Monday, August 11, 2008

कोमा

डॉक्टर कह रहा था, सॉरी! मिसिज मलकानी, आपके पति मि. मलकानी के दोनों गुर्दे खराब हो गए हैं। वे अपना कार्य पूर्णतयाः छोड़ चुके हैं। इस वजह से उनके रक्त में इतना टाक्सिक पदार्थ इकटठा हो गया है कि वे कोमा से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। डायलिसिस के बावजूद उनके रक्त में यूरिया की मात्रा प्रतिपल बढ़ रही है। अब तो एकमात्र उपाय गुर्दों का प्रत्यारोपण है।

पत्नी के चेहरे पर अवसाद व चिन्ता के बादल छा रहे हैं। वह मुड़कर मेरे मृतप्राय शरीर को देखती है जिसमें अनेक नलियाँ घुसेड़ दी गई हैं।

डाक्टर चले गए। पत्नी बिटुर-बिटुर कर मुझे देख रही है। मैं उसका कष्ट समझता हूँ। मुझे सब सुन रहा है। मेरा मस्तिष्क भी काम कर रहा है, पर मैं बोल नहीं सकता। हिल-डुल नहीं सकता, शायद सारी मांसपेशियाँ निष्क्रिय हो गई हैं। मैं हाथ से हिलाकर सन्देश देना चाहता हूँ। कभी आँख से इशारा करना चाहता हूँ पर कुछ नहीं कर पाता।

अब फिर मेरी विचारधारा कोमा की तरफ मुड़ती है। मैंने अनेक मरीज देखे हैं कोमा के। इलाज भी किया है। इसी विभाग का योग्य डाक्टर रहा हूँ, कोमा में जाने से पहले। सर्विस रिकार्ड में तो अब भी हूँ शायद। कल सब-कुछ खत्म हो जाएगा।

क्या कोमा में सभी व्यक्तियों का यही हाल होता है? माने जो हम चिकित्सक समझते-सोचते आए थे, कोमा वह नहीं है। कोमा में मस्तिष्क पूरा का पूरा काम करता है, आँखें देखती हैं, थोड़ा धुँधला दृश्य नजर आता है। कान सुनते हैं क्योंकि सोचने-देखने तथा सुनने में मांसपेशियों को विशेष कार्य नहीं करना होता। सोचने में तो कतई नहीं। हे राम! फिर तो कोमा बड़ा भयानक होता है। मैं सोचता हूँ, तिल-तिल कर मरना शायद कोमा का दूसरा नाम है।

मैं स्वयं एक डाक्टर हूँ। कोमा यूनिट में जाने कितने मरीजों का इलाज कर चुका हूँ। पर अब तक हमारी धारणा, माने डाक्टरों की धारणा, यही रही है कि कोमा में सारी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं। परन्तु यह मेरे साथ क्या हो रहा है? मुझे सब-कुछ सुन रहा है। यहाँ तक कि देख-पहचान भी सकता हूँ। सोच भी सकता हूँ। पर यह सब-कुछ तो बहुत भयानक है। चाहे कुछ प्रतिशत में ऐसा होता हो, पर वाकई भयावह स्थिति है।

कमरे का दरवाजा खुलता है। पत्नी का भाई सुनील जो एयर इण्डिया में है आकर कुर्सी पर बैठ जाता है। पत्नी दूसरी कुर्सी पर बैठी है। वह एक उचटती-सी हिकारत भरी नजर मुझ पर फेकता है। मेरी पत्नी के इस भाई ने मुझे जीजा के रूप में कभी नहीं कबूला, क्योंकि मेरा और पत्नी का प्रेम विवाह था। वह मेरी कविताओं की दीवानी थी। पर मैं सिन्धी था तथा वे लोग कान्यकुब्ज ब्राह्मण। सुनील के मन में मेरे प्रति अव्यक्त निरादर रहा है। वह मुझे और हमारे रिश्ते को, यहां तक की मेरी मौजूदगी को भी नकारता रहा है।

सुनील मेरी पत्नी प्रमिला से कहता है गुरदा कहाँ से मिलेगा? कौन देगा? इस कमबख्त का तो कोई सगा भी नहीं। मैं अनाथ था तथा एक सिन्धी ट्रस्ट ने मुझे पढ़ाया था। मैं सोचता हूँ, पत्नी उसे डाँटेगी जैसा कि पहले कई बार कर चुकी है। परन्तु पत्नी भी चुप है, शायद असीम दु:ख से, या फिर क्या कहूँ या फिर शायद उसे मेरा-उसका रिश्ता समाप्त होता लगता है। ऐसे में भाई से भी क्यों बिगाड़े?

