Thursday, August 28, 2008

लघुकथा- ईमानदार

रोज शाम बगीचे में घूमने जाना मेरी आदत में शामिल था | फाटक के पास ही शर्माजी मिल गए |
वहां रुक कर कुछ देर उनसे बतियाने लगा | सावन का पहला सोमवार था | आज कुछ विशेष रौनक थी | कुछ एक गुब्बारे-कुल्फी वाले भी आ जुटे थे |
शर्माजी से जैरामजी कर आगे बढ़ने लगा तो पास में खड़े कुल्फी वाले ने कुरते की बाह पकड़ कर कहा : "बाबूजी पैसे" ?
मैं हतप्रभ: "कैसे पैसे" ?
उसने पास खड़े कुल्फी खाते एक बच्चे की तरफ़ इशारा कर के कहा : "आपका नाम ले कुल्फी ले गया है, पैसे तो आपको देने ही पड़ेंगे" |
मुझे गुस्सा आ गया बच्चे के पास गया और दो थप्पड़ जड़ दिए और कहा "मुफ्त की कुल्फी खाते शर्म नही आती" ?
वह बोला : "मुफ्त की कहाँ ? इसके बदले थप्पड़ खाने के लिए तो आपके पास खड़ा था वरना भाग ना जाता"?


--विनय के जोशी

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5 कहानीप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

वह बोला : "मुफ्त की कहाँ ? इसके बदले थप्पड़ खाने के लिए तो आपके पास खड़ा था वरना भाग ना जाता"?
" sach kha, aise imandaree kee meesal khan dekhne ko milege, very touching and inspiring story"

Regards

neelam का कहना है कि -

कितनी सच्ची कहानी है ,और क्या कहूँ,बेहतरीन प्रस्तुति विनय जी

diya22 का कहना है कि -

बहुत ही अच्छी कहानी.दिल को छु गई.

sumit का कहना है कि -

वो बच्चा वास्तव मे ईमानदात था

बहुत ही अच्छी कहानी, दिल को छू गयी

सुमित भारद्वाज

Anonymous का कहना है कि -

विनय जी,
आपने मुझे हिन्दयुग्म पर अपनी रचनाएँ पढ़ने की लिए कहा आपकी कविता प्रेत और जवान मौत तो अच्छी लगी | पर आपकी लिखी लघुकथा इमानदार पढ़ने के बाद पन्द्रह मिनट के लिए मैं जड़ हो गया | बहुत बढ़िया | हिन्दयुग्म बहुत अच्छा है अब मैं रोज पढूंगा- हर्षवर्धन

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