँ दूसरी तरह के गाने बजते रहते हैं।
- दूसरी तरह के कैसे?
- मुझे समझ में नहीं आते।
- मुझे भी तुम्हारे गीत समझ में नहीं आते....
उसके बाद लड़की ने गुनगुनाना बन्द कर दिया। वह हल्की सी उदास हो गई थी। वह हाथ बढ़ाकर ऊपर की डाल की पत्तियाँ तोड़ने लगी।
कुछ देर बाद वह बोली- तुम्हारी माँ कभी-कभी कोई और भाषा बोलने लगती है।
- कौनसी?
- मुझे क्या पता...
- मुझे तो नहीं लगता।
- तुम्हें समझ में आती होगी, इसलिए पता नहीं चलता होगा कि कब दूसरी भाषा बोलने लगी है।
- यह भी हो सकता है...
लड़का धीरे से बोला और वह भी उदास होकर पत्तियाँ तोड़ने लगा।
- मैं तो तुम्हारी भाषा ही बोलता हूं।
- अपनी माँ के साथ तो दूसरी बोलते हो।
- अच्छा?
- तुम्हें नहीं पता?
- नहीं। मुझे पता नहीं चलता होगा कि कब दूसरी बोलने लगा हूं।
- मुझे अच्छी नहीं लगती...
- मेरी माँ?
- तुम्हारी भाषा...
- अब से नहीं बोलूंगा।
लड़का यह वचन देने के बाद और उदास हो गया। उसके चेहरे को देखकर लड़की भी चिंतित लगने लगी थी।
- तुम्हारा घर कहाँ है?
वह कुछ देर बाद बोली।
- सामने...तुम्हारे घर के साथ वाला ही तो है।
वह इस व्यर्थ के प्रश्न पर झुंझला गया।
- नहीं, जहाँ से तुम लोग आए हो।
- मैं तो यहीं से आया हूं। जन्म के बाद कहीं भी नहीं गया।
- पिताजी कहते हैं कि तुम कहीं और से आए हो।
लड़की धीरे से बोली। वह अपने अँगूठे से पेड़ की छाल कुरेदने लगी थी।
- बाबा आए थे बहुत साल पहले।
- तुम पिताजी कहा करो। यहाँ कोई बाबा नहीं कहता।
लड़का चुप रहा।
- क्या हुआ?
- कुछ नहीं।
- तुम्हें बुरा लगा?
- नहीं, मुझे बुरा नहीं लगता।
- देखो, अब रोने मत लगना।
- नहीं....
- हमारे यहाँ लड़के नहीं रोते।
- हमारे यहाँ भी....
- तुम्हारा यहाँ कहाँ है?
वह फिर अपने प्रश्न पर आ गई थी।
- पता नहीं...
- तुम शादी के बाद सिर पर पगड़ी रखा करोगे?
- यहाँ रखते हैं?
- हाँ...
- मैं भी रख लूंगा।
लड़की के चेहरे पर मुस्कान के रंग की एक रेखा खिंच आई।
- लेकिन तुम झुककर नहीं चलोगे?
- पता नहीं...
- तुम्हारे पिताजी तो नहीं चलते।
- मेरी माँ आज शाम को बाल रंग लेगी।
- कोयले से?
- तुम्हें कैसे पता?
- उधर एक और मास्टर रहता था। उसकी घरवाली भी कोयले से रंगती थी।
- वह कहाँ का था?
- यहाँ का नहीं था।
- यह यहाँ कहाँ तक है?
- मालूम नहीं।
दोपहर धीरे-धीरे ख़त्म हो गई। पेड़ भी बुझ गया।