''भैया, क्या गुरदा कहीं से मोल नहीं मिल सकता?'' वह कहती है। मुझे अच्छा लगता है। पत्नी अभी रो रही है। मेरी चिन्ता है, उसे।

मिल सकता है। पर दो ढाई-लाख रुपए लेगा गुरदा दान करने वाला। फिर सौ झमेले, किसी को पता लग गया तो। आप्रेशन का खर्चा, अस्पताल का खर्चा, अस्पताल के बाद गुरदे को परित्यक्त होने से बचाने के लिए दो-तीन साल महँगी दवाइयाँ। सब मिलाकर लगभग दस लाख। कहाँ से लाओगी इतना रुपया ? अभी तक भी ढाई-तीन लाख खर्च हो चुका है और फिर गारन्टी कहाँ है कि यह बच जाएगा। तुमने तो इसके बहकावे में आकर नौकरी भी नहीं की। सुनील कोई मौका नहीं छोड़ता, मुझे नीचा दिखाने का। मुझे गुस्सा चढ़ आया है। पर सब बेकार, मैं भला गुस्सा कैसे दर्शाऊं ?

''फ्लैट बेचने से नहीं चलेगा, पत्नी मरी आवाज से कहती है। मुझे भला लगता है। कितना मिलेगा ? साढ़े तीन लाख, फिर तुम सड़क पर रहोगी। और तुम उसे बेच भी नहीं सकती जब तक यह जिन्दा है क्योंकि नाम तो इसी के है, ना।

फिर दोनों चुप हो जाते हैं। मेरे कान उधर ही लगे हैं। अब न केवल मेरा धुंधलापन बढ़ गया है बल्कि आवाज भी दूर से आती हुई लगती है, जैसे किसी कुंए में से।

पत्नी फिर कहती है भैया कुछ तो करना पड़ेगा। ऐसे तो नहीं छोड़ा जा सकता इनको। पर उसकी आवाज में दम नहीं है। ऐसा लगता है कि यथार्थ उसे भी दिखने लगा है।

''देखो ! तुम तकदीर से जीत नहीं सकती। हमसे अपने परिवार से तो तुमने मनमानी कर ली इससे विवाह करके, पर तकदीर........... वह बीच में चुप हो जाता है। नर्स आकर मेनीटोल की बोतल बदल देती है और चली जाती है।
सुनील फिर कहता है, ''इसने कोई बीमा भी करवा रखा है या नहीं।

पत्नी चुप रहती है। मैं तड़प उठता हूँ। वह इसे धमकाती क्यों नहीं? कैसी पतिव्रता नारी है ? क्या यह वही है जिसने इन सबसे लड़कर मुझसे विवाह रचाया था।

डाक्टर फिर कमरे में आता है। पूछता है, फिर क्या फैसला किया ?'' सुनील से पहले पत्नी बोलती है 'डाक्टर गुरदे प्रत्यारोपण के बाद इनके बचने की कितनी उम्मीद है ?

मेरी उम्मीद जवाँ हो जाती है। शायद प्रमिला ने फिर फैसला कर लिया। भाई की दलीलों के खिलाफ वह सब-कुछ बेचकर मेरा इलाज करवाएगी।

'फिफ्टी-फिफ्टी मिसिज मलकानी!' डाक्टर कहता है।

''तब तो आप ऐसे ही कोशिश करके देखें, क्योंकि गुरदा देने वाला तो कोई है नहीं।''

हम मध्य वर्गीय लोगकितने कायर होते हैं, कितने कैलकुलेंटिंग ! प्राप्त सुख सुविधाओं को छोड़ने का साहस हम में उतना नहीं होता जितना गरीबों में होता है। शायद मैं प्रमिला की जगह होता तो यही करता। मेरे चेहरे पर तो क्या है पता नहीं, मेरे भीतर यह बीभत्स सत्य मुझे अट्टहास करने पर मजबूर कर रहा था।
मैं सकते में हूँ। मुझे सहसा याद आता है कि हमारे मेडिकल कालेज हास्टल के बाहर खोखे वाला मनोहर। उसकी पत्नी को कैंसर हो गया था। निदान भी बड़ी देर से हुआ था। लगभग आखिरी स्टेज थी। उसने उसे अस्पताल में दाखिल करवाया था। डाक्टर के साफ जवाब देने के बावजूद भी वह दिलेरी से कहता रहा ''जनाब आप कोशिश तो कीजिए जो होगा देखा जाएगा। इसको भाँवर डालकर लाया था तो वचन दिया था पण्डित, जात-बिरादरी तथा अग्नि के सामने, कि इसका पूरा ख्याल रखूँगा।'' मनोहर की पत्नी का रोग काबू नहीं आ रहा था। कीमती कीमो थेरेपी में मनोहर ने पहले अपना पुराना स्कूटर, फिर खोखा, फिर शहर के बाहर बना कोठरीनुमा घर बेच दिया था। फिर रिश्ते-नाते, यार-दोस्तों, यहाँ तक कि हम विद्यार्थियों से कर्ज लेकर इलाज करवाता रहा। उसकी पत्नी दस दिन कोमा में रही। वह रात-दिन उसके सिरहाने बैठा कहता रहता ''रामरती घबराना नहीं तुम ठीक हो जाओगी। मैंने माता की मन्नत मांगी है, मन्नत कभी बेकार नहीं जाती।'' मैं भी रामरती को देखने गया था। संयोग से जब उसने आखिरी साँस ली तो मैं वहीं था। उसके पीले जर्द चेहरे को मनोहर ने अपनी गोद में ले रखा था। रामरती की साँसें उखड़ रही थीं। पर उसके नीले पड़ते होठों पर एक मुस्कान थी। मनोहर उसका माथा सहलाता हुआ कहता जा रहा था कि घबराओं नहीं रामरती और रामरती बिना घबराए चली गई। शायद कोमा में भी उसे अपने महबूब के प्यार का सहारा था, भरोसा था।

