Thursday, September 4, 2008

नमन है उनको (संस्मरण)

शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ॰ शीला सिंह का संस्मरण

हिन्द-युग्म ने शिक्षक दिवस पर कुछ ही दिनों पूर्व रचनाएँ आमंत्रित किए थे। उन्हीं में से पहली किश्त हम डॉ॰ शीला सिंह के संस्मरण के रूप में पेश कर रहे हैं।


डॉ॰ सुदर्शना सिंहल
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में मै जब भी एक चेम्बर के सामने से गुज़रती हूं तो मेरे पांव थम जाते हैं। वहां से डॉ॰ सुदर्शना सिंहल के नाम की नेमप्लेट हट चुकी है। मैं मन ही मन बुदबुदाती हूँ, अब वे यहाँ नहीं रहतीं, शायद कहीं नहीं रहती हैं। दक्षिण पूर्व-एशिया एवं बौद्ध-दर्शन की प्रकाण्ड विदुषी थीं। अंग्रेजी़, हिन्दी, संस्कृत और लगभग दस विदेशी भाषाओं पर उनका अधिकार था। दक्षिण पूर्व एशिया की पांच लिपियों को जानती थीं। हिन्दी को पहला शब्दकोश देने वाले मूर्धन्य विद्वान रघुवीर जी की पुत्री थीं। विभाग में उनकी विद्वत्ता, सौन्दर्य एवं सादगी की बड़ी चर्चा थी। मेरा उनसे सामान्य परिचय था केवल अभिवादन का, मैं प्रणाम करती और वे मुस्कुराती हुई आगे बढ़ जातीं।

मैं उनके सानिध्य में अपनी पीएच.डी. के दौरान आई। बहुत विकट परिस्थितियों मे मेरा पंजीकरण उनके अधीन हुआ और वे मेरी सुपरवाइज़र बनीं। मेरा शोधकार्य प्रारंभ ही हुआ था कि वे बीमार पड़ी और पता चला कि ब्रेस्ट्कैन्सर से पीड़ित हैं और आखिरी पड़ाव पर हैं, उनके पति जाने -माने चिकित्सक थे, उन्होनें देश के सभी बड़े चिकित्सकों से सम्पर्क किया। सभी की यही राय थी की अधिक से अधिक उन्हें जीने के लिये छः महीने का मौका दिया जा सकता है। मै बहुत परेशान थी, हताश थी, उनसे मिलने गई, वे दर्द से स्याह थी पर मुस्कुरा रही थी। मुझे पास बुलाया और कहा -गाइड बदल ले मेरा क्या ठिकाना, मैं रो पड़ी और ना में सिर हिलाया वे हंसते हुई बोली ठीक है इन्तजा़र कर, रंजना जो मेरी सिनियर थीं, बोलीं- देखो मुझसे भी यही कह रही हैं। मैं वहा से चली आई।

लोग एक अन्होनी का इन्तजार कर रहे थे। डाक्टरों ने एक अवसर लिया और सर्जरी करने का निर्णय लिया। वे भी समय से पहले जाने के लिये तैयार हो गई अद्भुत साहस था, और एक चमत्कार हुआ। उनका आपरेशन सफल रहा और वे ठीक होने लगीं, चिकित्सकों कि टोली चकित थी, ऐसे कैसे हो सकता है?

मैडम बच गई थीं। उनका कैन्सर ठीक होने लगा था, पर सर्जरी ने शरीर के कुछ अंश छीन लिये थे, मोती जैसे दाँत काले हो गये थे, सुनहले रेशमी बाल रूखे और बेजान हो गये थे, दाहिना हाथ इतना मोटा हो चुका था कि मानों शरीर का आधा वजन उसमें समा गया हो. वे मंथर गति से ठीक हो रही थी, उनकी इच्छा से मै नेशनल लाइब्रेरी कोलकता, महाबोधिसोसायटी दिल्ली, एवं अमेरिकन संस्थान में शोध के लिये चली गई। वापस लौट कर मैंने उनके पास जाना प्रारंभ किया। वे मुझे समय नहीं दे पा रही थी, इसके कारण उन्हें ग्लानि होती थी। एक दिन मुझे बुला कर कहा कि यदि मैं कुछ महीने के लिये उन्के साथ रह जाऊँ तो वे मेरी थीसिस जल्दी ही पूरी करा देंगी, उनके पति इस बीच विदेश प्रवास में रहेगें. मैंने हामी भरी और उनके घर चली आई।