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अगले दिन शाम को बूढ़ा देर से घर लौटा।
- कहाँ रह गए थे?
बुढ़िया ने उसी यंत्रवत तरीके से पूछा।
- माँ, तुम यह भाषा मत बोला करो।
लड़के ने बीच में ही टोक दिया।
- क्यों?
- यहाँ कोई नहीं बोलता।
बुढ़िया चुप रही। बूढ़ा आकर खाट पर बैठ गया। वह झुककर चल रहा था।
- क्या हुआ तुम्हें?
बुढ़िया ने ही सुबह उसे झुककर चलने की सलाह दी थी, लेकिन उसे झुककर चलते देख वह चौंककर बोली।
- उन्होंने कहा है कि झुककर चला करूं।
- किन्होंने?
- यहीं के कुछ लोग थे। चेहरे से पहचानता हूं, नाम से नहीं।
- उनके हाथ में क्या था?
लड़के ने व्यग्र होकर पूछा।
- कुछ नहीं...
- कुछ और भी कहा?
बुढ़िया अब वहीं की भाषा बोल रही थी।
- नहीं, कमर को मोड़ने में मदद की। यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं।
- हाँ, यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं।
लड़के ने भी सहमति जताई।
- तुम्हें दर्द हो रहा होगा?
बुढ़िया ने पूछा। बूढ़े को पहली बार लगा कि बुढ़िया के मन में भी भावनाएँ उपज सकती हैं। इस अनुभूति से ही वह घबरा गया और इनकार में गर्दन हिला दी।
बूढ़ा खाट पर लेट गया। लड़का उठकर बाहर को चलने लगा तो बूढ़े ने टोक दिया।
- कहाँ जा रहा है?
- पेड़ पर।
- वहाँ तो अँधेरा होगा।
- वह दिया लेकर आती है।
- उसके बाल किस रंग के हैं?
- पहले भूरे थे....अब काले होने लगे हैं।
- मुझे डर लगता है...
बुढ़िया बोली।
- वहाँ कोई नहीं आता माँ।
- यहाँ के पेड़ों पर साँप रहते हैं। हमारे यहाँ की बात कुछ और थी।
- हमारा यहाँ कहाँ है माँ?
- अपने बाबा से पूछ।
लड़के ने बूढ़े की ओर देखा। वह आँखें बन्द करके सोने का दिखावा कर रहा था। लड़का बिना पूछे ही चला गया।
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- आज हमारा त्योहार है।
लड़की कई दिए लेकर आई थी।
- पिछले साल भी तो आया था।
- हाँ, लेकिन तब हम पेड़ पर नहीं मिलते थे।
- तब यह पेड़ छोटा था।
- तुम लोगों ने पिछली बार भी नहीं मनाया था।
- क्या?
- हमारा त्योहार.....तुम घर में अँधेरा करके जल्दी सो गए थे।
- तुम्हें किसने बताया?
- अगले दिन सब कह रहे थे।
- हाँ, हम जल्दी सो जाते हैं।
- लेकिन यह त्योहार का अपमान है।
- त्योहार तो तुम्हारा है....
- हाँ....यहाँ का...
- तुम भी तो हमारे त्योहार के दिन व्रत नहीं रखती।
- यहाँ कोई नहीं रखता।
- वह भी तो अपमान है....
- नहीं है।
कहकर लड़की चुप हो गई। उसके घर में खुशी का वातावरण था। वह खुश होकर ही पेड़ पर आई थी, लेकिन वहाँ उसका मन भारी होने लगा था। वह उठकर चलने लगी।
- तुम जल्दी जा रही हो?
- आज हम सब घर के सामने देर तक नाचेंगे।
- मैं भी चलूं?
- नहीं, तुम्हें उस तरह नाचना नहीं आता।
- मैं सीख लूंगा।
- मत चलो....
लड़की उसके इस प्रस्ताव पर सकपका गई थी।
- ठीक है, मैं अपने घर जाकर सो जाता हूं।
- अँधेरा मत करना।
- हमारे घर में चाँदनी नहीं पड़ती।
- ये दिए ले जाओ। दीवार पर रख देना।
लड़की ने दियों की थाली लड़के को पकड़ा दी। वह चलने लगी।
- यहाँ के पेड़ों पर साँप रहते हैं?
- हम उनकी पूजा करते हैं।
लड़का भी चल दिया। वे साथ चलते रहे।
- कल दोपहर को मिलते हैं।
- नहीं, कल मत आना।
- क्यों?
- मुझे डर लग रहा है?
- साँपों से?
- मालूम नहीं किससे, पर लग रहा है।
- ठीक है, नहीं आऊँगा।
- आज तुम्हारे पिताजी झुककर चल रहे थे।
लड़की खुश थी।
- माँ ने कोयला भिगो दिया है। अब सुबह रंगेगी।
- तुम बहुत अच्छे हो....
- तुम भी। यहाँ के सब लोग बहुत अच्छे हैं।
लड़की मुस्कुराती हुई अपने घर में चली गई। लड़के ने अपने दरवाजे में घुसते हुए फूंक मारकर दिए बुझा दिए। बूढ़ा बुढ़िया सो चुके थे।
मोहल्ले वाले नाचते रहे। उनका घर रात भर अँधेरा रहा।