सुनील और प्रमिला की आवाज अब मुझे अस्पष्ट लग रही थी। हम मध्य वर्गीय लोगकितने कायर होते हैं, कितने कैलकुलेंटिंग ! प्राप्त सुख सुविधाओं को छोड़ने का साहस हम में उतना नहीं होता जितना गरीबों में होता है। शायद मैं प्रमिला की जगह होता तो यही करता। मेरे चेहरे पर तो क्या है पता नहीं, मेरे भीतर यह बीभत्स सत्य मुझे अट्टहास करने पर मजबूर कर रहा था। मेरा अन्तस फराज अहमद की पंक्तियाँ गुनगुना रहा है-

ढूँढता कहाँ है तू वफा के मोती
यह खजाने शायद खराबों में मिलें।


मेरी कड़वाहट धीरे-धीरे शून्य में विलीन हो रही थी। मुझे अनन्त निद्रा के आने की आहट सुन रही है। ऐ दोस्तो, रकीबो, मेरा सलाम अलविदा, दुआ करना मुझे दोबारा वहाँ जन्म मिले जहां सरसों के तेल का दिया टिमटिमाता हो। जहाँ हवा बेरोक-टोक आती हो। जहाँ पिता के बदन से पसीना सूखता ही न हो। जहाँ माँ के आंचल के अलावा कुछ नहीं हो। और कुछ नहींं तो मुझे मनोहर और रामरती में से एक बना देना। पर डाक्टर मलकानी नहीं, अलविदा।

कथाकार- डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'
[कहानी लिखने का समय रात्रि 1.30 बजे -स्थान-एक मरीज को देखकर वार्ड के रिटायरिंग रूम में]

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9 कहानीप्रेमियों का कहना है :

अखिल तिवारी का कहना है कि -

एक अच्छी कहानी. आज की जिन्दगी के एक अकथ सत्य को बहुत कम शब्दों में बहुत कुशलता से आपने पिरोया है. धन्यवाद

sahil का कहना है कि -

सही शब्द संयोजन,खुशी की बात है की कविता के साथ कहानी में भी आप उतर आए परन्तु कविता वाली पारंगतता कहानी में पाने में अभी वक्त लगेगा.
आलोक सिंह "साहिल"

gyaana का कहना है कि -

डॉ श्यामजी की कहानी *कोमा* पढ़ी..मानव जीवन की कटुता+यथार्थता झलक रही हे मन किस तरह विचलित हो जाता है.आखिरी क्षण में आकर भी कितने दार्शनिक विचार आ जाते हैं डॉ.साहेब अपनी अच्छी सोच बनाये रखे.,आपके मरीजो को सही डॉ.मिले है बधाई बढ़िया कहानी के लिए.
कही कोई कथाबीज यहाँ इस वास्तविकता के लिए जरूर मिला होगा .और द्रवित मन से आपने ये कथा लिखी..साधुवाद
अलका मधुसूदन पटेल(W/O Dr.M.S.PATEL)
लेखिका+साहित्यकार

neelam का कहना है कि -

श्याम सखा श्याम जी की "कोमा " अत्यन्त ही सराहनीय है ,यह कहानी बेहद ही दिल को छू जाने वाली है ,इसके पहले हमने इनकी कविता पढ़ी थी ,जब मै हक और हकूक की बात करता हूँ ,वाकई बहुत ही संजीदा अंदाज ही आपका
आपकी शुभाकांछी

kumud का कहना है कि -

kya koma me sachmuh aisa hota hai?
agar han to HEY RAM
han kahanee marmik hai badhaee;
kumud

diya22 का कहना है कि -

बड़ी ही सच्ची कहानी लगी.यथार्थ यही है जिसे ये बखूबी प्रस्तुत करती है.

pooja anil का कहना है कि -

यथार्थ कितना कड़वा हो सकता है, इंसान शायद ही अपने जीते जी जान पाये...!!!!!
बहुत बड़ा सच बयान कर रही है आपकी कहानी , बहुत खूब.

जन्म दिन की शुभकामनाएं

amar का कहना है कि -

बहुत ही मार्मिक चित्रण। बहुत सशक्त भावपक्ष। कलापक्ष को थोड़ा और माँजा जा सकता था।

Swapna का कहना है कि -

श्याम जी,
एक बहुत ही साफ़ सुथरी दिल को छूने वाली कहानी लिखी है आपने | आपकी कविताओं का तो कोई जोड़ है ही नहीं , कहानी भी बे-मिसाल हैं | हमेशा की तरह तारीफ़ के शब्द कम पड़ गए मेरे पास | हमारा धन्यवाद और बधाई स्वीकार करें |

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