उनके घर पर जो दिन मैंने बिताये वे दिन मेरे जीवन की थाती बन गये। मैंने उनको करीब से जाना, कितनी अनूठी थीं वे, इतना स्नेहिल और विशाल हृदय मैंने आज तक नहीं देखा। जब मैं देर रात तक काम करती और बिना कुछ ओढ़े सो जाती तो रात को कोई चादर उढा़ जाता था। आंख खुलती तो चाय का कप लिये खड़ी होतीं। उनका बेटा निखिल जो बहुत छोटा था शोर मचाता तौ उसे चुप करातीं और कहती कि दीदी सो रही है। मारे ईर्ष्या के निखिल कई बार मुझे चिको्टी काट कर भाग जाता था। प्यार से वे मुझे राजे कहतीं अर्थात राजकुमारी उनके यहाँ बेटियों को राजे कहा जाता था, विभाग से लौटने के बाद हम दोनों हल्की चाय को सुड़क-सुड़क कर पीते थे। मैं चाय नहीं पीती थी पर उस चाय की याद आज भी आती है। फिर मैं अपना काम करने बैठती और वे साथ बैठ कर मेरा काम देखती थीं, बड़ी सह्जता से गंभीर विषयों को समझा देती थीं। श्लोकों को ऐसे गुनगुनाती मानों कोई गीत गा रही हों, हिन्दी की हर विधा पर उनका अधिकार था। हिन्दी के कठिन लगने वाले शब्दों का सरलता से प्रयोग करतीं, भाई को भ्राता जी, नौकरानी को भ्रित्या, छोटी चौकी को आसन्दी कहना ये सब उनके नित्य प्रयोग के शब्द थे, मैं उन्हें चकित होकर देखती मानो मैं कोई शिशु हूँ और अभी-२ जन्मी हूँ। हिन्दी से, देश की सभ्यता से, परम्परा से प्यार करना मैंने उन्हीं से सीखा, कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता, ये मैंने उन्हीं से जाना। १९४७ की पीड़ा जो पाकिस्तान से आते वक़्त उन्होंने भुगती थी, मैं सुनती तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते थे। ऐसी ही न जाने कितनी बातें मैने अपनी गुरू माँ से जाना था। मैं कुछ महिनों में बदल चुकी थी, मुझे जिन्दगी के मायने समझ में आने लगे थे। दु:खों से टकराने का ज़ज्बा भी आ गया था। मैंने इन दिनों क्या-क्या जाना उसके लिये मेरे पास शब्द नहीं है, वे मुझे नित्य नये रूप में दिखती थीं।

मेरी थीसिस लिखी जा चुकी थी। मुझे वापस घर लौटना था, मैंने देखा एक सुन्दर सी छोटी साईकिल लाई गई है। मैंने उनकी तरफ़ देखा तो हँसते हुई बोलीं- तुम्हारे बेटे के लिये उपहार है। माँ-बेटे को अलग करने का पाप किया था मैंने यह उसकी नानी की तरफ़ से है, मैं अवाक थी मैंने तो गुरू से ही दक्षिणा ले ली थी। मेरी पीएच.डी पूरी हो गई थी। इस बीच मैडम के साथ मेरा एक अनकहा रिश्ता कायम हो चुका था। हम माँ-बेटी जैसे हो गये थे, मुझे डिग्री मिली, नौकरी मिली, मेरी पुस्तक छपी, मुझे हिन्दी संस्थान का एवार्ड मिला वे मेरे साथ रहीं

अचानक उनके पति का देहान्त हो गया और वे वीआरएस लेकर इलाहाबाद चली गईं. उनके सभी शिष्य वहां मिलने जाते थे। इसी बीच मेरे बाबूजी भी नहीं रहे थे। मैं लगभग एक वर्ष तक अव्साद्ग्रस्त थी। इस बीच मैडम से मिलना हुआ था। शायद वह कुछ कहना चाहती थीं पर कह नहीं पाती थीं, मुझे बाद मे पता चला की वे बाहर गई हैं। वैसे भी विश्व के हर कोने को उन्होंने देखा था। न जाने क्यों मैं घबरा रही थी। मैं इलाहाबाद गई; मैडम से मिलने उनके घर पहुँची; शोर मचाती अन्दर घुसी, एक महिला जो मेरे लिये अनजानी थी निकली और पूछा-क्या हैं? मैंने कहा- मैडम है? उसने मुझे घूर कर देखा और बोली-वो नहीं है। मैंने कहा-कहा है?तभी उनका बड़ा बेटा दौड़ता हुआ आया उसकी आंखें मुझे सब बता रही थी। शैशव ने मेरा हाथ पकड़ रखा था। मैं अपनी मैडम के जीवन के अंत समय की बातें सुन रही थी। शैशव की आवाज़ कहीं दूर से आती हुई लग रही थी, मैं सोच रही थी मौत को झुठलाने वाली मौत के साथ क्यों गई.................

डॉ॰ शीला सिंह
रीडर,(प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग)
वसंत कॉलेज़ फ़ॉर वीमेन, वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी (उ॰प्र॰)

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4 कहानीप्रेमियों का कहना है :

diya22 का कहना है कि -

शीला जी,आपने अपनी गुरु माँ के विषय में जो विचार हमारे साथ बाटे उसके लिए धन्यवाद.हम सभी के जीवन में कोई न कोई ऐसा होता है जो हमारे वेगवान जीवन को एक दिशा दे जाता है जिसकी अमित छाप सदैव हमारे कार्य और व्यव्हार में झलकती है हमरे जीवन का वाही पथप्रदर्शक ही हमारा वास्तविक शिक्छ्क होता है.

शोभा का कहना है कि -

शीला जी
बहुत सुन्दर संस्मरण लिखा है आपने। आँखों के सामने चित्र सा उभर आया है। कुछ लोग इतने करीब हो जाते हैं कि कभी दूरी महसूस ही नहीं होती। एक अच्छा अध्यापक इसी तरह सदा अपने शिष्यों के दिलों में जीवित रहता है। मैने एक ऐसी ही गुरू- भक्ति की कहानी पढ़ी थी। आज वो आँखों के सामने जीवित होगई। इतनी सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई।

Manju Gupta का कहना है कि -

शीला जी के संस्मरण द्वारा डॉ .सुदर्शना जी के उदार ,भव्य ,महान,बेमिसाल परोपकारी व्यक्तित्व के बारे में पता चला .देश -समाज को आज ऐसों की जरूरत है .बधाई .

Shamikh Faraz का कहना है कि -

शीला जी मैं कहूँगा कि आपकी किस्मत बहुत बुलंद है जो आपकी इस तरह की गुरु मिली. वाकई सुदर्शना जी एक महान व्यक्तित्व की मालकिन थीं.

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