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- बूढ़े को बाहर भेजो।
बुढ़िया कोयले के पानी में बाल भिगोकर बैठी ही थी कि दरवाजे पर शोर सा हुआ। वह बाहर गई तो बाहर खड़े लोगों ने बूढ़े को भेजने के लिए कहा। बुढ़िया ने उसे भेज दिया और ख़ुद दरवाजे की झिर्रियों में से झाँककर देखने लगी।
- तूने रात भर घर में अँधेरा क्यों रखा?
- पास वालों ने दुमंजिले पर कमरा बनवा लिया है, इसलिए हमारे आँगन में चाँदनी नहीं पड़ती।
- दिए जलाने थे।
दूसरे ने कहा। इस पर बूढ़ा चुप रहा।
- बूढ़े का घर जला दो, फिर अँधेरा नहीं होगा।
उन लोगों के साथ खड़े एक बच्चे ने कहा। बूढ़ा पढ़ाता था तो वह सबसे अगली पंक्ति में बैठता था।
तभी लड़का भी बाहर आ गया। उसे देखकर बच्चे ने इशारा किया- यही है।
- तू पेड़ पर लड़की के साथ बैठता है?
- हाँ
- वह मेरी बेटी है। अब से उसे देखना भी मत...
- हम शादी करेंगे।
- बूढ़े का घर जला दो। इसने त्योहार का अपमान किया है।
बच्चा फिर से अपने पिता का हाथ खींच-खींचकर कहने लगा।
- अपने लड़के को समझा ले। यहाँ की किसी लड़की को देखा भी तो तुममें से कोई नहीं दिखेगा।
- मैं भी यहाँ का हूं। सिर पर पगड़ी भी रखूंगा।
लड़का बोला तो सब हँसने लगे। बच्चा भी हँसा।
- बूढ़े से पूछ कि तू कहाँ का है?
बच्चे के पिता ने लड़के की गर्दन पकड़कर बूढ़े की ओर घुमा दी।
- पिताजी, हम कहाँ के हैं?
लड़के ने ‘पिताजी’ शब्द पर अधिक जोर दिया। बूढ़ा चुप रहा। बुढ़िया भी दरवाजे की आड़ से निकलकर बाहर आ गई।
- बूढ़े का घर...
बच्चा फिर से कहने लगा तो बूढ़ा उसके पैरों पर गिर पड़ा।
- मुझे माफ़ कर दीजिए...
बच्चा बहुत खुश हुआ। उसने बूढ़े के सिर पर पैर धर दिया और जोर-जोर से हँसने लगा।
लड़के ने झुककर बूढ़े को उठा लिया। अब सब हँसने लगे, लेकिन इससे बच्चा नाराज़ हो गया। फिर से अपने पिता का हाथ खींच-खींचकर कहने लगा- बूढ़े का घर जला दो। इसका लड़का यहाँ की लड़की को पेड़ पर ले जाता है। ये सब त्योहार का अपमान करते हैं।
बच्चे के धाराप्रवाह बोलने पर वहाँ उपस्थित सब लोग फिर जोर से हँसे। बूढ़ा, बुढ़िया और लड़का सिर झुकाकर खड़े रहे।
बच्चा फिर बोल पड़ा- बूढ़े का घर....
अब भीड़ में से एक नवयुवक घर के अन्दर गया और आग लगा दी।
बच्चा ताली पीटने लगा।


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12 कहानीप्रेमियों का कहना है :

anju का कहना है कि -

कहानी तो अच्छी है अब तक मेरे मन में येही प्रशन उठ रहा है की आख़िर वह लोग ऐसे कहाँ के थे जो लोग उन्हें इतने अपमानजनक दृष्टि से देखते हैं
बधाई आपको गौरव जी

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

गौरव जी,

भेद-भाव का बड़ा ही सटीक चित्रण किया है कहानी मे माध्यम से, और 'लीक के फकीर' का अल्पायु में पडता गहरा प्रभाव जो बाद में जहर बन जाता है.. समझने समझाने की जगह उकसाने भड़काने में शान समझते लोग.. पता नहीं कब तक.. यहाँ वहाँ और कहाँ चलता रहेगा..


बहुत बहुत बधाई..

अल्पना वर्मा का कहना है कि -

कहानी 'यहाँ -वहाँ कहाँ-'' सब कुछ यहाँ वहाँ का चित्रण करती है--लेकिन किस किस का घर जलेगा?? क्या भविष्य तय करेगा ?कुछ पता नहीं.--
* कथाकार की संवेदनशीलता और चिंतन का परिचय देती हुई कहानी है.
अच्छी कहानी के लिए बधाई.

प्रभात शारदा का कहना है कि -

A very good story, with all the things that require to grace it more. A unique piece of collection that you always want to preserve in your wardrobe.

I feel that the author is very much inspired by the way that the great "Munshi Premchand" was having in almost all his creations... i.e. leaving the story at such a point where the reader is on his peek of thirst and left him as it is. This is a great thing but really not easy to do. Leaving reader in an intoxicate state by fully drenching him in the narrator's imaginary world is really a good work of creativity.

Gaurav ji, this time you plot your story on a very untouched feelings of the people which usually moves from their native place to some other (for any reason) and found themselfs as unmatched for the new one. There are many known/unknown problems which force them to keep their lifestyle as reserved. They will mainly consider as outsiders for the existing society. I remember that, in my area there was a family migrated from Kashmir. They never become so open in the new society and we also usually see them as unknown persons.

At last, Thumps up for you...

Thanks & Regards,
Prabhat

तपन शर्मा का कहना है कि -

बेहतरीन कहानी गौरव भाई!

sahil का कहना है कि -

waah ji waah! bahut hi baariki se har ek paksh ko chhua hai aapne,maja aa age rahie
alok singh "sahil"

tanha kavi का कहना है कि -

गौरव!
लीक से हटकर तुमने लिखा है और तुम इसमें सफल भी हुए हो। इसलिए बधाई स्वीकारो।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Bhupendra का कहना है कि -

अच्छा है ....पर आप लोग सिर्फ़ समस्या के बरे मे ही लिखते हो...पता नही कितने सालो से और कितनी बार ...इस तरह सिर्फ़ आप समस्या को ही जिंदा रखते हो ....उसके समाधान के बरे मे लिखो तो जानू ????????

kashish का कहना है कि -

bahut achchhi kahani hai bilkul aisi jaisi munsi premchand ki kahani hoti hai vahi maja aaya padhne me jo mantra padhne me aaya tha kabh

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आपको शायद याद होगा कि जुलाई २००७ में मैं और आप चर्चित युवा कहानीकार अभिषेक कश्यप से मिलने गये थे। उन्हीं की पहली कहानी 'खेल' जोकि २००० में प्रकाशित हुई थी, भी इसी तरह से लिखी गई है। बहुत ही साधारण- साधारण से संवाद हैं लेकिन बातें गहराई भरी हैं। यद्यपि दोनों कहानियों की पृष्ठभूमि अलग-अलग है। 'खेल' कहानी बिहार में महामारी की तरह फैले जातिवाद पर आधारित है तो आपकी कहानी 'यहाँ वहाँ कहाँ' क्षेत्रवाद, अपना-परायावाद पर आधारित है। बहुत सूक्ष्मता से देखें तो बहुत अधिक अंतर भी नहीं है। आपकी इस कहानी ने मुझे बहुत प्रभावित किया। आप दिन-प्रतिदिन अपनी लेखनी की धार तीव्र करते जा रहे हैं। शीर्षक भी प्रासंगिक लगा। बधाई।

pooja anil का कहना है कि -

गौरव जी , एक संवेदनशील कहानी लिखने के लिए बधाई
पूजा अनिल

Deep का कहना है कि -

acchi kahani hai. par yeh log the kahan ke jo inhe is tarah se apmaan jhelna pada

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